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पैसा क्या चीज है जो सबके पास नहीं होता ? मनुष्य के पास लगभग ३,००० वर्ष पहले आया था : कैलाश महतो

कैलाश महतो, नवलपरासी | पैसा क्या है ? जीवन का आधार है, जिने का तजुर्बा है, हिम्मत है, सम्मान का साधन है । इसे सब पाना चाहता है । सब उतना ही इससे प्यार और मोहब्बत करता है । मगर यह सबके पास जाता नहीं । जाता भी है तो ठहरता नहीं । इसे सबका प्यार भी पसन्द नहीं आता । नेता हो, साधु–सन्त या भगवान् ही क्यों ना हो, सबको जन–प्यार और पैसा दोनों चाहिए । पैसा भगवान् से बडा और सम्मानित सा है जिसे हर लोग नहीं भाता । इसे हम कठोर कहें, सरारती कहें या बेहाया । इसका एक और रुप सामने आता है कि यह राजननेता, दलाल, तस्कर, भ्रष्ट और गुण्डों का रखैल भी है ।
आदमी को पैसा हरेक उमर में हरेक रुप में काम आता है । बच्चों को दो चार रुपये चाहिए टफी या चकलेट खाने के लिए । विद्यालय जाने बाले बच्चों को टिफिन खर्च और स्कूल फी के लिए पैसे चाहिए । बुढापे में जिन्दा रहने के लिए और यूवा अवस्था में ऐश करने के लिए, घर और गाडियाँ खरीदने के लए । समान्य भी रुप से हिसाब निकालें तो एक बात साफ होता है कि एक स्वस्थ आदमी जागृत अवस्था में केबल सेक्स के बारे में ७२०० बार सोंचता है तो फिर पैसे के लिए वह कितने बार सोंचता होगा । ज्ञात हो कि चेतन या अचेतन अवस्था में हरेक सेक्स्यूवल सोंच के साथ आर्थिक कारोबार भी जुड जाता है, चाहे वह पत्नी के साथ ही क्यों न हो । शुद्ध मोहब्बत करना ही क्यों न हो । इसके आलावे घर, मौज, मस्ती, गाडी, कपडे, दवाई, नातेदारी, यारी, दोस्ती, दान, चन्दा, खानपिन, रहनसहन, पढाई लिखाई आदि समस्त अवस्थाओं में पैसे ही चाहिए ।
उपरोक्त आधारों पर पैसा का परिभाषा यह हो जाता है ःMoney is anything that is commonly accepted by a group of people for the exchange of goods, services, or resources.  परिभाषा को मानें तो यह स्पष्ट होता है कि वह हर चीज पैसा है जिसे एक आदमी स्वीकार कर दूसरे आदमी को बदले में कुछ देता है । अर्थशास्त्री भी इस बात को मानते हैं ।
पैसा आवश्यकता, साधन, जीवन का आधार भी है । इसिलिए इसकी आविष्कार आजसे तकरीबन ५,००० ई.पू धातुओं के अनेक रुपों को mयलभथ के रुप में प्रयोग किया गया था । बाद में ७०० ई.पू पश्चिमी जगत में Lydians जों ने पहली बार धातु का पैसा निर्माण की और लेनदेन प्रणाली को सुविधापूर्ण बनाया गया । विकास के क्रम में ही चीनियों ने प्राचीन काल में ही कागज के रुपये बनाये जो लगभग ई.सं. ९६० से आम रुप में चलन में आया था । कुछ अर्थशास्त्री इतिहासकारों का मानना है कि पैसे का चलखेल आदमी के जीवन में आज से लगभग ३,००० वर्ष पहले हुआ था ।
अधिकतर लोग यह मानते हैं कि पैसा कुछ लक्ष्यों को प्राप्त करने के साधन के ञआलावा और कुछ भी नहीं है । और हकिकत भी यही है कि कागज से निर्मित पैसा के साथ में मानव ने अपना विश्वास के साथ कुछ महत्वपूर्ण बातें जैसे, प्रेम, औकात, खुशी, सुरक्षा, नियन्त्रण, निर्भरता, आत्मनिर्भरता, स्वतन्त्रता आदि जोड दी है । कभी कभी पैसा आदमी को सभ्यता भी सिखा देती है । सम्मान दिला देती है । चेतना की धार बहा देती है ।
