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जागरूकता नारा में नहीं, मानसिकता में होनी चाहिए : मुख्यमन्त्री लालबाबु राउत गद्दी

 

नशा में डूबता युवा वर्ग


बात तो सच भी है कि संघीयता कार्यान्वयन की जिम्मेदारी में रहे लोग कल तक संघीयता के विरोधी थे, हमारे कर्मचारीतन्त्र में जो मानसिकता है, उसमें भी परिवर्तन आना मुश्किल हो रहा है 

हिमालिनी  अंक जुलाई २०१९ | केन्द्रीकृत शासन व्यवस्था को परिवर्तन करते हुए हम लोग संघीय शासन व्यवस्था की अभ्यास में हैं । लगभग डेढ साल से देशभर ७ प्रादेशिक सरकार संघीय शासन व्यवस्था की अभ्यास कर रही है । लेकिन प्रदेश सरकार की ओर से आवाज आ रही है कि  आज भी संघीय सरकार में रहनेवाले लोग पुराने ही मानसिकता में हैं, कर्मचारीतन्त्र भी केन्द्रीकृत अभ्यास में ही जोर दे रहे हैं । विशेषतः इस तरह की असन्तुष्टि प्रदेश नं. २ से ज्यादा आ रही है । यहां एक बात स्मरणीय हैं– प्रदेश नं. २ वही क्षेत्र है, जिसने नेपाल में संघीयता का बीजारोपण किया है । अर्थात् प्रदेश नं. २ स्थित भू–भाग में हुए आन्दोलन से ही नेपाल में संघीय शासन व्यवस्था को ग्यारेन्टी की है । ऐसी ही पुष्ठभूमि में प्रदेश नं. २ के मुख्यमन्त्री लालबाबु राउत के साथ हिमालिनी सम्पादक डा. श्वेता दीप्ति ने बातचीत की है । प्रस्तुत है– बातचीत का सम्पादित अंश–

 

हमारे समर्थन करने से या ना करने से केन्द्र सरकार में कोई फेरबदल आनेवाला भी नहीं है । लेकिन आज भी हमारी चिन्ता यही है कि कैसे प्रदेश को अधिकार सम्पन्न बनाया जाए, इसके लिए हम लोग काम कर रहे हैं ।

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नेतृत्व ही संघीयता विरोधी है : मुख्यमन्त्री लालबाबु राउत

० मुख्यमन्त्री होने के बाद आप ने एक अभियान शुरु किया था– बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ । इस अभियान की उपलब्धि के बारे में कुछ बताएंगे ?
– प्रदेश नं. २ के लिए ही नहीं, पूरा देश के लिए यह कार्यक्रम अनुकरणीय है । क्योंकि इस देश में सदियों से महिलाओं के ऊपर नीतिगत रूप में ही जो भेदभाव होता आया है, उसको परिवर्तन करने के लिए महिलाओं को शिक्षित होना जरूरी है । इसी तथ्य को दृष्टिगत कर हम लोगों ने इस कार्यक्रम को आगे लाया है । इतना ही नहीं, राज्य की ओर से प्राप्त होनेवाली जो भी सेवा–सुविधा है, उसको समान रूप में प्राप्त न होने तक महिलाओं के ऊपर होनेवाला विभेद अन्त होनेवाला नहीं है और महिलाओं की अवस्था में भी परिवर्तन आनेवाला नहीं है । राज्य की ओर से प्राप्त सेवा–सुविधा को ग्रहण करना हो या विभेद को अन्त करने का सवाल हो, महिलाओं को ही सचेत होना जारी है । इसके लिए अनिवार्य शर्त है– शिक्षा । इसी सोच के साथ हम लोगों ने यह अभियान शुरु किया । अभियान अन्तर्गत हम लोगों ने बेटी शिक्षा–बीमा कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है । हमारी योजना अभी सभी नगरपालिका एवं गांवपालिका में लागू हो चुका है । माघ १ गते के बाद जन्म लेनेवाली सभी बालिकाओं की शिक्षा–बीमा हो रही है । इस में अभी २ हजार से अधिक बालिकाएं सहभागी हो चुकी है । अभियान अन्तर्गत ही विशेषतः कक्षा ८ में अध्ययनरत छात्राओं को १४ हजार साइकिल भी वितरण की गई है ।

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 जहां तक सरकार परिवर्तन की बात है, यह सिर्फ हल्ला है, यथार्थ नहीं है 

