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पर्सा के पारसनाथ मंदिर को जैन सर्किट से जोड़ा जाएगा : मुरलीमनोहर तिवारी

हिमालिनी  अंक जुलाई २०१९ | दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है । जैन धर्म के संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे । वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है । माना जाता है कि वैदिक साहित्य में जिन यतियों और व्रात्यों का उल्लेख मिलता है, वे ब्राह्मण परंपरा के न होकर श्रमण परंपरा के ही थे । मनुस्मृति में लिच्छवि, नाथ, मल्ल आदि क्षत्रियों को व्रात्यों में गिना है । आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है । ‘जैन’ शब्द ‘जिन’ शब्द से बना है । ‘जिन’ बना है ‘जि’ धातु से जिसका अर्थ है ‘जीतना’ ।

‘जिन’ अर्थात ‘जीतने वाला’ । जिसने स्वयं को जीत लिया उसे ‘जितेंद्रिय’ कहते हैं । राग–द्वेष के विजेता को जिन कहते हैं, जिन द्वारा प्रवर्तित धर्म ‘जैन धर्म’ कहलाता है । धर्म का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता । धर्म का आविर्भाव, तिरोभाव एवं विकास मनुष्य आदि जीवों में ही होता है । सम्यक् विचार और सम्यक् आचार से रागादि दोषों को जीतने का मार्ग ही जैन धर्म है । दूसरे शब्दों में साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका रूपी चतुर्विध धर्मसंघ को तीर्थ कहा गया है । उसकी स्थापना करने वाले महापुरुष तीर्थंकर कहलाते हैं । वर्तमान अवसर्पिणी काल में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव तथा अन्तिम और चौविसवें तीर्थंकर भगवान महावीर हुए हैं ।

जैन धर्म प्राचीनतम धर्म है । परापूर्व काल में धर्म दर्शन की दो धाराएं प्रचलित थी । वैदिक संस्कृति और श्रमण संस्कृति । जैन धर्म आर्हत् धर्म के नाम से अत्याधिक विश्रुत है । निग्रन्थ शब्द का प्रयोग भगवान महावीर के समय से प्रारम्भ हुआ । आगम में ‘जिन शासन’, ‘जिन मार्ग’ शब्द प्राप्त होता है । सर्वप्रथम ‘जैन’ शब्द का प्रयोग जिनभद्रगणी क्षमा श्रमण विशेषावश्यक भाष्य में उल्लेख है । देश काल अनुसार शब्द बदलते रहते हैं किन्तु परम्परा की दृष्टि से जैन धर्म का संबंध भगवान ऋषभदेव से है । भगवान ऋषभ के ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती भरत ने काली गण्डकी के किनारे अवस्थित पुल्हाश्रम में तपस्या की थी । उन्नीसवें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ और इक्कीसवें तीर्थंकर भगवान नमिनाथ का जन्म मिथिला (जनकपुरधाम) में हुआ था । भगवान पाश्र्वनाथ का विचरण काशी कौशल से नेपाल तक हुआ था । शाक्य भूमि नेपाल घाटी में अवस्थित है । शाक्य देश में भगवानपाश्र्वनाथ के अनुयायी थे । शाक्य देश में निग्रन्थों का चातुर्याम धर्म प्रचलित था । जैन आगम उत्तराध्यायन सूत्र के नवम् अध्ययन में मिथिला जनपद के राजा नमिराजर्षि का उल्लेख मिलता है । भगवान महावीर ने ६ चातुर्मास मिथिला (जनकपुर ) में किया था । उस समय नेपाल में लिच्छवियों का शासन था । भगवती सूत्र में उल्लेख मिलता है कि लिच्छवियों का मूल स्थान वैशाली था । वैशाली गणतंत्र के अध्यक्ष चेटक थे । चेटक भगवान महावीर के परम भक्त राजा थे । वैशाली गणतंत्र के ७७०७ सदस्य थे । भगवान महावीर के पिता सिद्धार्थ भी उन्हीं में से थे ।
