Wed. Oct 16th, 2019

कालीदास तो सिर्फ मुर्ख थे पर आज के जमाने के कथित कालीदास कपटी और दगाबाज हैं : बिम्मी शर्मा,


बिम्मी शर्मा, (व्यग्ंय) | कालीदास का नाम तो सभी ने सुना ही है । जिन्होने पेड के जिस डाल पर खुद बैठकर उसी को काट्ने का दुस्साहस किया था । शायद कालीदास मुर्ख थे ईसी लिए उनको यह बात पता नहीं थी कि पेड की जिस टहनी को वह काट्ने जा रहे हैं यदि वह कट गया तो सब से पहले वह खुद ही गिर जाएगें । पर फिर भी कालीदास ने पेट की वह डाल काटी जिस में वह खुद बैठे हुए थे । जिसके कारण कालीदास जी की ख्याति दूर, दूर तक पहुंची । अभी भी कुछ लोग कालीदास के रास्ते का अनुसरण कर रहे हैं । पर कालीदास तो सिर्फ मुर्ख ही थे । पर आज के जमाने के कथित कालीदास कपटी और दगाबाज हैं ।
यह कालीदास है नेपाल से वाराणसी आ कर बैठे हुए कुछ कथित विद्धान । जो कहने को तो बनारस हिन्दू बिश्वविद्यालय के स्कालर है, प्रोफेसर है पर यह भारत के लिए अति बेईमान है । यह जिस देश में बैठे हुए हैं, जिसका खा रहे हैं उसी की जड खोद रहे हैं । यह भारत के ही विरुद्ध षडयंत्र कर रहे हैं जो बाद में भारत के लिए खतरा सावित हो सकते हैं । पर भारत सरकार मौन है या उसको पता नहीं हैं इन लोगों की कारस्तानी । यह पिछले कुछ सालों से विदेशी या चिनियां प्रोजेक्ट के तहत यह काम बडे छूपे रुसतम तरीके से कर रहे हैं । जिसके एवज में इनको ढेर सारा पैसा मिलता रहा है ।
वह काम है जितने भी भारत के बडे तीर्थ या चारधाम है धीरे, धीरे नेपाल में उक्त योजना के तहत प्रतिस्थापन करवाना और नेपाल से प्रतिवर्ष चारधाम दर्शन करने के लिए आने वाले तीर्थयात्रियों को गुमराह करना या रोकना । इसी योजना के चलते हाल ही में पूर्व के चतरा धाम में कुंभ का आयोजन किया गया था । इस तथाकथित कुंभ में काशी के विद्धान व बीएचयू के प्रोफेसर भी डुबकी लगाने गए थे । अब इस कुभं में डुबकी लगा कर उनका पाप कितना धुल गया यह तो चतरा की कोशी नदी ही बता सकती है । पर यह किसी सुनियोजित षडयंत्र के तहत कुभं की तरह केदारनाथ और बद्र्रीनाथ नेपाल में ही बना कर वहां के भक्तों को बरगलाना चाहते हैं । कुछ साल पहले भक्तपुर जिले में अवस्थित डोलेश्वर नाथ को केदारनाथ का सिर कह कर खूब प्रचार किया गया था ।
अभी भी सावन के महीनें में इस डोलेश्वर नाथ में भीड लगती है कथित भक्तों की । भक्त चारधामोें में से एक मुख्य धाम केदारनाथ मान कर डोलेश्वर नाथ का दर्शन करते है । प्रति वर्ष भारत आने वाले हजारों भक्तों भरमाने में यह षडयंत्रकारी धीरे धीरे सफल हो रहे हैं । पहले सिर्फ हरिद्धार और काशी में ही होने वाले गंगा जी की आरती को पशुपति आर्यघाट मे शुरु किया गया । उसके बाद धीरे, धीरे जनकपूर के गगा सागर में भी होने लगी । हद तो तब हो गई जब नौका बिहार के लिए प्रसिद्ध पोखरा के फेवाताल में भी आरती होने लगी । ईन्होनें गंगा जी या किसी नदी की आरती को मजाक बना दिया है । जनकपुर का गंगा सागर एक पोखरी है तो पोखरा का फेवाताल भी बस एक ताल है ।