० दहेज के कारण महिलाएँ अपनी जान गंवाने के लिए बाध्य हैं । इसके विरुद्ध भी प्रदेश सरकार की ओर से कुछ हो रहा है या नहीं ?
– हाँ, दहेज संबंधी विषयों को लेकर ही बहुत सारी महिलाओं ने जान गंवाई है । छात्रा बीमा–योजना भी इसके विरुद्ध है । जब महिला शिक्षित होगी, तब दहेज संबंधी विकृतियाें का भी अन्त होगा । प्रदेश सरकार तो बनी है, लेकिन हमारे पास ज्यादा अधिकार नहीं है । ऐसी अवस्था में कई चीजें ऐसी होती है, जहां हम लोग चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते हैं ।

० प्रदेश पुलिस ऐन के संबंध में कुछ चर्चा और विवाद भी सामने आ रही थी, प्रदेश पुलिस निर्माण के लिए बनाया गया ऐन अभी कहां है ?
– सिर्फ प्रदेश ऐन ही नहीं, प्रदेश लोकसेवा आयोग गठन संबंधी विधेयक भी है हमारे सामने । दोनों विधेयक अभी सदन के भीतर है । जब तक प्रदेश लोकसेवा आयोग नहीं बनेगी, तब तक प्रदेश पुलिस भर्ती प्रक्रिया को भी हम लोग आगे नहीं बढ़ा पाएंगे । इसीलिए दोनों विधेयक सदन के भीतर हैं, लगभग सहमति हो चुकी है, जल्द ही पास होने वाला है ।
० १ साल से प्रदेश सरकार अपना काम कर रही है, केन्द्र में भी दो–तिहाई बहुमत का सरकार है और उस में आप लोगों की भी सहभागिता है । लेकिन अभी तक आप लोग संघीयता कार्यान्वयन के लिए आवश्यक नियम नहीं बना पा रहे हैं । ऐसा क्यों हो रहा है ?
– हां, देश में दो तिहाई बहुमत की सरकार है, हम लोग केन्द्र सरकार भी समर्थन किए है और प्रदेश में भी हमारे नेतृत्व में ही सरकार है । लेकिन इससे क्या होगा ? कल तक जो संघीयता के विरोधी थे, वही आज सत्ता में नेतृत्व कर रहे हैं । जिसके चलते आज संविधान संशोधन भी नहीं हो रहा है, संघीयता कार्यान्वयन के लिए आवश्यक नीति–नियम निर्माण में भी विलम्ब हो रहा है । हमारे समर्थन करने से या ना करने से केन्द्र सरकार में कोई फेरबदल आनेवाला भी नहीं है । लेकिन आज भी हमारी चिन्ता यही है कि कैसे प्रदेश को अधिकार सम्पन्न बनाया जाए, इसके लिए हम लोग काम कर रहे हैं ।

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० प्रदेश नं. २ में आप ने स्वच्छता अभियान भी शुरु किया, कहा जाता है कि इसका प्रभाव नगन्य है, लोगाेंं में जागरुकता भी नहीं है । आप की खयाल क्या है ?
– जागरुकता और क्रान्ति रातो रात होनेवाला विषय नहीं है । जागरूकता नारा में नहीं, मानसिकता में होनी चाहिए, सोच में होना चाहिए, व्यवहार में होना चाहिए । स्वच्छता अभियान अन्तर्गत उसी जागरुकता के लिए प्रयास किया । अभियान के अन्तर्गत प्रथम कार्यक्रम था– जानकी मन्दिर की सौन्दर्यीकरण करना । आज आप जनकपुर जाकर देखेंगे तो आप को पता चलेगा कि वहां कुछ हो रहा है । अभी वहां मार्बल लगाने का काम हो रहा है । सच में कहें तो हम लोग सीख भी रहे हैं । बहुत कुछ करना बाकी है । कहां से काम शुरु करें, हम लोगों में असमंजस भी है । काम शुरु करने के लिए हम लोगों को जो सहयोग प्राप्त होना चाहिए था, वह भी नहीं हो रहा है । ऐसी अवस्था में हम लोग जो कर सकते हैं, उसी के लिए प्रयास करते है, हम लोगों को इसी तरह आगे बढना भी है ।