हिब्रु विश्वविद्यालय इजरायल में प्राध्यापक रहे अक्सफोर्ड ग्र्याजुएट यूवल नोआ हरारी ने अपने सेपियन्स् नामक पुस्तक में आधुनिक मानव का ७० हजार वर्ष के इतिहास को विचारोत्तेजक ढंग से वर्णन किया है । सेपियन्स् ः अ व्रिफ् हिष्ट्री अफ् ह्यूमनकाइण्ड में हरारी लिखते हैं, “ओसामा विन लादेन ने अमेरिकी धर्म, संस्कृति और राजनीति को असीम घृणा करते थे । मगर अमेरिकी डलर से उनका गहरा प्रेम रहा ।” हरारी का कहना है कि मानव निर्मित मिथकें, राजा वा धर्म हरेक जगह और अवस्थाओं में सफल होना जरुरी नहीं है । हुए भी नहीं हैं । मगर पैसा सफल रहा है । पैसा मानव जीवन का सबसे उत्तम आविष्कार है जो दुनियाँ के किसी भी बाजार, गाँव या शहर में आदमी को जिला देता है । इसमें इतना आकर्षण और मानव विश्वास होता है कि संसार के अपरिचित स्थान व समूहों में भी सहकार्य का वातावरण सहज ढंग से निर्माण कर देता है ।
धर्म के नाम पर बनाये गये मठ, मन्दिर, चर्च या मस्जिद वस्तुगत आधार हैं । वह मिल जाते हैं । मगर धर्म मानव मस्तिष्क का उपज है । राष्ट्र या राष्ट्रवाद हमारी कल्पना की उपज है । लेकिन उससे जुडे भूगोल और जनता वस्तुगत सत्य है ।
वैसे ही पैसे बनने बाले कागज या सिक्का में प्रयोग होने बाले धातु वस्तुगत यथार्थ है, वहीं उनसे जुडे मूल्य मानव निर्मित भ्रम और विश्वास है । हरारी का तर्क है कि मानव बाहेक के जानवरों में एक ही सत्य होता है – वस्तुगत सत्य । मगर मानव समाज में वस्तुगत सत्यों के साथ साथ काल्पनिक यथार्थें भी मौजूद होती हैं, और बहुमत संख्या के लोगों द्वारा उसे मान लेने के बाद वह भौतिक रुप में भले ही ना सही, अन्तर वस्तुगत सत्य बन जाता है ।
मानव में व्याप्त एक अद्भूत और अलौकिक क्षमता है जिसने पत्थरों में कथा लिख दी, उसमें भगवान् का रुप निर्धारण कर दी और लोगों को उस पत्थर को पूजा करने, उस पर फूल माला चढाने और पत्थर में भगवान् का रुप दिखाकर असंख्य त्यागों का जुजून कायम कर दी । वैसे ही कागज के टुकडों में भी मूल्य का काल्पनिक विश्वास भरकर मानव ने संसार को दिनभर उसे पाने के लिए कामों में लगने का प्रयोजन तैयार कर दिया । अपरिचत देश, अपरिचित भाषा व संस्कृति होते हुए भी मानव मन के विश्वास से भरा कागज के टुकडों को पाने के लिए लोग संसार के किसी भी कोने में जाते हैं और उस कागजी टुकडों के बल पर अपने तथा अपने सगे सम्बन्धियों का जीवन चला लेते हैं । मानव के उसी अद्भूत क्षमता के कारण पृथ्वी पर अनेका शहरों की निर्माण हुई । बाँकी जानवरों ने नहीं कर पायी । उसी क्षमता के कारण मानव ने अपने से हजारों गुणा शक्तिशाली जानवरों को भी अपने वश में रखने का दुस्साहस किया । उनके लिए हजारों चिडिया घर बनाये गये और आज स्थिति यह है कि शक्तिशाली जानवरों को भी लोग देखकर आनन्द लेते हैं । उन्हें कैद की गयी है ।
