लाल सलाम की लाल दास्ताँ – फिरोजी आँधियाँ
क्रान्तिकारी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अपनी शारीरिक और नैतिक शक्ति दोनों के प्रयोग में विश्वास करता है और इस सिद्धांत का समर्थन इतिहास की किसी भी क्रांति का विश्लेषण कर जाना जा सकता है
हिमालिनी, अंक अप्रील 2019 | डॉ. संजीव कुमार विचारधाराओं के सार्वभौमिक स्वीकार्य तथा संघर्षों की बुनियादी जरूरतों की पहचान के साथ–साथ सत्ता और पूंजी के निर्मम शोषण पर केन्द्रित यह उपन्यास जहाँ एक ओर जटिल संघर्षरत सिद्धांतों की समझ को सरलता से पेश करता है, वहीं दूसरी ओर अपने लाजवाब कथ्य से क्रांतिकारी संगठनों से संबंधित षड्यंत्रकारी भ्रम के फंदों को भी खोलता है ।
आधुनिक समाज की सबसे बड़ी समस्या है कि उसके पास सूचना और ज्ञान के प्रायः सभी स्रोत पराधीन हैं । स्वाभाविक है कि ऐसे में हमें जो दिखाया, सुनाया और समझाया जाता है, हम क्रमशः वही देखते, सुनते और समझते हैं । इसका दुष्परिणाम यह निकलता है कि सत्ता के लिए जो खतरा होता है वह स्वाभाविक रूप से हमारा दुश्मन घोषित कर दिया जाता है और जो हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा है वह चालाकी से हमारा हितैषी घोषित कर दिया जाता है । इसी तरह की सोची–समझी व्यवस्था को हम नव–उपनिवेशवादी व्यवस्था भी कहते हैं । अब समस्या है कि जिस समाज के अंदर अपने और पराये का बोध ही खÞत्म हो वहां संघर्ष की जÞमीन तैयार करने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती । संघर्ष की जमीन तब तैयार होती है जब शोषित समाज शोषण के खिÞलाफ संगठित होता है और शोषण के खिलाफ तब तक संगठित नहीं हुआ जा सकता है जब तक कि शोषण और शोषक की सही पहचान न हो । ऐसी परिस्थिति में साहित्य के अन्य कई सामाजिक उद्देश्यों में यह भी एक अनिवार्य उद्देश्य हो जाता है कि वह अपने समाज को सही पहचान की शक्ति दे सके और यह कार्य तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब समाज को जागरूक करने से संबंधित लगभग संस्थाएं सत्ता के अधीन हो जाती हैं ।

साहित्य यहीं अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करता है । इस आधार पर यदि हुस्न तबस्सुम ‘निहां’ के उपन्यास ‘पिÞmरोजी आंधियां’ का अध्ययन किया जाए तो आसानी से समझा जा सकता है कि मानसिक और आर्थिक गुलामी के दौर में साहित्य कैसे साहस के साथ शोषण के विरुद्ध खड़ा रहता है । आखिर साहस का यह रस इतनी सुगमता से विपरीत परिस्थितिओं में भी साहित्य को कैसे प्राप्त होता है? यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है । ऐसा भी नहीं है कि साहित्य में अवसरवादी लेखकों का अभाव है लेकिन बावजूद इसके कबीर, तुलसी, प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध, परसाई जैसी मजबूत और साहसी परंपराओं का भी अभाव नहीं रहा है । इनकी परंपरा को मानने वाले साहित्यकारों में आज भी यह साहस देखने को मिल जाता है जहाँ वे अपने क्षत–विक्षत जीवन के बावजूद अपने पक्ष की पहचान भी रखते हैं और अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन भी करते हैं । इस उपन्यास को पढ़कर यह समझा जा सकता है कि यह उसी साहसी परंपरा से निकली रचना है जिसकी प्रासंगिकता तब तक बनी रहेगी जब तक शोषित समाज का संघर्ष जारी रहेगा ।