चौबीसवें तीर्थकर भगवान महावीर के पश्चात वीर निर्वाण की दूसरी शताब्दी के मध्य काल में जैन शासन को १२ वर्ष तक भयंकर वात्याचक्र से जूझना पड़ा । उचित भिक्षा के अभाव में अनेक श्रुत सम्पन्न मुनि काल कलवित हो गये । उस समय क्षरमण बृन्द समुद्र तट पर साधना करते थे और फिर सुभिक्ष होने पर वहाँ से पाटलीपुत्र पर आ गए । उसके बाद जिस के पास जितना उदेशा, अध्ययन आदि जानकारी दी । उसको संकलन करके ११ अंग शास्त्र स्थापित करने का कार्य आचार्य स्थूलीभद्र की अध्यक्षता में पाटलीपुत्र चतुर्विध श्रीसंघ की सहायता से वीर निर्वाण संवत १६० के आस पास किया गया । ११ अंग व्यवस्थित हुए किन्तु १२ वा अंग दृष्टिवाद के ज्ञाता १४वें पूर्वधार श्रुतकेवली आचार्य भद्रबाहु के अतिरिक्त कोई भी मुनि जीवित नहीं थे । आचार्य भद्रबाहु स्वामी उस समय नेपाल के पहाड़ी भाग में महाप्राण ध्यान की साधना में तल्लीन थे । श्रीसंघ ने स्थुलीभद्र आदि ५०० श्रमणों को आचार्य भद्रबाहु के पास दृष्टिवाद की वाचना के लिए भेजा । उनमें से स्थुलीभद्र स्वामी ने १४ पूर्व श्रुत से और १० पूर्व अर्थ से अध्ययन किया । इस प्रकार आचार्य भद्रबाहु ने नेपाल भूमि में महाप्राण ध्यान की विशिष्ट साधना की और दृष्टि को वाचना दिया । आगम निधि की रक्षा में नेपाल भूमि को अमूल्य योगदान रहा है ।
काठमांडू घाटी के बागमती नदी से बालु निकालते समय आठवी शताब्दी के आठवें तीर्थकर भगवान चन्द्र प्रभु की मूर्ति मिली । जो राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी गयी है । पश्चिम नेपाल के दुल्लु स्थित पादुका में ईस्वी संवत १२१४ अभिलेख युक्त भगवान महावीर की दिगम्बर जैन मूर्ति प्राप्त हुई है । यह मूर्ति चार फिट ऊँची और २२ इन्च चौड़ी है । मूर्ति कायोत्सर्ग मुद्रा में खड़ी है । (श्री मोहन प्रसाद खनाल द्वारा लिखित नेपाली कला पुस्तक से) वर्तमान में नेपाल भूमि से करीब ५० सदस्य जैन श्रमण–श्रमणी बने हैं । नेपाल में जैन धर्मावलम्बियों में आचार्य श्री महाश्रमणजी के अनुयायी आवकों की संख्या अधिक है । मुख्यतया काठमांडू, विराटनगर, धुलावारी, बीरगंज, जनकपुर, धरान, इटहरी, बिर्तामोड़, सुनसरी, लालबंदी, दमक, हनुमाननगर, राजविराज सहित ३० नगरों में स्थानीय संगठन सक्रिय हैं । सन् १९९६ में आचार्य श्री पद्मसान सूरीश्वरजी महाराज साह के सानिध्य तथा आचार्य श्री विद्यानन्दजी महाराज साहब का आर्शीवाद प्राप्त कर नेपाल जैन परिषद् द्वारा भगवान महावीर जैन निकेतन परिसर में नेपाल में प्रथम जैन मन्दिर का ऐतिहासिक प्रतिष्ठान महोत्सव सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ ।
हम नेपालवासियों के लिए परम सौभाग्य की बात है कि सैकड़ो वर्ष बाद नेपाल में प्रथम बार सन् २०१५ में महातपस्वी जैन आचार्य श्री महाश्रमणजी अपने धर्म संघ सहित नेपाल पधारे है । इस दौरान आचार्यश्री का नेपाल में करीब आठ महीना प्रवास हुआ । नेपाल में लगभग तीन लाख के करीब जैन धर्मालंबियों की उपस्थिति है । नेपाल में जैन धर्म के प्रमुख व्यक्तित्व जो इसके प्रचार प्रसार में लगे हैं उसमें सबसे पहला नाम आता है, स्व.हुलास चंद जी गोलछा, स्व.तोलारामजी दुगड़, स्व. नथमल वेद जी, स्व.