पृथ्वी बना । दुनियाँ और संसार बनी । जीवों के प्रादुर्भावों के साथ साथ मानव जीवन ने भी अपना रुप धारण किया । सब मिलकर एक साझा प्रकृति बनी । मानव प्रकृति के उत्कृष्ट प्राण्ी बना । उसने सबको प्रयोग करना जाना । अद्वितीय प्राणी और विलक्ष्य उसकी प्रतिभायें । प्रकृति में एक नई प्रकृति की उसने शुरुवात की जिसे हम मानव सभ्यता कहते हैं । मानव सभ्यता का निर्माण सबने मिलकर किया । कोई जानकार बनकर तो कोई शिकारु बनकर । कोई दिमाग चलाकर तो कोई हाथ चलाकर । कोई बुद्धि लगाकर तो कोई मेहनत लगाकर । योगदान सबकी बराबर है । मगर दुर्भाग्य यह रहा कि लेने के मामले में मानव असमान हो गया । शारीरिक रुप में काम करने बाले मनाव समुदायों ने दिमाग और कलम चलाने बाले लोगों पर हद से ज्यादा विश्वास कर लिए जिसका परिणाम यह हुआ कि दिमाग और बुद्धि बाले लोगों ने समाज खडा कर दिया, वर्ण निर्माण कर दी और आते आते जातियों का भण्डार लगा दिये ।
मालिक और सेवक निर्माण हुए । होशियार और बुद्धु निर्माण हो गये । उच्च और नीच बनाये गये । सम्पत्ति का मालिक और मालिक की सेवकों की निर्माण हुई । सेवक हमेशा सेवा के बदौलत जिने को सिखाया गया । उसका धर्म ही मालिक का सेवा कहा गया । इसी आधार पर समाज और समुदाय निर्माण होते होते देश और राष्ट्र का भी निर्माण हुआ । उद्योग और मजदुर निर्माण किये गये । शासक और शासित तथा नेता और जनता बनायी गयी । प्रणाली यह बनाया गया कि देश का पैसा नेता, उद्योगी, व्यापारी, अधिकारी व कर्मचारियों के पास हरेगा और मजदुरों के पास मेहनत रहेगा । शासक, उद्योगपति तथा अधिकारी पैसों पर जियेगा और मजदुर मेहनत पर ।
लोग प्रायः यह कहते सुनाई देते हैं, “पैसा क्या चीज है जो सबके पास नहीं होता ?” मालिक बनना, नेता बनना, उद्योगपति बनना, व्यापारी बनना – यह सब हिम्मत की बात है । मानव सभ्यता के शुरुवात में भी यही बात रही । जिस समाज ने जितना बडा जोखिम मोल लिया, जितना बडा युद्ध किया, जितना बडा क्षति सहा, उतने ही बडे लाभ लिये, विकास किये । कहा जाता है कि आजका अमेरिका और यूरोप महा जोखिम का ही परिणाम है । अगर वे विश्व युद्धों में भाग न लिये होते तो वे भी एशिया के भारत, नेपाल, माल्दिभ्ज, भुटान, श्रीलंका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बंगलादेश आदि जैसे शान्ति, देवी देवता तथा ऋषिमुनियों का ही देश कहलाते ।
किम उल सुङ्ग से लेकर सी जिन पीङ्गतक, माक्र्स से लेकर लेनिनतक, वासिंङ्गगटन से लेकर ओबामातक, सिकन्दर से लेकर हिटलरतक, चन्द्रगुप्त से लेकर सम्राट अशोकतक, बुद्ध से लेकर गाँधी और मण्डेलातक, बिल गेट्स से लेकर मार्क जुकरबर्ग तक और बिनोद चौधरी से लेकर धीरुभाई और उनके सुपुत्र मुकेशतक तथा रानी भिक्टतरिया से लेकर मोदीतक का आविष्कार व निर्माण भी न हुआ होता । उल्लेखित व्यतिmत्वों ने अगर अपने मालिकों की बात मानी होतीं तो वे अपने नाम के नहीं होते । वे सारे के सारे गरीब परिबारों से रहे हैं । मगर उनहोंने गरीबी से नहीं पूछा, किसी मालिक से अनुमति नहीं मांगी और हिम्मत करके रास्ता पकडे आगे के लिए । आज वे अपने अपने क्षेत्रों के बादशाह हैं । सबके पास मान, सम्मान, प्रतिष्ठा, पहिचान और पैसे हैं ।
हिम्मत करने बालों के पास धन, दौलत, पहचान, मान, सम्मान और प्रतिष्ठा होता है । पैसे भी हिम्मत करने बालों के पास ही होता है । हिम्मत करें और सम्पन्न होएँ ।

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