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संविधान की गारेंनटी चुनाव से नहीं

अभी देश में विघटित संविधानसभा पुनर्स्थापना और नये चुनाव की बहस गरम है। लेकिन दलों के बीच कोई सहमति नहीं बन पा रही है। इसी सर्न्दर्भ को लेकर तर्राई मधेश पार्टी तमलोपा के सह-महासचिव जीतेन्द्र सोनल से हिमालिनी की संक्षिप्त बातचीतः

संविधान सभा पुनर्स्थापना पर इतना जोड क्यो –
– संविधान सभा का कार्यकाल बढने के लिए तो सरकार पहले ही तैयार थी। चुनाव की भी घोषण की गई थी लेकिन एक कटु सत्य क्या है कि चुनाव होगा तो भी फिर से यही दल, यही नेता, यही सभासद आएँगे। तो क्या गारेन्टी है कि फिर से संविधान का निर्माण हो ही जाएगा – पार्टी , पात्र यही, प्रकृति यही, प्रवृति यही, प्रक्रिया यही होने पर संविधानसभा चुनावसे संविधान बनने की भी कोई गारेन्टी नहीं है। इसलिए पुनर्स्थापना ही उत्तम विकल्प है। लेकिन पुनर्स्थापना जीवित होना चाहिए। लेकिन मधेशी मोर्चा इस बात को लेकर अभी भी अडिग है कि यदि संघीयता और पहचान को छोड गया तो उस संविधान को हम नहीं मानेंगे।

तर्राई मधेश पार्टी तमलोपा के सह-महासचिव जीतेन्द्र सोनल

मधेशी मुद्दा को लेकर कांग्रेस-एमाले और माओवादी में कौन अधिकर् इमानदार है – माओवादी के साथ सत्ता का सफर कितनी दूरी तय कर सकेगा –
– एक बात तो स्पष्ट है कि मधेशी, जनजाति की पहचान और संघीयता का मुद्दा है, उस में माओवादी अधिक गम्भीर है। जेठ १४ गते संविधान सभा विघटन भी इन्हीं मुद्दों पर हुआ और मधेशी-जनजाति के नहीं मानने के कारण ही संविधान सभा विघटन हुआ और माओवादी ने मधेशी मोर्चा का साथ दिया था। इसलिए माओवादी के साथ यह सफर आगे भी जारी रहेगा, जब तक पर्ूण्ा संघीयता नहीं मिल जाती। माओवादी को निषेध कर इस देश में कोई काम करने की स्थिति नहीं है।
मधेश में एकीकरण की हवा चली है, कितना दम है एकीकरण की चर्चा में –
– मधेश का अधिकार लेने के लिए और नए मधेश के निर्माण के लिए संगठित होना जरूरी है। विखण्डित होकर सत्ता तो मिल सकती हैं लेकिन अधिकार नहीं मिल सकता है। चुनाव में एक होकर जाना जरूरी है। लोकतन्त्र में संख्या बल काफी मायने रखता है। इसलिए एकीकरण जरूरी भी है और मजबूरी भी है। एकीकरण नहीं तो ध्रुवीकरण करना ही होगा। मधेशी दलों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

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