Tue. Oct 8th, 2019

नेपाल कि मौनता ! नेपाल में भी दो दो लद्दाख : अजय कुमार झा


अजय कुमार झा, जलेश्वर | ७०र्षों की भारत और कश्मीर की समस्या जो किसी समय भारत के कांग्रेसियों द्वारा षड्यंत्र पूर्वक स्थापित किया गया था, सृजना किया गया था, भारत के एक योद्धा प्रधानमंत्री श्रीमान मोदी जी ने उसे जड़ से उखाड़ फेंका है। उनके इस कदम को पूरे भारतवासी और विश्व समुदाय ने स्वागत योग्य माना है। परन्तु पाकिस्तान और चीन दुख व्यक्त कर रहा है। उसके लिए सरदर्द बना हुआ है। साथही नेपाल भी मौन साधे हुए हैं। क्योंकि नेपाल के तन तो भारत से जुड़ा है लेकिन मन पाकिस्तान और चीन से मिला हैं। और यही कारण है कि नेपाली नेताओं में, उनके मन में एक प्रकार का भय समाया हुआ है। बार-बार सीमा सुरक्षा, भारतीय अतिक्रमण, दादागिरी, आदि शब्द का प्रयोग कर भारत के प्रति नेपाल में वैमनस्य उत्पन्न किया जा रहा है।

तिब्बत निगलने वाला चीन, हिमालय, मानसरोवर को निगलने वाला चीन नेपाली हृदय में स्वागत और सम्मान के योग्य दिख रहा है। कश्मीर के दो परिवार उमर अब्दुल्ला और मोहम्मद मुफ्ती के क्रूर चंगुल में फ़से पुरे कश्मीर और लद्दाख के जनता की पीडादायी जीवन से नेपाली नेताओं को कोई प्रयोजन नहीं है। नेपाली राजनेताओं में सामान्य मानवता का भी वोध नजर नहीं आता है। इन्हें तो सिर्फ सत्ता चाहिए। इन्हें तो डर लगता है कि मानवता का नारा देने पर कहीं हमारे देश नेपाल के ८५ प्रतिसत जनता जिन्हें हमने राजनीतिक षड्यंत्र के साथ दवाएं रखा है, वो विद्रोह न कर बैठे। मानवता के नाम पर विश्व समुदाय के सामने खुदको सर्मिन्दा होने का पूरा डर समाया हुआ है।

जनतांत्रिक भावना को बेचकर मुट्ठी भर खस शासकों के सुविधा के लिए संविधान निर्माण करना और जनजाति तथा मधेशी थारू मुस्लिमों को दरकिनार करना अपने आप में विश्व अपराध की सूची में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करता है। मानवता के नाम पर जनता के संपत्ति और जान-प्राण को लूटना उनका धर्म है। अतः नेपाल खुद डरा हुआ है भारत के इस कदम से। जिस तरह लद्दाख वासी आज मोदी के गुण गा रहे हैं कहीं इसी प्रकार नेपाल में हिमाली जनजाति और तराई के लोग आवाज को बुलंद करना शुरू न कर दे ! इस हालत में मुट्ठी भर खस का शासन सदा के लिए नेपाल से लुप्त हो सकता है। देश में राजनीतिक परिवर्तन का एक माहौल तैयार हो जाए! अथवा एक नया राजनीतिक मुद्दा सक्रिय हो जाए। बरसों से विभिन्न राजनैतिक बाद विवादों से घिरा नेपाल में अब राजनीतिक चेतना के लोगों का समूह बढता जा रहा है। लोगों की आकांक्षाएं बढ़ती जा रही है। लोग नेट के जरिए दुनियाँ से जुड़ते से जा रहे हैं। नए विचारों की होड़ लगी हुई है। विश्व में आधुनिकतम विचार प्रवहन की आँधी चल रही है। ऐसे में कोई सरकार या राजनैतिक पार्टियाँ संकीर्ण और अमानवीय विचार को पृष्ठपोषण करना चाहती है तो वह भारत के कांग्रेसियों की तरह वर्त्तमान, भुत और भविष्य के लिए गहरी खाई ही खोद रही है।

नेपाल में अबतक खासकर हिमाली और जनजातियों ने बामपंथी को समर्थन जताया है वही आधा जनघनत्ववाला तराई के नागरिको ने कांग्रेसियों का समर्थन करता रहा है। परन्तु, विडम्बना देखिए; बामपंथियों ने हिमालियो को लुटते आया है वही कांग्रेसियों ने मधेसियों के साथ दुर्व्यवहार करते आया है। इनकी आत्माओं के साथ खिलवाड़ किया, धोखा दिया और संविधान के नाम पर हत्या किया है। यही से नेपाल में लद्दाख जैसी स्थिति की पुष्टि होती है।

एक तरफ भारत के मोदी नेतृत्व बाली सरकार जो पूर्णतः मानवता वादी है, और विकास वादी है। सभी धर्मों को फलने फूलने के लिए संपूर्ण अधिकार और सुविधाएं प्राप्त है। सबका साथ सबका विश्वास और सबका विकास मोदी का नारा विश्वविख्यात बन चुका है। वही पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में जनता को आतंकवादी बनने के लिए बाध्य किया जा रहा है। योजनाबद्ध रुपमे कश्मीरियो को मृत्यु के मुख में धकेला जा रहा है। उनके जीवन, परिवार और संस्कृति को नष्ट किया जा रहा है। लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य लगायत के सामान्य सुविधाओं से भी वंचित किया जा रहा है। ऐसी हालत में इस तरह के क्रूर शासकों का समर्थन करना आतंकबाद को बढाबा देने के साथ साथ अपनी कुकर्म और षडयंत्रों को संरक्षण करने का दुष्प्रयास मात्र है।
एक उच्च कोटि के मानव कभी भी विनाशकारी और अमानवीय विचाराधारा का समर्थन नहीं कर सकता। पाकिस्तान आज विश्व मानवता के नाम पर कलंक सावित हो चूका है। एक दरिद्र आतंकी देस बन चूका है। चीन में लोकतंत्र का नामोनीसान नही है। फिर नेपाल जैसे लोकतांत्रिक देशको इन राहों पर चलना क्या सावित करता है! नेपाल को आर्थिक और भौतिक रूपसे समृद्ध होना ही होगा। इसके लिए चीन से प्राविधिक सहयोग और भारत से बाजार प्राप्त करना होगा। नेपाल को प्राविधिक सहयोग देने के लिए अनेकों देश तैयार है लेकिन बाजार के लिए भारत पर ही निर्भर होना पड़ेगा। नेपाल के अदुर्दर्सि नेता और भ्रष्ट कर्मचारियों से वैश्विक गुणवत्ता के उत्पाद हेतु कल्पना करना  बालू से तेल निकालने के बराबर है। अतः अब विचारणीय प्रश्न यह है कि या तो हम नेपाल को चोर, भ्रष्ट, लुटेरो और अशिक्षित तथा गुण्डा- बाहुबलियों के देश हो जाने दे या फिर सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के महामानवीय सोच के तहत एक सुसभ्य देश के श्रेणी में पहुंचाने का प्रयत्न करें। संभावना दोनों में बराबर है। बस, एक में निचे गिरना है और दुसरे में ऊपर उठना है। एक में पशुता को प्राप्त होना है, एक में देवत्व को उपलब्ध करना है। एक में विनाशकारी बनना है, दुसरे में कल्याणकारी। अजय कुमार झा

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