० बारबार यह बात निकलती है कि प्रदेश सरकार परिवर्तन होने जा रहा है, व्यक्तिगत रूप में सरकार संचालन में आप को कितना सहज महसूस हो रहा है ?
– कोई ही असहजता महसूस नहीं हो रही है । हम लोग संघीयता कार्यान्वयन के शुरुआती दिनों में हैं । सैकडों वर्ष से केन्द्रीयकृत एवं एकात्मक मानसिकता में संचालित राज्य व्यवस्था एवं समाज को परिवर्तन करना थोड़ा सा समय लगेगा । ऐसी अवस्था में संघीयता कार्यान्वयन में कुछ कठिनाई और विरोधाभास होना स्वाभाविक है । मुझे विश्वास हैं कि ऐसी अवस्था ज्यादा दिन चलनेवाला नहीं है, जल्द ही सामान्य होता जाएगा । जहां तक सरकार परिवर्तन की बात है, यह सिर्फ हल्ला है, यथार्थ नहीं है । अगर कोई हल्ला करते हैं तो उसमें हम लोग क्या कर सकते हैं ?

० कुछ समय पहले प्रदेश नं. २ में हिन्दी को सम्पर्क भाषा बनाने की बात आई थी, लेकिन आज सब चुपचाप दिख रहे हैं ? इसमें क्या हो रहा है ?
– भाषा की लडाई राजनीतिक लड़ाई है । व्यक्तिगत रूप में पूछते हैं तो मैं भोजपुरी भाषी हूँ । अगर मुझे मैथिली भाषियों के साथ बात करना है तो मैं हिन्दी का ही प्रयोग करता हूं । कोई माने या ना माने, हम लोगों को हिन्दी में ही संवाद करना पड़ता है । तब भी यह राजनीतिक मुद्दा है ।

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० मधेश की जनता में निराशा बढ़ते गया है, इसकी अनूभूति आप में है या नहीं है ?
– कोई भी निराशा नहीं है । आप को निराश होकर जीना है या आशावान होकर ? यह तो आप में ही निर्भर है । आप के दृष्टिकोण में निर्भर है । हमारे सामने दुनियां की सबसे उत्तम व्यवस्था ‘लोकतान्त्रिक गणतन्त्र’ है, संघीयता है । इससे उत्तम व्यवस्था विश्व में नहीं है । ऐसी अवस्था में हम लोगों को क्यों निराश होना ? जहां तक गणतन्त्र एवं संघीय प्रणाली की कार्यशैली की बात है, उसमें कुछ कठिनाईयां दिखाई देती है । गणतन्त्र एवं संघीयता कार्यान्वयन के लिए जो ड्राइभिङ सीट पर है, उसके कारण भी कठिनाईयां आती है । संघीयता कार्यान्वयन के लिए जो मूलसीट पर हैं, उसके प्रति लोागें की सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं है, इसीलिए भी कुछ लोगों में निराशा हो सकती है । एक बात तो सच भी है कि संघीयता कार्यान्वयन की जिम्मेदारी में रहे लोग कल तक संघीयता के विरोधी थे, हमारे कर्मचारीतन्त्र में जो मानसिकता है, उसमें भी परिवर्तन आना मुश्किल हो रहा है । तब भी निराश होने की जरुरत नहीं है । यह लम्बा समय तक चलनेवाला नहीं है ।

० संघीय सरकार का नारा है कि ‘समृद्ध नेपालः सुखी नेपाली ।’ यह कैसे सम्भव हो सकता है ?
– सड़क, राजमार्ग, भवन, पुल जैसे भौतिक संरचना एवं पूर्वाधार का विकास होना ही चाहिए । लेकिन विकास के लिए सिर्फ इतना ही समग्र विकास नहीं है । अगर समग्र विकास की बात करते हैं तो समाजिक रूपान्तरण सबसे महत्वपूर्ण है । समाज के सोच में जब तक परिवर्तन नहीं आएगा, तब तक दीर्घकालीन विकास सम्भव नहीं है । उसके लिए भी हम लोगों को काम करना चाहिए । तभी समृद्ध नेपालः सुखी नेपाली’ नारा सार्थक हो जाएगा ।

० भारत के हम करीब हैं और हिन्दी यहाँ की भी प्रचलित भाषा है । विश्व के कई देशों में विश्वहिन्दी दिवस मनाया जा चुका है क्या ये सम्भव नही है कि नेपाल में भी अगला विश्व हिन्दी दिवस फिजी के बाद यहाँ मनाया जाय ?
क्यों नहीं जरुर मनाया जा सकता है । काठमान्डौ या किसी अन्य प्रदेश की बात नही कह सकता पर यह जरुर कहूँगा कि प्रदेश नम्बर दो इसके लिए हमेशा तैयार है और मैं हमेशा इसके समर्थन में हूँ ।

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