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त्रिभुवन विश्वविद्यालय में पेन्सन अधिकार का प्रश्नः इतिहास, अन्याय तथा उत्तरदायित्व

 

डॉ. नंदकिशोर सिंह

त्रिभुवन विश्वविद्यालय नेपाल का सबसे पुराना, सबसे बड़ा तथा प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान है। इस विश्वविद्यालय में कार्यरत प्राध्यापक और कर्मचारी अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष शिक्षा, अनुसंधान तथा राष्ट्र निर्माण के कार्य में समर्पित करते आए हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक सुरक्षा का आधार मानी जाने वाली पेंशन व्यवस्था केवल सुविधा का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, श्रम के सम्मान और संस्थागत उत्तरदायित्व से जुड़ा एक मूलभूत प्रश्न भी है। किंतु पिछले कुछ नीतिगत निर्णयों ने विश्वविद्यालय के हजारों प्राध्यापकों और कर्मचारियों के पेंशन अधिकार को विवाद के केंद्र में ला खड़ा किया है।

विश्वविद्यालय सभा और कार्यकारी परिषद द्वारा वि.सं. 2066 में लिए गए निर्णय के अनुसार 2066/05/26 के बाद स्थायी नियुक्ति प्राप्त करने वाले प्राध्यापकों और कर्मचारियों को पारंपरिक पेंशन सुविधा से वंचित करने की व्यवस्था की गई। यह निर्णय अपने आप में दूरगामी प्रभाव वाला था। इससे भी गंभीर बात यह रही कि इस निर्णय को तत्काल सार्वजनिक नहीं किया गया, बल्कि लगभग दो वर्षों तक गोपनीय रखा गया। वि.सं. 2068 में जब इसकी जानकारी सामने आई, तब विश्वविद्यालय समुदाय में व्यापक असंतोष फैल गया।

निर्णय सार्वजनिक होने के बाद आधिकारिक प्राध्यापक संगठनों, कर्मचारी संगठनों तथा विश्वविद्यालय से जुड़े विभिन्न पक्षों ने इसका विरोध किया। उनका स्पष्ट तर्क था कि वर्षों तक विश्वविद्यालय की सेवा करने वाले व्यक्तियों को सेवानिवृत्ति के बाद बुनियादी सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना राज्य और संस्था की जिम्मेदारी है। पेंशन व्यवस्था को समाप्त करना केवल आर्थिक अधिकारों में कटौती नहीं, बल्कि उन लोगों के साथ अन्याय भी है जिन्होंने अपना जीवन विश्वविद्यालय को समर्पित किया है। इसलिए इस निर्णय को संशोधित कर पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल करने की मांग लगातार उठती रही।

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लेकिन इसके बाद की घटनाओं ने विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका पर और भी गंभीर प्रश्न खड़े किए। जिन पदाधिकारियों पर प्राध्यापकों और कर्मचारियों के हितों की रक्षा की जिम्मेदारी थी, उन पर यह आरोप लगता रहा कि उन्होंने पेंशन बहाली के लिए पहल करने के बजाय अर्थ मंत्रालय में पेंशन-विरोधी धारणा स्थापित कराने का प्रयास किया। विशेष रूप से 2071/01/02 को अर्थ मंत्रालय से जारी पत्राचार को इसी संदर्भ में देखा जाता है। अनेक लोगों का मानना है कि वह पत्राचार अर्थ मंत्रालय की स्वतःस्फूर्त पहल नहीं था, बल्कि विश्वविद्यालय नेतृत्व के आग्रह और पहल का परिणाम था।

इस विषय को और स्पष्ट रूप से समझने के लिए नेपाल सरकार के हालिया नीतिगत निर्णय महत्वपूर्ण हैं। सरकार ने राष्ट्रसेवक कर्मचारियों के लिए योगदान-आधारित व्यवस्था केवल वि.सं. 2075 के बाद स्थायी नियुक्त कर्मचारियों पर लागू की है। इसी प्रकार सामाजिक सुरक्षा कोष से संबंधित व्यवस्था भी वि.सं. 2083 साउन 1 गते के बाद स्थायी नियुक्त होने वाले कर्मचारियों पर लागू करने का निर्णय लिया गया है। इन नीतियों से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित होता है—नई व्यवस्थाएँ भविष्य की नियुक्तियों पर लागू होती हैं; पहले से नियुक्त व्यक्तियों के अर्जित अधिकारों को पीछे लौटकर समाप्त नहीं किया जाता।