भीमराज जी नोलखा । इस सन्दर्भ में नेपाल–भारत सहयोग मंच के केंद्रीय अध्यक्ष अशोक वेद जी जैन धर्म के बारे में बताते है, जैन धर्म का मूल अहिंसा है, इसका मूल मंत्र, जियो और जीने दो है । महावीर स्वामी के सिद्धांत अनुसार अहिंसा, अनेकांतवाद, स्यादवाद, अपरिग्रह और आत्म स्वातंत्र्य । मन, वचन और कर्म से हिंसा नहीं करना ही अहिंसा है । अनेकांतवाद अर्थात वास्तववादी और सापेक्षतावादी, बहुत्ववाद सिद्धांत और स्यादवाद अर्थात ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत । तेरापंथ धर्मसंघ आचार्य भिक्षु द्वारा स्थापित अध्यात्म प्रधान धर्मसंघ है, जिसकी स्थापना २९जून, १७६० को हुई थी । यह जैन धर्म की शाश्वत प्रवहमान धारा का युगधर्म के रूप में स्थापित एक अर्वाचीन संगठन है, जिसका इतिहास लगभग २५० वर्ष पुराना है । प्रारम्भ में इस धर्म संघ में तेरह साधु तथा तेरह ही श्रावक थे, इसलिए इसका नाम ‘तेरापंथ’ पड़ गया । संस्थापक आचार्य श्री भिक्षु ने उस नाम को स्वीकार करते हुए उसका अर्थ किया, ‘हे प्रभो ! यह तेरा पंथ है ।’ तेरापंथ का अपना संगठन है, अपना अनुशासन है, अपनी मर्यादा है । इसके प्रति संघ के सभी सदस्य सर्वात्मना समर्पित हैं । साधु–साध्वियों की व्यवस्था का संपूर्ण प्रभार आचार्य के हाथ में होता है । आचार्य भिक्षु से लेकर आज तक सभी आचार्यों ने साधु–साध्वियों के लिए विविधमुखी मर्यादाओं का निर्माण किया है । बीरगंज, नेपाल में तेरापंथ भवन का उद्घाटन २००८ में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. रामवरण यादव ने किया ।
अशोक वेद जी आगे बताते हैं कि, कुलकरों की परम्परा के बाद जैन धर्म में क्रमशः चौबीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती, नौ बलभद्र, नौ वासुदेव और नौ प्रति वासुदेव मिलाकर कुल ६३ महान पुरुष हुए हैं । इन ६३ शलाका पुरुषों का जैन धर्म और दर्शन को विकसित और व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है । सम्राट अशोक के अभिलेखों से यह पता चलता है कि उनके समय में मगध में जैन धर्म का प्रचार था । लगभग इसी समय, मठों में बसने वाले जैन मुनियों में यह मतभेद शुरू हुआ कि तीर्थंकरों की मूर्तियां कपड़े पहनाकर रखी जाए या नग्न अवस्था में । इस बात पर भी मतभेद था कि जैन मुनियों को वस्त्र पहनना चाहिए या नहीं । आगे चलकर यह मतभेद और भी बढ़ गया । ईसा की पहली सदी में आकर जैन धर्म को मानने वाले मुनि दो दलों में बंट गए । एक दल श्वेतांबर कहलाया, जिनके साधु सफेद वस्त्र (कपड़े) पहनते थे, और दूसरा दल दिगंबर कहलाया जिसके साधु नग्न (बिना कपड़े के) ही रहते थे । माना जाता है कि दोनों संप्रदायों में मतभेद दार्शनिक सिद्धांतों से ज्यादा चरित्र को लेकर है । दिगंबर आचरण पालन में कुछ अधिक कठोर हैं जबकि श्वेतांबर कुछ उदार हैं । श्वेतांबर संप्रदाय के मुनि श्वेत वस्त्र पहनते हैं जबकि दिगंबर मुनि निर्वस्त्र रहकर साधना करते हैं । यह नियम केवल मुनियों पर लागू होता है ।
आचार्य महाश्रमण के बारे में अशोक वेद जी बताते हैं कि, वे एक ऐसी आलोकधर्मी परंपरा का विस्तार है, जिस परंपरा को महावीर, बुद्ध, आचार्य भिक्षु, आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ ने अतीत में आलोकित किया है । अतीत की यह आलोकधर्मी परंपरा को आचार्य महाश्रमण एक नई दृष्टि प्रदान कर रहे हैं । यह नई दृष्टि एक नए मनुष्य का, एक नए जगत का, एक नए युग का सूत्रपात कहा जा सकता है । आचार्य महाश्रमण का जन्म १३ मई १९६२ को हुआ, उनका जन्म नाम मोहन दुगड़ है । जैन श्वेतांबर तेरापंथ के ग्याहरवें संत अथवा आचार्य