हे पार्थ ! मोह तजो गाण्डीव उठाओ……….प्रदीप बहराइची
हे पार्थ !
मोह तजो गाण्डीव उठाओ……….
प्रदीप बहराइची
भय- पाप से व्याकुल धरती,अपनी धुरी से भटक रही है
रक्त-मांस के प्यासे-भूखों को , मानवता खटक रही है।
असहय होती भंवर जाल से , यह नौका पार लगाओ।।
अब दुर्योधन और सजग है, जयद्रथ भी ललकार रहा,
दुःशासन की अधम प्रवृत्ति को,शकुनी दे रफ्तार रहा।
भरी सभा- बेबस पांचाली जैसा दृश्य न और दिखाओ।।
निज संबंधों की ख़ातिर कितना तपेगा लाक्षागृह में,
है शूरवीर जो लड़ते लड़ते, प्राण लुटा दे धर्मयुद्ध में।
पाण्डु पुत्र हो कुरूक्षेत्र में , कौरवों को धूल चटाओ।।
प्रदीप बहराइची
ग्रा- बड़कागांव, पयागपुर
जन- बहराइच, उ. प्र. (भारत)

