Sat. Dec 7th, 2019

भारत में बुरे दाैर से गुजर रही काँग्रेस काे एक बार फिर साेनिया गाँधी का ही सहारा

कांग्रेस ने अपने राजनीतिक संकट के सबसे बुरे दौर में एक बार फिर सोनिया गांधी का ‘हाथ’ थाम लिया है। सोनिया गांधी को सर्वसम्मति से कार्यसमिति ने शनिवार देर रात कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया। राहुल गांधी के इस्तीफे पर दिनभर हुई मैराथन चर्चाओं के दौर के बाद जब कोई दूसरा दमदार चेहरा नहीं मिला तब कांग्रेस ने सोनिया गांधी की रहनुमाई में पार्टी को विकट हालात से उबारने का फैसला लिया।

कार्यसमिति के इस फैसले से साफ हो गया है कि कांग्रेस मौजूदा हालात में गांधी परिवार से बाहर के नेतृत्व को पार्टी की कमान सौंपने का बड़ा जोखिम लेने के लिए तैयार नहीं हुई।सोनिया गांधी को कार्यसमिति ने भले ही अंतरिम अध्यक्ष चुना है मगर इसमें अब कोई संदेह नहीं कि अगले कुछ समय तक एक बार फिर वह पार्टी का नेतृत्व करती रहेंगी।

कांग्रेस संविधान के अनुसार कार्यसमिति को केवल अंतरिम अध्यक्ष चुनने का ही अधिकार है। इसीलिए कार्यसमिति ने इसके अनुरूप सर्वसम्मति से सोनिया को अंतरिम अध्यक्ष चुनने के साथ अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के प्लेनरी सत्र में अध्यक्ष के चुनाव का प्रस्ताव भी पारित कर दिया। इस प्रस्ताव का आशय साफ है कि प्लेनरी सत्र की बैठक बुलाकर सोनिया गांधी को कांग्रेस का एक बार फिर पूर्णकालिक अध्यक्ष बना दिया जाएगा।

करीब 20 साल तक सबसे लंबे समय तक कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बने रहने का रिकॉर्ड बनाने वाली सोनिया गांधी केवल 20 महीने बाद ही दोबारा इस पद पर लौट आई हैं।

कांग्रेस की मजबूती में रहा है योगदान

राजनीतिक लिहाज से सोनिया गांधी के लिए इस पद पर वापसी बेहद मुश्किल फैसला है। उन्हें अध्यक्ष पद की बागडोर लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के नेतृत्व की विफलता के बाद पैदा हुई सियासी परिस्थितियों में लेना पड़ा है। हालांकि कांग्रेस के लिहाज से सोनिया गांधी के नेतृत्व की वापसी बेहद सकारात्मक मानी जा रही है। इसमें सबसे अहम बात यह है कि सोनिया गांधी निर्विवाद रूप से इस समय कांग्रेस ही नहीं देश में विपक्ष की सबसे बड़ी नेता हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में दो दशक के अपने कार्यकाल में सोनिया ने पार्टी को बेहद मुश्किल दौर से निकाल 10 साल तक सत्ता के शिखर तक पहुंचाया। एक समय उनके कार्यकाल मंे डेढ़ दर्जन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं जो आज महज चार सूबों तक सिमट कर रह गई हैं। हालांकि यह भी सच्चाई है कि 2014 के नरेंद्र मोदी की आंधी में सोनिया गांधी के नेतृत्व का जादू नहीं चल सका और कांग्रेस लोकसभा में अपने इतिहास के सबसे कम सीटों 44 तक सिमट गई।

विपक्षी दलों के बीच बढ़ सकता है तालमेल

बावजूद इसमें संदेह नहीं कि लोकसभा चुनाव की बेहद करारी शिकस्त और राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद बीते ढाई महीने से असमंजस और हताशा के दौर से अपने सियासी भविष्य को लेकर परेशान कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए सोनिया गांधी की वापसी नई संजीवनी से कम नहीं होगी। कार्यसमिति की बैठक के बाद कुछ नेताओं के उम्मीदों से भरे और मुस्कुराते चेहरे इस ओर इशारा भी कर रहे थे।

सोनिया के आने से संकट के इस दौर में पार्टी छोड़कर भागने वाले नेताओं का सिलसिला थमने की उम्मीद की जा रही है। इतना ही नहीं सोनिया गांधी के राजनीतिक कद और उनकी व्यापक स्वीकार्यता को देखते हुए विपक्षी खेमे के कई नेताओं के कांग्रेस के साथ आने और सहयोग करने की संभावनाएं भी कहीं ज्यादा होंगी। ममता बनर्जी सरीखी नेता राहुल गांधी के साथ सियासी साझेदारी करने में हिचकती रहीं हैं मगर सोनिया के साथ उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी।

बनाए गए थे पांच समूह

कांग्रेस कार्यसमिति ने सुबह 11 बजे की बैठक में राहुल गांधी के इस्तीफे को नामंजूर किया मगर वह नहीं माने तो पांच समूहों का गठन किया गया। इसके बाद पूरे दिन इन समूहों ने सभी राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों, विधायक दल नेताओं, सांसदों, अग्रिम संगठनों के प्रमुखों से व्यापक चर्चा कर उनसे नए अध्यक्ष पर रायशुमारी कराई। मगर इस रायशुमारी में भी राहुल गांधी का नाम ही सबसे ऊपर आया।

इसके बाद देर शाम हुई कार्यसमिति की बैठक में रायशुमारी के इस नतीजे के आधार पर राहुल से एक बार फिर अनुरोध किया गया कि वह अध्यक्ष पद पर बने रहें मगर राहुल नहीं माने तब उनका इस्तीफा स्वीकार हुआ।इसके बाद सर्वसम्मति से कार्यसमिति ने सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष चुनने का प्रस्ताव पारित कर दिया। दूसरे प्रस्ताव में राहुल गांधी के आक्रामक नेतृत्व और पार्टी को आधुनिक दौर की चुनौतियों के हिसाब से ले जाने के लिए सराहना की गई।

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