हैं । महाश्रमण पुज्य राष्ट्र संत, योगी, आध्यात्मिक नेता, दार्शनिक, लेखक, वक्ता और कवि हैं । कृष्ण, महावीर, बुद्ध, जीसस के साथ ही साथ भारतीय अध्यात्म आकाश के अनेक संतों आदि शंकराचार्य, कबीर, नानक, रैदास, मीरा आदि की परंपरा से ऐसे जीवन मूल्यों को चुन–चुनकर युग की त्रासदी एवं उसकी चुनौतियों को समाहित करने का अनूठा कार्य उन्होंने किया । जीवन का ऐसा कोई भी आयाम नहीं है जो उनके प्रवचनों–विचारों से अस्पर्शित रहा हो । योग, तंत्र, मंत्र, यंत्र, साधना, ध्यान आदि के गूढ़ रहस्यों पर उन्होंने सविस्तार प्रकाश डाला है । साथ ही राजनीति, कला, विज्ञान, मनोविज्ञान, दर्शन, शिक्षा, परिवार, समाज, गरीबी, जनसंख्या विस्फोट, पर्यावरण, हिंसा, जातीयता, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराधीकरण, भ्रुणहत्या और महंगाई के विश्व संकट जैसे अनेक विषयों पर भी अपनी क्रांतिकारी जीवनदृष्टि प्रदत्त की है । जब उनकी उत्तराध्ययन और श्रीमद्भगवदगीता पर आधारित प्रवचन श्रृंखला सामने आई, उसने आध्यात्मिक जगत में एक अभिनव क्रांति का सूत्रपात किया है । एक जैनाचार्य द्वारा उत्तराध्ययन की भांति सनातन परम्परा के श्रद्धास्पद ग्रंथ गीता की भी अधिकार के साथ सटीक व्याख्या करना न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि प्रेरक भी है । इसीलिए तो आचार्य महाश्रमण मानवता के मसीहा के रूप में जन–जन के बीच लोकप्रिय एवं आदरास्पद हैं । वे एक ऐसे संत हैं, जिनके लिए पंथ और ग्रंथ का भेद बाधक नहीं बनता । आपके कार्यक्रम, विचार एवं प्रवचन सर्वजनहिताय होते हैं । हर जाति, वर्ग, क्षेत्र और सम्प्रदाय की जनता आपके जीवन–दर्शन एवं व्यक्तित्व से लाभन्वित होती रही है ।
आचार्य महाश्रमण का देश के सुदूर क्षेत्रों– नेपाल, भूटान, आसाम, बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश, उड़ीसा आदि में अहिंसा यात्रा करना और उसमें अहिंसा पर विशेष जोर दिया जाना प्रासंगिक है, क्योंकि आज सारा संसार हिंसा के महाप्रलय से भयभीत और आतंकित है । जातीय उन्माद, सांप्रदायिक विद्वेष और जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं का अभाव, ऐसे कारण हैं जो हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं और इन्हीं कारणों को नियंत्रित करने के लिए आचार्य महाश्रमण प्रयत्नशील हैं । इन विविध प्रयत्नों में उनका एक अभिनव उपक्रम है– ‘अहिंसा यात्रा’ । आज अहिंसा यात्रा एकमात्र आंदोलन है जो समूची मानव जाति के हित का चिंतन कर रहा है । उनकी पदयात्रा सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के लिए होती है । अहिंसा की योजना को क्रियान्वित करने के लिए ही उन्होंने पदयात्रा के सशक्त माध्यम को चुना है और अभी तक ६०००० कि.मी.से ज्यादा पदयात्रा कर चुके है । नेपाल में पदयात्रा के दौरान पर्सा में अवस्थित पारसनाथ मंदिर भी गए । इनसब बातों से जैन सर्किट की महत्ता के बारे में मालूम होता है ।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जनकपुर भ्रमण के दौरान जैन सर्किट बनाने की घोषणा हुई, इसके संदर्भ में नेपाल के प्रबुद्ध उद्योगपति अशोक वेद जी कुछ वर्षों से आवाज उठाते आ रहे है । इसके लिए पूर्व प्रधानमंत्री स्व.मातृका प्रसाद कोइराला, स्व.नथमल वेद, स्व.शंकरलाल केडिया, स्व.