पर नक्ल करने वाले अक्ल के दुश्मनों को बिना आगा पिछा देखे बस नकल करना है । गंगा जी, बद्रीनाथ या केदारनाथ का एक इतिहास है । पुराणों में इनका नाम और महत्व वर्णित है । पर यह बीएचयू के कथित विद्धान जो पुराणों को भी फाड कर उसमें अपने अपने इतिहास लिखना चाहते हैं । आखिर में सौ झूठ के सामने एक सच दब ही जाएगा ऐसा इनका मानना है । अभी सिर्फ चतरा में कुंभ शुरु हुआ है । अब धीरे, धीरे देवघाट और सिरडी में भी शायद कुंभ का आयोजन होने लगेगा । भारत सरकार कान में तेल डाल कर बैठी है । नेपाल सरकार तो चीन की तरफ पहले से ही लबंवत है । वह तो चीन या दूसरे जो कहेगें उसी को मानेगा । क्यों कि इसके बदले में डलर जो मिलती है ।
इतना ही नही भारत में ही पैदा हुए नेपाली या यहां आ कर वर्षों से रह रहे नेपाल के संस्कृत शिक्षक जो काशी के विभिन्न संस्कृत विद्यापीठ में पढाते है । वह नेपाल से विद्या आर्जन करने के लिए काशी आए हुए नेपाली विद्यार्थीयों को बिना परीक्षा दिए हुए ही या परीक्षा में फेल होने पर भी पैसे खा कर पास करवा देते हैं । यहां इनका शिक्षा माफिया चलता है । संस्कृत शिक्षा के लिए पूरे भारत भर में मशहुर है काशी । पर इन शिक्षा के दलालों ने उत्तर प्रदेश के संस्कृत शिक्षा प्रणाली को ही ध्वस्त कर दिया है । इस के लिए काशी के कुछ स्थानीय वासी चितिंत है । नेपाल के गरीब परिवार से यहां संस्कृत पढ्ने आए हुए यह विद्यार्थी इन्ही शिक्षा माफिया के कारण परीक्षा के समय पढते ही नहीं और निश्चिंत हो कर परीक्षा देते हैं । क्योंकि उन्हे मालूम है वह किसी भी हालत में फेल नहीं होंगे ।
तो देखा किस तरह यह कथित नेपाली जन जिन्होनें भारत की नागरिकता ले ली है । हाल ही के चुनाव में मतदान भी किया, इनके पास आधार कार्ड भी है ही । मजे की बात तो यह है कि इनके पास नेपाल की नागरिकता भी है । यह कैसे आराम से जिस थाली में खा रहे हैं उसी को छेद कर रहे हैं । काशी के ललिता घाट स्थित पशुपति नाथ मदिंर के नेपाली आश्रम और विद्यालय से जुडे हुए लोगों की इन कार्यों मे मिलिभगत है । बीएचयू मे जो नेपाली प्रोफेसर है यह ही सारे काम को अंजाम दे रहे हैं । क्यों कि यह कालीदास बन कर उसी टहनी को काट रहे हैं जिसमें वह बैठे हुए है । कालीदास तो माता सरस्वती के वरदान के कारण बाद में मुर्ख से विद्धान बन कर महाकवि कालीदास हो गए । पर यह नेपाल से आए हुए गद्धार वह जलचर की भांति है जो पूरे गंगा के जल को मैला कर रहे है । जो भारत के जो तीर्थ या कुंभ सारे संसार मे विख्यात है उसकी हस्ती को मिटाने के लिए नेपाल से भारत या काशी गए हुए यह आधुनिक कालीदास आतुर हैं । इससे वह खुद भी मिटते जा रहे हैं । बस यह “हम तो डुबेगें ही सनम तुम को भी ले डुबेंगे” जुमले की तर्ज पर भारत से बदला ले रहे हैं ।

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