Tue. Feb 25th, 2020

स्मृति ईरानी की जीत : काैन कहता है कि आसमाँ में सुराख नहीं हाे सकता

स्मृति ईरानी की सालों की मेहनत आखिर अमेठी में रंग लाई। इस बार उन्होंने वो कर दिखाया जिसके बारे में सिर्फ सोचा ही जा सकता था। इसे जमीन पर उतारना आसान कतई नहीं था। स्मृति ने गांधी परिवार की परंपरागत सीट पर जीत के कदम बढ़ा दिए हैं। ये इस चुनाव का सबसे बड़ा उलटफेर कहा जा सकता है। कांग्रेस अध्यक्ष को हराना उन्हें भारत के सियासी इतिहास में दर्ज करवा देगा। असल में कहें तो शायद उन्हें जीत का संभावनाएं 2014 के बाद ही नजर आ गई थी। इस दौरान केंद्र सरकार में वह विवादों में भी आई। उनका कद भी कम किया गया। लेकिन ये उनका जज्बा ही था कि हार नहीं मानी और अमेठी फतह करके पीएम मोदी और अमित शाह को इस चुनाव का सबसे बड़ा तोहफा दे दिया।

अमेठी से लगातार पिछड़ रहे राहुल ने प्रेस कांफ्रेंस में भी अपनी हार मानते हुए कहा कि अब अमेठी की देखभाल स्मृति ईरानी करें। अमेठी ने अगर स्मृति को अपनाया है तो उसकी वजह भी है। 2014 में भी स्मृति ने पूरो जोर लगाया था लेकिन राहुल भारी पड़े। लेकिन इस हार में स्मृति के लिए जीत का सूत्र छिपा था। उन्होंने राहुल की जीत का मार्जिन बहुत कम कर दिया था।

2009 लोकसभा चुनाव में करीब साढ़े तीन लाख वोटों से जीतने वाले राहुल गांधी पर 2014 लोकसभा चुनाव में मोदी लहर करीब-करीब भारी ही पड़ गई थी। पिछली बार स्मृति ईरानी उनके खिलाफ मैदान में थीं और राहुल की जीत का अंतर घटकर करीब एक लाख वोटों का रह गया था। यहीं से भाजपा और स्मृति को महसूस होने लगा कि अमेठी की बाजी जीती जा सकती है। उनके इसी भरोसे ने आज उन्हें अमेठी की नायिका बना दिया है।

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