भीमराज नोलखा लगातार प्रयास करते रहे रहे थे । बाद में अशोक वैध जी के प्रयास से भारत के सम्माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के जनकपुर भ्रमण में रामायण सर्किट, बुद्ध सर्किट के साथ जैन सर्किट की बात आई । नेपाल, जैन तीर्थंकर की भूमि रही है, भद्रबाबू स्वामी ने काठमांडू में साधना की थी । पारसनाथ, जैन के २३वें तीर्थंकर थे, उनका पारसनाथ मंदिर, महुवन में है । पारसनाथ मंदिर लगभग १००० वर्ष पहले का है । उन्हीं के नाम पर इस जिला का नाम पर्सा हुआ । उस मंदिर में जैनों की मूर्तियां मिली, कुछ मूर्तियां चोरी हो गई, लेकिन अभी भी दो तीन मूर्तियां है, उसे शिवालय में परिवर्तन कर दिया गया है । वह बहुत प्राचीन मंदिर है उसके भग्नावशेष से ही मालूम होता है कितना प्राचीन मंदिर है । दूसरा जनकपुर में दो तीर्थंकर की स्थली है मल्लिनाथ और नमीनाथ की । जनकपुर में हर साल हजारों तीर्थ यात्री गुजरात से आते हैं, ये सभी जैन लोग हैं, वहां तो कुछ है नहीं लेकिन वे लोग उस भूमि को प्रणाम कर चले जाते हैं । प्रमुख जैन तीर्थ में श्री सम्मेद शिखरजी (गिरिडीह, झारखंड), अयोध्या, कैलाश पर्वत, वाराणसी, तीर्थराज कुंडलपुर (महावीर जन्म स्थल), पावापुरी (महावीर निर्वाण स्थल), गिरनार पर्वत (पालीताणा), श्रवणबेलगोला, बावनगजा (चूलगिरि), चांदखेड़ी, पालिताणा तीर्थ आदि आते हैं । मोदी जी ने जो जैन सर्किट की बात कि उससे भारत–नेपाल में इन्हीं जैन धर्म स्थली को जोड़ने और संरक्षण का काम होगा ।
जैन सर्किट में भारत के वैशाली, आरा, पटना, राजगीर, पावापुरी और चंपापुरी मार्ग के किनारे विकास योजना तय किया गया है । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जैन तीर्थंकर के जन्मस्थली की सुरक्षा–व्यवस्था, सुविधाएं, जन्मस्थली तक जाने वाली सड़क, बिजली की उपलब्धता आदि की जानकारी ली । मुख्यमंत्री ने जैन धर्मावलंबियों द्वारा जन्मस्थली में बनाए जा रहे मंदिर के बारे में भी जानकारी प्राप्त की । साथ ही इसे अमलीजामा पहनाने की रूपरेखा पर विचार–विमर्श किया । इससे राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थलों का कायाकल्प होने वाला है । इसके लिए केंद्र सरकार की ओर से राशि भी जारी कर दी गई है । पर्यटन विभाग के प्रस्ताव पर भारत सरकार ने राज्य में धार्मिक सर्किट निर्माण के लिए ३०० करोड़ रुपये की मंजूरी दे दी है । भारत का पहला जैन सर्किट बनारस में बनेगा ।
भारत और नेपाल ने संयुक्तरूप में बुद्ध सर्किट के लिए गठित संयुक्त कार्यदल के बैठक में पर्यटन प्रवर्धनसम्बन्धी १४ बुँदे सहमतिपत्र में हस्ताक्षर किया । सहमति के अनुसार नेपाल सरकार के माँगअनुरूप भारतीय पक्ष ने भारत के सरकारी कर्मचारी उपलब्ध कराकर विशेष सुविधा में नेपाल के पर्यटकीय क्षेत्र के भ्रमण को भ्रमण प्याकेज में रखने का सहमति किया है । नेपाल आने वाले भारतीय सवारी साधन को प्राप्त सुविधा अनुसार ही भारत जाने वाले नेपाली सवारी साधन को भी सहज अनुमति प्राप्त होने के विषय में सहमति हुआ है । दो देश के बीच विभिन्न बॉर्डर जोड़ने वाले सड़क तथा पुल के निर्माण कार्य में शीघ्रता लाने की सहमति हुई । नेपाल के धार्मिक तथा सांस्कृतिक पर्यटन प्रवर्धन के लिए जनकपुर में मिथिला संग्रहालय स्थापना करने में भारतीय पक्ष से सहयोग होगा । नेपाल के मांग अनुरूप भारतीय हिमाल आरोहण करने वाले को नेपाली नागरिक की तरह सहजरूप में आरोहण प्रमाणपत्र उपलब्ध कराया जाएगा । नेपाल में पर्यटन विश्वविद्यालय स्थापना करने में दोनों देश शैक्षिक कार्यक्रम एवं विद्यार्थी के लिए प्रयोगात्मक कक्षा के लिए आपसी सहयोग आदानप्रदान करेंगे । दो देश बीच पर्यटन के सम्भाव्यता, प्रवर्धन और बजारीकरण में सहकार्य के विभिन्न कार्य बढ़ाने में दोनों देश के निजी क्षेत्र के सहभागिता में इन्डो नेपाल टुरिजम फोरम गठन किया जाएगा ।