इस उपन्यास की विवेचना में ‘साहस’ पर विचार करना इसलिए जरूरी है कि एक तरपÞm जहाँ समाज में ‘पहचान’ का संकट बना हुआ है वहीं दूसरी ओर लेखकों में साहस की भी कमी है । लेखन में साहस का मसला खासा महत्वपूर्ण होता है । यही कारण है कि इस विषय पर विचार करते हुए बर्तोल्त ब्रेख्त मानते हैं कि जो भी झूठ, अज्ञान और शोषण से लड़ना चाहता है उसे कम से कम पांच मुश्किलों पर अवश्य विजय हासिल करनी चाहिए । इस तरह ब्रेख्त जिन पांच मुश्किलों का जिक्र करते हैं उनमें सबसे पहला है –‘सच लिखने का साहस’ । वे कहते हैं कि –‘ऐसे समय में सच लिखने का साहस होना चाहिए जब सच का हर तरपÞm विरोध हो रहा हो । पÞmासीवाद के अधीन रह रहे लेखकों के लिए ये भारी मुश्किलें होती हैं ।’ ऐसी कला को वे संघर्ष में हथियार की तरह स्वीकार करते हैं और यही कारण है कि ब्रेख्त ‘लोकप्रिय कला’ को उत्पादक वर्ग की कला से जोड़कर देखते हैं जिसका प्रयोग वे शताब्दियों से राजनीति के शिकार लोगों के पक्ष में मानते हैं ।
हुस्न तबस्सुम में यही ‘साहस’ और ‘पिÞmरोजी आंधियां’ उपन्यास का संबंध उत्पादक वर्ग से जुड़ा हुआ स्पष्ट रूप में चिन्हित होता है ।
इस उपन्यास का प्लॉट नेपाल के नरैनापुर से संबंधित है । जो लोग नेपाल में नेकपा (नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी) के इतिहास से परिचित हैं वे इस बात को भली–भांति जानते हैं कि वहां की दमनकारी व्यवस्था के खिÞलाफ नेकपा ने किस तरह अपना योगदान दिया है । लेकिन यहाँ यह समझने में बिल्कुल भी भूल नहीं करनी चाहिए कि यह उपन्यास मार्क्सवादी संगठनों की गाथाएं तैयार नहीं करता है । लेखिका ने जिस संवेदना से ग्रामीण क्षेत्रों की दुर्व्यवस्थाओं को रेखांकित किया है उससे स्पष्ट हो जाता है कि कथा के केंद्र में मानवीय संवेदना को जार–जार करने वाली व्यवस्था की वास्तविक पहचान और इसकी आंतरिक संरचना में ही इसका प्रतिकार भी है । समूचे उपन्यास में लेखन में विचारधारा का कहीं भी अवास्तविक या दवाब जैसा कुछ भी देखने को नहीं मिलता है ।
कथा के आरंभिक अंश में देहातों में स्कूली व्यवस्था, सरकारी योजनाओं की अव्यवस्था, शिक्षा से वंचित रखने की सामंती व्यवस्था और इन व्यवस्थाओं को पोषित करते रहने की सत्ता–पक्षीय योजनाएं एक ऐसे यथार्थ की दुनियाँ को पेश करती है जिसकी मिसालें सिर्फ नेपाल ही नहीं बल्कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में भी देखी जा सकती है । पढ़ते वक्त पाठक का स्वतः यह भूल जाना कि कहानी नेपाल की ही नहीं भारत की भी है, एक तरह से समस्याओं के एक जैसे होने के कारण ही हो पाता है । वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो परिस्थितियों और संस्कृतियों के अलग–अलग होने के बावजूद भी शोषित समाज को जो बातें एक जगह पर लाकर खड़ी कर देती है वह है उनके शोषण का चरम स्तर । इस संदर्भ में इस उपन्यास की यह खूबसूरती है कि इसे पढ़ते हुए क्षेत्र और जाति जैसी जरूरी बना दी गई धारणाएं स्मृति में नहीं रहती है बल्कि सिर्फ शोषण और मानवीय वेदनाएं ध्यान में रह जाती हैं । यह लेखन–कला इस उपन्यास की विशेषता भी है और हमारे समाज की जरूरत भी । ऐसे ही कारण रहे होंगे जब मार्क्स को कहना पड़ा होगा कि –‘दुनिया के मजदूरों एक हो ।’
