Wed. May 27th, 2020

कभी जिन्दगी एक पल में गुजर जाती है कभी जिन्दगी का एक पल भी नहीं गुजरता : गुलजार

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बॉलीवुड के सबसे मशहूर सॉन्गराइटर गुलजार का आज 85वां जन्मदिन है. पाकिस्तान के दीना में जन्मे गुलजार को उनकी लेखकी के लिए 5 बार राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया. सिर्फ राष्ट्रीय पुरस्कार ही नहीं गुलजार को ऑस्कर, ग्रैमी, पद्म भूषण और 20 बार फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिल चुके हैं. फिल्मों के लिए गाने ही नहीं गुलजार ने 7 किताबें चौरस रात (1962), जानम (1963), एक बूंद चांद (1972), रावी पार (1997), रात, चांद और मैं (2002), रात पश्मीने की और खराशें (2003) भी लिखीं.

जिसकी नज़्मों में अहसास इतनी नज़ाकत के साथ सिमट जाता हो कि जैसे चॉंदनी में छिपी आफताब की किरणें। जिसने ज़िंदगी के हर लम्हे को अपनी कायनात में सितारे सा पिरो लिया हो ताकि जब उसका ज़िक्र आए तो वो नज़्म बनकर उतर आए। जिसका बचपन मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू से लबरेज हो और दिमाग़ के कोने में अपनी ख़ासी जगह घेरे बैठा हो। बचपन ने जब-जब मन के दायरों से बाहर झाँका तब-तब गीत, नज़्म, ग़ज़ल पन्नों पर उतर आयी। कितनी क़ाबिल-ए-तारीफ़ है इस शख़्स की समंदर सी गहरायी, जहाँ तमाम मोती यूँ ही गोता लगाते ही मिल जाते हैं।

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हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक्त की शाख से लम्हे नहीं तोड़ा करते

कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ़
किसी की आंख में हम को भी इंतिज़ार दिखे

शाम से आँख में नमी सी है

आज फिर आप की कमी सी है

वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर

आदत इस की भी आदमी सी है

कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है

ज़िंदगी एक नज़्म लगती है

कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ

उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की

रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है
रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं
कांच का नीला सा गुम्बद है, उड़ा जाता है
ख़ाली-ख़ाली कोई बजरा सा बहा जाता है
चाँद की किरणों में वो रोज़ सा रेशम भी नहीं
चाँद की चिकनी डली है कि घुली जाती है
और सन्नाटों की इक धूल सी उड़ी जाती है
काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता है

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खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?
एक ख़ामोश-सा जवाब तो है।

डाक से आया है तो कुछ कहा होगा
“कोई वादा नहीं… लेकिन
देखें कल वक्त क्या तहरीर करता है!”

या कहा हो कि… “खाली हो चुकी हूँ मैं
अब तुम्हें देने को बचा क्या है?”

सामने रख के देखते हो जब
सर पे लहराता शाख का साया
हाथ हिलाता है जाने क्यों?
कह रहा हो शायद वो…
“धूप से उठके दूर छाँव में बैठो!”

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सामने रौशनी के रख के देखो तो
सूखे पानी की कुछ लकीरें बहती हैं

“इक ज़मीं दोज़ दरया, याद हो शायद
शहरे मोहनजोदरो से गुज़रता था!”

उसने भी वक्त के हवाले से
उसमें कोई इशारा रखा हो… या
उसने शायद तुम्हारा खत पाकर
सिर्फ इतना कहा कि, लाजवाब हूँ मैं!

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