करीब दो वर्ष पहले खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभ सूरी जी म.सा.की आज्ञानुवर्तिनी प.पू.गणिनीपद विभूषिता सुलोचना श्री जी म.सा.की सुशिष्या पू.डॉ.प्रियस्मिता श्रीजी म.सा, पू.डॉ.प्रियलता श्रीजी म.सा, पू.डॉ. प्रियवंदना श्रीजी म. सा, पू.डॉ.प्रेक्षांजना श्रीजी म.सा, पू.डॉ. प्रियदर्शना श्रीजी म.सा, पू.डॉ.प्रियचैतन्यजना श्रीजी म.सा का प्रथम बार नेपाल पोखरा, काठमांडू से वीरगंज पदार्पण हुआ तब अशोक बैध जी ने साध्वी श्री से चर्चा के साथ सब कुछ बताया और कहा आप १५ किलोमीटर का विहार करके महुवन पधारे । मधुवन पहुँच कर साध्वी जी ने मंदिर और मूर्ति का निरीक्षण और परीक्षण किया । तत्पश्चात साध्वी श्री ने संपूर्ण हकीकत आचार्य श्री को अवगत कराया । गच्छाधिपति के निर्देशानुसार पेड़ी के महामंत्री पदम टाटिया ने नेपाल का दौरा किया तथा उस क्षेत्र के मुख्य मंत्री, मेयर, विधायक, अटार्नी जनरल सहित अनेक अधिकारियों के संग स्थल का निरीक्षण किया एवं मंदिर निर्माण के विषय में विचार विमर्श किया ।
प्रदेश नं. २ के मुख्यमन्त्री लालबाबु राउत ने पारसनाथ मंदिर का स्थलगत अवलोकन भ्रमण करके कहा कि, पर्सा जिला महुवन स्थित पारसनाथ मन्दिर को जैन सर्किट के साथ जोड़ने का काम शुरु होने की तैयारी हो रही है । उन्होंने कहा कि पर्सा जिला स्थित पारसनाथ, धनुषा जिला मल्लिनाथ और नमीनाथ मन्दिर को जैन सर्किट से जोड़ा जाएगा । अखिल भारतीय खत्रगच्छ संघ के महामन्त्री पदम टाटीया ने कहा कि करोड़ों रुपयों की लागत में मन्दिर, धर्मशाला, स्कूल और अस्पताल बनाने की योजना संस्था की ओर से लाया गया है । मानना है कि इससे पारसनाथ मन्दिर को आधुनिकीकरण किया जा सकता है, जिससे महुवन आमूल परिवर्तन हो सकती है । इसमें नेपाल–भारत सहयोग मंच के केंद्रीय अध्यक्ष अशोक वैद सद्भावना दूत की भूमिका में है । सखुवा प्रसौनी गांवपालिका के अध्यक्ष प्रदीप जायसवाल ने कहा कि मन्दिर पुनः निर्माण के लिए गांवपालिका ने १ करोड़ वजट विनियोजन किया है । कार्यक्रम में बोलते हुए प्रदेश नं. २ के उद्योग वाणिज्य संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अशोक वेद ने कहा कि पारसनाथ के नाम से ही पर्सा जिला का नामकरण किया गया है, इस को जैन सर्किट में जोड़ना खुशी की बात है । इसमें बीरगंज म.न.पा.के मेयर विजय सरावगी और भारत के महावाणिज्य दूत ने सहयोग करने को कहा है । उन्होंने कहा कि जनकपुर में सदियों पहले जैन मंदिर था, जो १९२५ के भूकंप में ध्वस्त हो गया, वह मूर्ति सीतामढ़ी में एक ब्राह्मण को मिली, ये मूर्ति दुर्लभ और बेशकीमती है, उस ब्राह्मण ने १९३२ में भागलपुर के चम्पापुरी मंदिर को मूर्ति हस्तांतरण कर दिया । मंदिर व्यस्थापन ने कहा है कि जब जनकपुर में मंदिर बन जाएगा तो वह मूर्ति को पुनः स्थापित किया जाएगा, जिसके लिए हमलोग प्रयासरत है ।

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