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सावन की ये रिमझिम  पड़ती फुआरे… पहुँचा देती यादों के गलियारे मॆं…सविता वर्मा “ग़ज़ल”

 

“हम-तुम”

सावन की रिमझिम फुहार 
और धरती पर बूँदों के गिरने से 
बज  उठता संगीत मधुर….
धूप मॆं सूखती थाली मॆं 
रखी मिर्ची….
तैरने लगती नाव सी कागज की 
और थाली देती 
पनाह बूँदों कॊ बारिश की !
बेपरवाह से हम-तुम नहीँ देख पाते 
भीगती मिर्ची और तालाब बनती थाली…
माँ की आँखों से बचते-बचाते 
निकल पड़ते   फ़िर लेकर छतरी 
बचने कॊ बारिश से….नहीँ….नहीँ…
बचने कॊ नहीँ भीगने कॊ एक साथ…
छतरी के ऊपर पड़ती बूँदें….
टप…टप…टप 
धड़क उठता है दिल और फ़िर
भीगे-भीगे से वो पल…
आजाते करीब और भी हम-तुम
जब एक ही छतरी मॆं 
भीगते-भिगाते हम-तुम….
और तेज हवा का झोखा 
ले जाता उड़ाकर छतरी….
तुम्हारा मुँह देखने लायक होता…
मगर ! मैं…मैं तो झूम उठती और 
फ़िर….भीगती बारिश मॆं…
सच !सावन की ये रिमझिम 
पड़ती फुआरे…
पहुँचा देती यादों के गलियारे मॆं…
जहाँ भीगा करते थे हम-तुम 
दुनियाँ से अंजान !
अपनी ही धुन मॆं दो दीवाने…
आज सब लगता है सिर्फ…
एक सपना सा….
वक्त की गुमनाम गलियों मॆं 
खो गये हम-तुम !!

सविता वर्मा “ग़ज़ल”

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