‘अब गँववम सिच्छा जरूर फैली’(अब गाँव में शिक्षा जरूर फैलेगी) । गाँव वालों में यह उम्मीद सिपÞर्m शिक्षा तक सीमित नहीं थी बल्कि इससे जुड़ी हुई थी ‘प्रचंड’ गरीबी, भुखमरी और अव्यवस्था से निकलने की छटपटाहट, मजूरी तक की व्यवस्था के लिए नदी पार कर जंगल की लकडि़यों को बेचने जाने जैसे कठिन जीवन से मुक्ति । ललित जो स्वयं पिता के कुसमय मृत्यु के कारण पढ़–लिख नहीं पाता है उसे सरकार द्वारा प्रत्येक ग्राम समिति के लिए ज्ञण् से द्दण् करोड़ रूपये की मदद से बहुत उम्मीद जगती है । उसकी उम्मीद में वह गाँव नजर आने लगता है जहाँ दवाइयां मिले, मजदूरी की व्यवस्था हो और श्रापित जीवन से मुक्ति मिले । लेकिन देखते–देखते योजनाओं की करोड़ो राशि का गबन हो जाता है । प्रधान मास्टर को सरकार से पाए गए करोड़ों की राशि से मात्र छण् हजार का चेक देते हुए कहता है – ‘ विद्यालय में खूब रंग–रोगन करवाय देव । बकिया बालक बलिकन कै नाव काटि कै भगाय देव । ई सब कीड़ा–मकोड़ा का पढिवा ।’
सारा सपना जैसे टूट कर बिखर जाता है । ललित और उसके साथी आवाज बुलंद करते हैं और अपराधी साबित हो जाते हैं । ललित का दूसरा साथी राम समुझ कहता भी है कि –‘ सेठ नहीं होना चाहता मगर कुछौ आमदनी का स्त्रोत तो होवेक चाही । हमरे पास उहव नाई हय । कत्ता पिछड़ा हमारा ग्राम । हम हत्या, अपराध न करी त करी का ?’
हमारे समाज में जिसे हिंसा कहा जाता है या जिन संगठनों की व्याख्या में हिंसा को आधार बनाकर उनकी समस्याओं को खÞारिज कर दिया जाता है उसे ठीक–ठीक समझने के लिए रामसमुझ के इस कथन पर गहराई से विचार करना आवश्यक हो जाता है कि आखिर इस तरह की परिस्थितियाँ किन कारणों से पैदा होती हैं ।
मास्टर जी और मधु श्री के संवाद से इन संदर्भों को और भी गहराई से समझा जा सकता है । मास्टर जी प्रशासनिक हत्या पर कहते हैं कि—‘ अरे बहिनी, कानून अउर सरकार सनी भला कउनमा पाला मार पावा हय ।’ इसके जवाब में मधु श्री कहती है कि –‘ ये न कहिए मास्टर जी… । विदेशों में देखिए कितनी क्रांतियाँ हुई हैं । सब उत्पीडि़त और आम आदमी ने ही किया । शोषण कहाँ बर्दास्त किया गया । तानाशाह नदी(नालों में मुंह छिपाते फिरे ।’
लड़ाई के संदर्भ में दुनिया भर के इतिहास का जिक्र जो संघर्ष को हिंसा के आधार पर नहीं बल्कि एक अधिकार के रूप में शोषितों द्वारा शोषकों के खिलाफ लड़ाई को प्रतिष्ठित करती है, का जिक्र कथ्य को और मजबूती प्रदान करता है । साथ ही स्वतः हिंसा और क्रांति के स्वरूप पर भारतीय क्रांतिकारी विचारों के शिखर पुरुष शहीद भगत सिंह की उस व्याख्या का भी स्मरण हो जाता है जिसे उन्होंने क्रांति और हिंसा के बीच पÞmर्क करने के संदर्भ में प्रतिपादित किया था । भगत सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा था कि –
