अमृत से वंचित
सियाराम मैं सव जग जानी, करौ प्रणाम जोर जुग पानी
हिमालिनी, अंक अप्रील 2019 | शिव प्रसाद पाठक महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था भगवान श्री कृष्ण पाण्डवों से विदा लेकर द्वारिका लौट रहे थे । मार्ग मे महान तपस्वी मुनि उतंक से भेंट हुई । अभिवादन पश्चात मुनि से कौरव और पाण्डवो का कुशल क्षेम पूछा । तपस्या मे लीन रहने के कारण मुनि को मालूम ही नही हुआ कि महाभारत युद्ध भी हुआ था । उस समय युद्ध राजाओ के मध्य खुले मैदान से सैनिकों के साथ लडे जाते थे । नगर ग्राम व वन के निवासी युद्ध से कभी प्रभावित नही होते थे ।
भगवान श्री कृष्ण ने मुनि को कहा कि महाभाारत के युद्ध में कौरवो का वंश नाश हो गया, सैकड़ो राजा व वन्धु वान्धव मारे गये । इस पर उतंक मुनि उत्तेजित हो गये और भगवान श्री कृष्ण को ही दोषी मानने लगे । भगवान श्री कृष्ण ने उतंक मुनि को अपना विश्व रूप दिखाया और कौरवो के हठ, अद्धर्म, अन्याय और पाप का विवरण दिया । मुनि उतंक सन्तुष्ट हो गये । भगवान श्री कृष्ण ने उतंक मुनि से वर माँगने को कहा । पहले तो मुनि ने वर माँगने से मना कर दिया पर भगवान श्री कृष्ण के बार बार आग्रह करने पर उतंक मुनि ने भगवान श्री कृष्ण से कहा ‘जव कभी हमको प्यास लगे तो जल उपलब्ध हो’ यही वर दीजिए ।
भगवान श्री कृष्ण तथास्तु कह कर द्वारिका चले गये । कुछ समय के पश्चात एक दिन ग्रीष्म ऋतु से मुनि उतंक को तीव्र प्यास लगी, उन्होंने भगवान श्री कृष्ण का स्मरण किया । तुरन्त उन्होंने देखा एक चाण्डाल अपने डरावने कुत्ते के साथ चमड़े के मसक में पानी लिये हुये उनसे पानी पीने का आग्रह कर रहा है । मुनि उतंक ब्राहमण थे जाति के प्रचलित संस्कारों ने विदवत्ता और ज्ञान पर विजय प्राप्त कर ली । उन्होंने सोचा कि इस चिथडे पहने निम्न जाति के चण्डाल द्वारा छुआ गंदा जल मैं कैसे पिऊँ । उन्होंने प्यास होते हुये भी जल नही लिया ।
चाण्डाल ने हंसते हुये अनेकों बार जल ग्रहण करने की याचना की लेकिन सव व्यर्थ रहा उतंक मुनि नाक, मुख, भौं सिकोड़ते प्यासे ही वने रहे । उतंक मुनि भगवान श्री कृष्ण को झूठा वरदान देने वाला कहकर भला बुरा कहने लगे । चण्डाल बार बार मसक को आगे बढ़ाते हुये जल ग्रहण करने की याचना करता रहा । चाण्डाल का बार बार आग्रह मुनि को क्रोधित बनाता रहा क्रोध बढता ही रहा । उतंक मुनि ने एकाएक देखा चाण्डाल और उसके भयानक कुत्ते अदृश्य हो गये । तब उनको अपनी भूल पर बहुत दुख हुआ । सोचने लगे मेरे ज्ञान ने मेरा साथ क्यों नही दिया । शायद भगवान ने मेरी परीक्षा ली है ।
मानव भगवान का रूप होता है मैने चाण्डाल को अछूत और निम्न क्यों माना यह मेरी भूल है इस प्रकार उतंक मुनि ने पश्चाताप किया । तभी भगवान श्री कृष्ण सामने प्रकट हो गये । मुनि वोले हे पुरुषोत्तम ब्राह्मण को चाण्डाल के हाथ का पानी पिलाकर उसे भ्रष्ट करना क्यों चाहते थे क्या आपने यह उचित किया । श्री कृष्ण हंसकर वोले मुनिवर आप जल पीना चाहते थे, मैने इन्द्रदेव से कहा कि मुनि उतंक को अमृत पिला दो । उन्हों ने इस शर्त पर हामी भरी कि वे चाण्डाल के रूप में जाकर मसक से उतंक मुनि को अमृत पिलाएँगे । यदि उतंक मुनि ने नही पिया तो इसका दोष उन्हीं पर होगा । इस तरह हे मुनि आपको अमृत नही मिला । आप तो तपस्वी है । आपने नीच और ऊंच का भाव ज्ञानी और महात्मा होते हुये भी अपने मन में क्यों आने दिया । इस तरह मैं इन्द्र से परास्त हो गया और आप अमृत से वंचित । उतंक मुनि इस पर वहुत लज्जित हुये । यह पौराणिक कथा हमें शिक्षा देती है कि मानव मानव या जीव जीव में भेद करना ईश्वर को मान्य नही है इस लिये मानस में आया है । ‘ सियाराम मैं सव जग जानी, करौ प्रणाम जोर जुग पानी’
साभार महाभारत कथा
नेपालगन्ज उपमहानगरपालिका–६ फुल्टेक्रा, नेपालगन्ज

