Sun. Oct 20th, 2019

लड़ाई खत्म नहीं हुई है “ कभी बाती पे दिया जलती है, कभी मशाल आग उगलती है: बृषेशचन्द्र लाल

मित्रों, आसिन ३ काला दिन है ।
सवाल यह नहीं कि हम मनाते हैं या नहीं ! यह काला दिन है और काला दिन ही रहेगा । ‘समय’ में एक धब्बा है जो कभी मिटेगा नहीं ।
हमें नकारा गया, हमारी अस्तित्त्वको अमान्य घोषित किया गया । हमें पीटा गया, मारा गया । सरकारी बन्दूकधारियों ने हमें देश के विद्रोही नागरिकों के तरह नहीं दुश्मन के तरह सर में, छाती में, पेट में, गोलीयों से भूना । क्यों ? क्योंकि हमने संविधान में अपना अस्तित्त्व खोजा, समानता और समावेशिता की मांग की और स्वशासन को अधिकार ठाना । किसी को दुश्मन नहीं माना । लड़ाई सत्य की है । सत्य के लिए लड़ाई रहेगा ।
अगर हमारे दिल में यह अनुभूति है कि हम ठीक थे तो हमारी लड़ाई ठीक थी और है (कोई आज स्वार्थों के कारण गलत क्यों न हो जाये) । हमें हमारे शहीदों और उनके साथी आन्दोलनकारीयों पर नाज है । आज संघीयता या जो कुछ भी है, यह सभी उनके ही त्याग के परिणाम हैं । बलिदान सभी को कुछ ना कुछ दे कर ही जाता है । हम सभी अनुगृहित हैं । अतएव, आसिन ३ एकजूटता का दिन बने । शहीदों और जांबाज आन्दोलनकारियों को श्रद्धा सुमन और कृतज्ञता समर्पण का दिन बने । लड़ाई खत्म नहीं हुई है । “ कभी बाती पे दिया जलती है, कभी मशाल आग उगलती है ।“ आसिन ३ गते इस प्रतिज्ञा का ही दिन बने !
शिकायते हैं और शिकायतें सही भी हैं । लड़ाई में या लड़ाई को संगठित करने में जब चूक हो जाती हैं तो परिणाम तो भुगतना ही पड़ता है । आज परिवर्त्तन को पद, गाड़ी, बजेट रूपी रकम और किलो में तौला गया मालाओं के चश्मों से देखा जा रहा है । नेतृत्त्व का मतलब आन्दोलनकारीयों से नहीं नाता, कुटुम्ब और जात को संवारने से झोंसा जा रहा है । संगठन में दिमक और सिर्फ दिमक ही ढकेला जा रहा है जिसके परिणाम स्वरुप आन्दोलनकारीयों का ब्रिगेड कमजोर होता जा रहा है । क्यों न हो, जब आन्दोलन के दौरान कहीं न रहे लोग इसका कमाण्डर बन जाते हैं । हमारे उपर लादे गए दस्तावेज को अन्तिम रूप देनेबाला ही हमारा भाग्यविधाता बन जाता हो । एकता के नाम पर पवित्र बन्धन के बदले जंजीर में जकड़ कर बेड़ियाँ डाल दिया जाता है । और, सब कुछ होते हुए भी जिसमें संचालन की योग्यता न हो वैसे ही लोगों के हाथ में हमें सौंप दिया जाता है तो परिणाम निराशाजनक ही होंगे । लेकिन, तब भी लड़ाई खत्म नहीं होगी । लड़ाई तभी खत्म होगी जब यह लक्ष्य तक पहुँचेगी । आवश्यकता दिया जलाकर रखने की है जिससे आनेबाला कल्ह अपनी मशाल को प्रज्ज्वलित कर सके ।
लड़नेबाले लड़ रहें हैं । जनता से निर्वाचित हो कर भी जेल में सड़ रहे हैं । झूठी मुद्दाओं में फंस रहे हैं । फिर भी आवाज उठानेबाले उठा रहे हैं । उठाते ही रहेंगे । भजानेबाले भजा भी रहे हैं, भजाते ही रहेंगे । मगर इससे लड़नेबाला न कभी घबडाया है न घबराएगा ।
और इसिलिए भी आग नहीं तो कम से कम दिया जलाकर रखना होगा । आसिन तीन काला दिन का यही तो सन्देश है ! यह दिया वो नहीं जलायेंगे । कोई बहाना ढूँढेंगे । आखिर दाढ़ी में तिनका जो है !
मित्रों,
दिया जलाने के लिए जहाँ भी जो भी कार्यक्रम मिले उसमें जरूर शामिल हों । कोई पार्टी नहीं, कोई समूह नहीं । लड़ाई सब ने मिल कर लड़ी है और लड़ना ही पड़ेगा !
जय मधेश ! वाल से

बृषेशचन्द्र लाल

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