–‘‘क्रान्तिकारी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अपनी शारीरिक और नैतिक शक्ति दोनों के प्रयोग में विश्वास करता है और इस सिद्धांत का समर्थन इतिहास की किसी भी क्रांति का विश्लेषण कर जाना जा सकता है ।’
भगत सिंह के इन विचारों के बावजूद क्रांतिकारियों को बुजदिल और घृणित कहते हुए विचारशील लोगों से क्रांतिकारियों को सहयोग न करने के लिए अपील किया गया था जिसका प्रतिवाद इस लेख में देखा जा सकता है । इसी क्रम में जवाब में भगत सिंह ने लिखा भी था कि— ‘यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिले तो हम उद्देश्य छोड़ देंगे, निरी मूर्खता है’ ।
आज भी घृणा का यह व्यवसाय सिपÞर्m इसलिए क्रांतिकारियों को लेकर फैलाया जाता है क्योंकि तथाकथित बुद्धिजीवियों के यहाँ न तो हिंसा और क्रांति के बीच पÞmर्क करने की सहुलियत है और न ही शोषित समाज के प्रति किसी प्रकार की प्रतिबद्धता है । वे एक खास किस्म की बौद्धिक जुगाली में व्यस्त हैं । ऐसे बौद्धिकों के संदर्भ में ही ग्राम्शी ने कहा था कि – ‘ऐसी किसी भी बौद्धिक गतिविधि की, जो बुद्धिजीवी के राजनीतिक और सामाजिक माहौल से पूरी तरह कटी हुई प्रतीत होती है, नियति यही है कि वह यथास्थिति का उत्सव बन कर रह जाए ।’
लोग राज्य का विरोध करते वक्त यह कहना नहीं भूलते हैं कि मैं ‘राज्य का विरोध तो कर रहा हूँ लेकिन मेरा रास्ता हिंसा का नहीं है’ । ध्यान रहे ऐसा जवाब एक प्रकार से चालाकी तो है ही साथ ही भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का अपमान भी है । अगर थोड़ी देर के लिए हम इसे नक्सलवाद या माओवाद (जिसका जिक्र उपन्यास में विस्तार से देखने को मिलता है) के उदाहरण से जोड़कर देखें तो अधिकांश लोग इस विषय पर बात करते वक्त घृणा भरी उबासी के साथ–साथ हिंसा शब्द की व्याख्या सीधे नकार भाव में कर देते हैं और इस नकार के साथ ही खत्म हो जाता है आदिवासियों की समस्या, किसानों की आत्महत्या और पूंजीवादी शोषण । लेकिन यह नकार किसी भी दृष्टिकोण से बहस तो नहीं कहा जा सकता है । अगर वाकई नकार भाव से भरे बुद्धिजीवियों में तर्क है तो वे अपने मंचों पर उन्हें बुलाएँ , प्राइम टाइम में उनके साथ बहस करें, अपने पत्र–पत्रिकाओं में उनके विचार प्रकाशित करें । वास्तव में तब पता चलेगा कि तर्क या जिरह एकपक्षीय नहीं होता है । एक पक्ष को गौण रखकर और दूसरे पक्ष को मुख्य बनकर खुले मैदान में अपनी ही पीठ थपथपाने को ही शायद कुछ लोग तर्क और बहस मानते हैं । ध्यान रहे कि जो लोग आज के समय में आदिवासियों की समस्याओं पर लिख पढ़ रहे हैं वे प्राइमरी नहीं सेकेंडरी हैं । ये सेकेंडरी ही इतने तर्क दे देते हैं कि वर्चस्ववादी संगठनों के लिए नागवार गुजरता है । अब फर्ज कीजिये प्राइमरी ने तर्क करना शुरू किया तब क्या होगा ? तब गाँधीवादी दर्शन के गुणगान में कीर्तन करना मुश्किल हो जाएगा । यथास्थिति में परिवर्तन न होने के बावजूद भी यदि किसी को हृदय–परिवर्तन की उम्मीद है तो शायद उसमें नव–उपनिवेशवादी शोषण तंत्र की समझ नहीं है ।