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यदि इसी सिद्धांत को आधार माना जाए, तो वि.सं. 2066 के बाद नियुक्त हुए त्रिभुवन विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों और कर्मचारियों की पेंशन व्यवस्था समाप्त करने का निर्णय स्वाभाविक रूप से प्रश्नों के घेरे में आता है। और यदि विश्वविद्यालय स्वयं अपने कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा के पक्ष में खड़े होने के बजाय पेंशन-विरोधी पत्राचार के लिए पहल करता रहा हो, तो यह और भी गंभीर नैतिक तथा प्रशासनिक प्रश्न बन जाता है।

विश्वविद्यालय कोई साधारण संस्था नहीं है। यह ज्ञान, विवेक, न्याय और उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों पर आधारित संस्था है। वहाँ के पदाधिकारी केवल प्रशासनिक नेतृत्व ही नहीं करते, बल्कि नैतिक उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं। इसलिए अपने कर्मचारियों के दीर्घकालिक हितों की रक्षा करना विश्वविद्यालय प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। किंतु अतीत के कुछ निर्णयों से यह प्रतीत होता है कि इस जिम्मेदारी का निर्वहन अपेक्षित रूप से नहीं हो सका।

ऐसे में इतिहास की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है। वि.सं. 2066 में पेंशन व्यवस्था समाप्त करने वाले नेतृत्व और वि.सं. 2071 के आसपास अर्थ मंत्रालय के माध्यम से पेंशन-विरोधी धारणा स्थापित कराने में भूमिका निभाने वाले नेतृत्व—दोनों के कार्यों का आलोचनात्मक मूल्यांकन होना चाहिए। उनके निर्णयों का प्रभाव हजारों प्राध्यापकों और कर्मचारियों के भविष्य पर पड़ा है। इसलिए इस प्रश्न को व्यक्तिगत आलोचना के बजाय संस्थागत उत्तरदायित्व और न्याय के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

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आज भी उन निर्णयों में शामिल कई व्यक्ति जीवित हैं और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं। उनके पास अब भी यह अवसर है कि वे अतीत के निर्णयों की पुनर्समीक्षा करें और पेंशन अधिकार की पुनर्बहाली के लिए सकारात्मक भूमिका निभाएँ। यदि वे अपने अनुभव, प्रभाव और नैतिक जिम्मेदारी का उपयोग विश्वविद्यालय समुदाय के दीर्घकालिक हित में करते हैं, तो यह उनके सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध हो सकता है।

अंततः पेंशन का प्रश्न केवल आर्थिक सुविधा का विषय नहीं है। यह सामाजिक सुरक्षा, श्रम के सम्मान और संस्था द्वारा अपने कर्मचारियों के प्रति निभाई जाने वाली जिम्मेदारी का प्रश्न है। विश्वविद्यालय में तीन-चार दशकों तक सेवा देने वाले व्यक्तियों को सेवानिवृत्ति के बाद सम्मानजनक जीवनयापन का अधिकार मिलना कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि न्यायसंगत अपेक्षा है। इसलिए त्रिभुवन विश्वविद्यालय में पेंशन अधिकार के प्रश्न को केवल प्रशासनिक या वित्तीय मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, नैतिक उत्तरदायित्व और संस्थागत विश्वसनीयता के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। जब तक इस प्रश्न का न्यायपूर्ण समाधान नहीं होगा, तब तक विश्वविद्यालय समुदाय के भीतर असंतोष और अन्याय की भावना बनी रहेगी। एक जिम्मेदार विश्वविद्यालय के रूप में त्रिभुवन विश्वविद्यालय को अपने प्राध्यापकों और कर्मचारियों के सम्मान, सुरक्षा और भविष्य के प्रति अपने दायित्व को पुनः स्मरण करते हुए न्यायपूर्ण समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

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