‘फिरोजी आंधियां’ उपन्यास ऐसे कई सवालों पर विचार करने को हमें विवश करता है । ललित की मां और नारायन को मारकर पुलिस नदी में फेंक देती है । ललित की माँ की सांस चल रही होती है लेकिन वह जिन्दगी भर न हिल–डुल पाती है और न जबान से कुछ बोल पाती है । नारायन मर चुका होता है और ललित की मां की जुबान जिन्दगी भर के लिए बंद हो जाती है । दरोगा इसका इल्जाम उसके बेटे और साथियों पर लगाते हुए उसे माओवादी घोषित करता है ।
अजीब विडंबना है । एक बेटा जो अपनी बूढी माँ को सिर्फ अपनी जिम्मेदारी ही नहीं समझता बल्कि उस बूढी माँ की दुनिया में घुला–मिला होता है उसी बेटे पर उसकी माँ की दुनिया को उजाड़ने का इल्जाम भी लगाया जाता है और उसके साथ ही उसके दोस्तों पर माओवादी होने का भी तगमा लटका दिया जाता है । ललित और उसके साथी माओवादी शब्द को पहली बार अपने लिए इस्तेमाल होने के बाद ही सुनते हैं । उन्हें नहीं पता कि माओवादी होना क्या होता है । ललित के साथी आपस में बात करते हैं – ‘दरोगवा हम लोन का माओभादी कहत रहा । । माओभादी । का मतलब? का जानै उके मैय्याक… (उसकी मां की) ।’
आसानी से समझा जा सकता है कि ललित और उसके साथियों के पास अपना पक्ष रखने के सारे अवसर बंद हैं । उसे जो साबित किया जायेगा वह स्वतः साबित होने के लिए श्रापित होगा ।
जिस तरह क्रांति के संदर्भ में हिंसा की व्याख्या की जाती है उसी तरह अनेकों प्रसंग हैं जिसपर विचार करना जरूरी हो जाता है । नरैनापुर की स्थिति का चित्रण करते हुए लेखिका स्पष्ट करती है कि – ‘गाँव की स्थिति बद से बदर होती जा रही थी । उनपर अब दोहरे अत्याचार हो रहे थे । माओवादी आते तो वो भी गाँव वालों को ही तंग करते । खाना मांगते, पैसे मांगते, कपड़े छीन ले जाते… आर्मी वाले आज भी शक की बिना पर किसी को भी पकड़ ले जा सकते थे । उन्हें माओवादी कह कर मौत के घाट उतार सकते थे । गाँव की औरतों के साथ कुछ भी कर सकते थे और उस घर का कोई भी पुरुष इसका विरोध करता तो उसे मौत के घाट उतार सकते थे । इस तरह पुलिस रिकॉर्ड में आधा दर्जन से ज्यादा माओवादी मारे जा चुके थे । जिनका नाम माओवादी के नाम से रिकॉर्ड में था वास्तव में वे सारे गरीब और विपन्न लोग थे ।’
अब यहाँ ध्यान से देखें तो दो पक्ष सामने आते हैं । पहला माओवादियों द्वारा परेशान किया जाना और दूसरा आर्मी द्वारा अत्याचार करना । तथाकथित तटस्थ बुद्धिजीवियों द्वारा पहले प्रसंग की चर्चा गाँव वालों को आधार बनाकर खूब की जाती है । लेकिन उन्हीं गाँव वालों को आधार बनाकर दूसरे पक्ष की चर्चा की उपेक्षा भी खूब देखने को मिलती है । दूसरे पक्ष पर बात करते ही निष्पक्षता और तटस्थता ठीक वैसे ही खतरे में आ जाती है जैसे हिंदू धर्म के अतिरिक्त दूसरे धर्मों की निंदा से सेकुलरवाद खतरे में आ जाता था । उपन्यास के तहत ही विचार किया जाए तो ललित से जब पूछा जाता है कि तुम लोग गाँव वालों को क्यों परेशान करते हो? तब वह जंगल के जीवन और भूख–प्यास की तड़प का वर्णन करते हुए कहता है कि – ‘परेशान का करित हय मैडम… भूख प्यास हमहूं लोन का लागत हय । त कहाँ खाबै जाई हम सभै । सीधे–सीधे खवैक दई दें त काहे हम लोन उनका परेसान करी?’ माओवादी पक्ष का यह जवाब है जो यथार्थ के बेहद नजदीक है । लेकिन आर्मी या पुलिस पक्ष के जवाब का तो कोई मसला ही नहीं बनता है । क्योंकि वहां सवाल करना ही जुर्म है । यही हाल हमारे समय और समाज का भी है । जहाँ सवाल करने में कपकपी छूट जाती है वहाँ जघन्य से जघन्य अपराध करने की छूट भी होती है और कोई सवाल भी नहीं किया जाता है । यह वहशियाना चरित्र है हिंसा और माओवाद को व्याख्यायित करने का हमारे बुद्धिजीवियों के पास ।
उपन्यास में ऐसे कई प्रसंग हैं जहाँ पूंजीपतियों के शोषण के विरोध में माओवादियों द्वारा उनकी मिल और फैक्टरी जला दी जाती हैं लेकिन बार–बार मजदूरों को आगाह करके इस कार्य को अंजाम दिया जाता है ताकि शोषित समाज के लोगों को नुक्सान से बचाया जा सके । स्पष्ट है कि इन माओवादियों के निशाने पर शोषक समाज है, शोषित समाज नहीं । फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अंत में नैरेनापुर और आस–पास के गाँव वाले ललित और उसके साथियों के साथ ही इस लड़ाई में शामिल होते हैं । सिपÞर्m पुरुष ही नहीं, बूढ़े और महिलाएं भी । दिलचस्प बात यह भी है कि इनके दलों का पूर्व या वर्तमान के किसी माओवादी संगठनों से संपर्क नहीं है लेकिन ये माओवादी होना और कहलाना दोनों पसंद करते हैं । यह विचारधारा के प्रभाव का ज्वलंत उदाहरण है जिसके मूल में अत्याचार का विरोध है ।
शोषण और अत्याचार का सिलसिला इतना अधिक बढ़ जाता है कि ललित की बहन मालती के साथ आर्मी वाले बालात्कार करते हैं और वह रात भर अपने भाग्य पर रोती रहती है । मालती के अतिरिक्त सुभान की बीवी, लखैया की बेवा भाभी, रामसमुझ की साली और रमेश की बीवी को भी वे अपनी हवस का शिकार बनाते हैं । दर्जनों गाँव वालों को मारकर माओवादी की लिस्ट में चढ़ा दिया जाता है । गाँव वाले जानते हैं कि यह लिस्ट झूठी है लेकिन वे कुछ नहीं कर पाने के लिए विवश हैं । लखैया की बेवा भाभी सामाजिक दवाब में अपने बच्चों समेत राप्ती नदी में हमेशा के लिए समा जाती है । लेकिन प्रतिवाद यहीं समाप्त नहीं होता है ।
ललित और उसके साथी शहर में अपनी पहचान को छुपाकर जैसे–तैसे काम कर रहे होते हैं । जिस कैलास आनंद के यहाँ वे काम करते हैं वह मार्क्सवादी रुझान का अध्ययनशील व्यक्ति होता है । ललित और उसके साथी को वह रोचक तरीके से मार्क्स, लेनिन, माओत्से तुंग और लाल सेना के बारे में बताता है । अब तक वह जिस माओवादी होने का तगमा लिए भटक रहा था उसकी ठीक–ठीक जानकारी उसे अब होती है । लेकिन इस जानकारी से वह घबराता नहीं है और ना ही किसी प्रकार का पछतावा महसूस करता है । लखैया कहता भी है कि –‘औ उ दरोगवा सार (और वह दरोगा साला–गाली) कहत रहा माओभादी मतलब आततायी… सार ।’ दोनों मुस्कुराते हुए कहते हैं कि –‘अब हम लोन हुए माओवादी ।’
इन प्रसंगों में ध्यान से देखा जाए वर्तमान बौद्धिक जगत खÞासकर वामपंथियों से सहानुभूति रखने वालों के नाम पर सिपÞर्m बौद्धिक जुगालियां ही देखने को मिलती हैं और यह खास सहूलियतें भी कि वे जब चाहें खुद को मार्क्सवादी घोषित कर लें और जब चाहें उससे मुक्त होकर उसकी निर्मम आलोचना कर दें । इसपर तीखा प्रहार करते हुए लेखिका ने परिस्थितियों का स्वाभाविक चित्रण किया है । कौशल आनंद द्वारा भाषण देना और उसका पÞmीड बैक लेना कि वह कैसा बोला या बोलते वकÞ्त कैसा लग रहा था, ठीक वैसा ही था जैसे कि लोग बलात्कार की घटनाओं पर प्रतिरोध करते वक्त मुस्कुराकर ‘सेल्फी’ लेना नहीं भूलते या यह जानकारी लेना नहीं भूलते कि उसके ओजस्वी भाषण से लोग प्रभावित हुए या नहीं ? ललित इसीलिए कौशल आनंद के साथ लड़ाई लड़ने के प्रस्ताव पर कहता है कि –‘आप लड़त हव बोली कय लड़ाई औ हम लडित है रोटी कय लड़ाई ।’ ललित के इस जवाब का गंभीरता से अध्ययन किया जाय तो आसानी से इस पÞmर्क को समझा जा सकता है कि आखिर लोग उस वेदना तक क्यों नहीं पहुँच पाते जिसके गर्भ से प्रतिरोध पैदा हुआ है । आखिर क्यों यह प्रतिरोध ललित और उसके साथियों से होते हुए समूचे गाँव वालों के लिए एक पवित्र लड़ाई बन जाती है और विचारकों के लिय मात्र हिंसा ।
लेकिन यहाँ यह भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि बहुत कम पढ़े लिखे होने के बावजूद भी ललित और उसके साथी अध्ययन को खासकर क्रांतिकारी विचारकों के विचार को पढ़ने–जानने को महत्वपूर्ण मानता है । लखैया के पूछने पर कि ‘तुम क्या करोगे इस किताब को पढ़कर?’ इसके जवाब में ललित कहता है कि –‘ई किताब नाय… हमार लोगन कय कुंजी आय’ । ललित विचार के इस महत्व को स्वीकार करता है । अब यहाँ यदि इसी विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए कि अध्ययन और क्रांति–कर्म के बीच क्या संबंध है तो बहुत सी वर्तमान उलझनों को सुलझाया जा सकता है । क्रांतिकारी गतिविधि में भाग लेना और क्रांतिकारी विचार तथा विचारकों को आत्मसात करना दोनों संघर्ष के क्षेत्र में सकारात्मक स्थिति है । लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब न तो क्रांतिकारी गतिविधियों में सहभागिता होती है और न ही उन विचारों का गहराई के साथ अध्ययन किया जाता है । यही कारण है कि ऐसे विद्वान् जो इन दोनों स्थितियों के बाहर होते हैं वे समय–समय पर अपना पक्ष बदल लेते हैं । वे इस भ्रम के शिकार भी होते हैं कि वे मुद्दों के आधार पर सबसे अधिक निष्पक्ष हैं जबकि हकीकत यह है कि वे किसी न किसी रूप में बदलाव के विरुद्ध हैं और मुद्दों के पैदा होने के कारणों से पूरी तरह कटे हुए, एकदम कोरे और अनभिज्ञ ।
यह समस्या अकादमिक जगत के नौजवानों में भी भारी संख्या में देखी जा सकती है । कहीं–कहीं तो स्थिति इतनी खÞराब है कि खÞुद को मार्क्सवादी समझने वालों का लेखन और विचार पूर्ण रूप में मार्क्सवाद के विरोध में होता है । इसलिए अध्ययन और सहभागिता से संबंध स्थापित करता यह प्रसंग वर्तमान यथार्थ को समझने का आधार मुहैया कराता है । दिक्कत यह है कि इस आधार और प्रसंग की समझ के लिए भी अध्ययन की वैसी ही जरूरत है जैसा कि ऊपर जिक्र किया गया है ।
यह उपन्यास नेपाल में मार्क्सवादी संगठनों के इतिहास के अध्ययन के साथ–साथ भारत में तेलंगाना आन्दोलन और नक्सलबाड़ी आन्दोलन तथा आजादी के पूर्व और बाद के स्त्रीवादी आन्दोलन के अध्ययन की भी मांग करता है ।
मधु श्री जैसे पात्र का चित्रण लेखिका ने बहुत ही ठोस तथा यथार्थ रूप में करते हुए अद्भुत शैली का प्रयोग किया है । मधु श्री गाँव वालों को इस रास्ते पर जाने से रोकती है । वह ललित को भी समझाती है । मधु श्री एक शिक्षिका और फिर बाद में एन । जी । ओ की सदस्य के रूप में गाँव में काम करती है । उसके चित्रण में स्त्रीवाद की झलक स्पष्ट दिखाई देती है । कथा के आरम्भ में दुनिया भर की क्रांति का उदाहरण वह स्वयं देती है लेकिन बाद में जैसे ही उसका अनुसरण किया जाने लगता है, वह इसे जायज नहीं मानती है । वह गाँव वालों की भरसक मदद भी करती है, आर्मी वालों को अत्याचारी भी समझती है लेकिन एक एन । जी । ओ के सदस्य के रूप में वह दूसरे माध्यम से शोषण का अंत चाहती है । उसकी रिपोर्ट और उस रिपोर्ट पर उसके ही लोगों का अविश्वास एक तरफ एन । जी । ओ की शैली को स्पष्ट करता है तो दूसरी ओर सुधार के व्यापक कार्यक्रमों के ठीक बाद गाँव का धूं(धूं जल जाना और स्थितियों का और भी कष्टप्रद हो जाना एन । जी । ओ की सीमा भी तय कर देती है । लेकिन एक स्त्रीवादी की भूमिका में वह अधिक सबल दिख रही होती है ।
बालात्कार के कारण गर्भवती कुंवारी बहन के कष्ट से तिलमिलाए ललित को बार–बार प्रयासों से मधुश्री उसे सरकार के समक्ष आत्म–समर्पण के लिए तैयार कर लेती है । लेकिन उसके सत्ता–पोषित स्त्रीवाद को धोखा तब पहुँचता है जब आत्मसमर्पण के नाम पर ललित को मधुश्री के माध्यम से जंगल से बाहर निकलवाकर उसके मुंह में राइफल की नोंक ठुसकर उसका पेट गोलियों से भर दिया जाता है । मधु श्री दुखों की उस अंतहीन अवस्था में पहुँच जाती है जहाँ शुन्यता के अतिरिक्त कुछ नहीं होता ।
दरोगा कहता है –‘चलो लाश समेटो । एक और माओवादी मरा ।’
सधे हुए सुर में मधुश्री की आवाज आती है—‘नहीं दरोगा जी, वह मरा नहीं है । वह जिंदा है ।’ मधुश्री जैसे शून्यता से एक नयी भाषा लेकर लौटी हो । उसने ललित के बहते लहू से उसके माथे पर लिखा –‘लाल सलाम’ । फिर वह स्वयं कहती है –‘लाल सलाम’ ।
इस विदारक स्थिति को स्त्रीवाद और मार्क्सवाद के नजरिये से देखा जाए तो एक का अंत दूसरे का आरंभ बनकर उभरता है ।
उपन्यास का यह अंत जैसे किसी बड़े आरंभ का संकेत देती है । हिंदी उपन्यास में ‘रंगभूमि’ के सूरदास के अंत के बाद ऐसा अंत जो किसी क्रांतिकारी आरंभ का उत्थान बिंदु हो ‘फिरोजी आंधियां’ में देखने को मिलता है ।
शोषण के विरुद्ध साहित्य की इस अभिव्यक्ति की प्रासंगिकता समय के साथ और बढ़ती जाएगी और यह उपन्यास निश्चित रूप से हर काल में अपनी प्रतिष्ठा को प्राप्त करेगा ।
फैजÞ साहब के शब्दों में कहा जाय तो कहना पड़ेगा कि–
‘हर रागां–ए–खून में चरागाँ हो
सामने फिर वो बेनकाब आये
कर रहा था गम–ए–जहाँ का हिसाब
याद तुम आज बेहिसाब आये ।’
संजीव ‘मजदूर’ झा


