Sat. Oct 5th, 2019

कलरात्रि सदैव शुभ फल देने वाली माता हैं

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥”
अपने महा विनाशक गुणों से शत्रु एवं दुष्ट लोगों का संहार करने वाली सातवीं दुर्गा का नाम कालरात्रि है। विनाशिका होने के कारण इसका नाम कालरात्रि पड़ गया। आकृति और सांसारिक स्वरूप में यह कालिका का अवतार यानी काले रंग रूप की अपनी विशाल केश राशि को फैलाकर चार भुजाओं वाली दुर्गा है। यह वर्ण और वेश में अर्द्धनारीश्वर शिव की ताण्डव मुद्रा में नजर आती है । इसकी आंखों से अग्नि की वर्षा होती है । एक हाथ से शत्रुओं की गर्दन पकड़कर दूसरे हाथ में खड़क तलवार से युद्ध स्थल में उनका नाश करने वाली कालरात्रि सचमुच ही अपने विकट रूप में नजर आती है। इसकी सवारी गधर्व यानी गधा है जो समस्त जीव जन्तुओं में सबसे अधिक परिश्रमी और निर्भय होकर अपनी अधिष्ठात्री देवी कालरात्रि को लेकर इस संसार में विचरण कर रहा है। कालरात्रि की पूजा नवरात्र के सातवें दिन की जाती है । इसे कराली भयंकरी कृष्णा और काली माता का स्वरूप भी प्रदान है लेकिन भक्तों पर उनकी असीम कृपा रहती है और उन्हें वह हर तरफ से रक्षा ही प्रदान करती है।

ये सदैव शुभ फल देने वाली मानी जाती है। इसलिए इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है। मां कालरात्रि दुष्टों का विनाश और ग्रह बाधाओं को दूर करने वाली हैं। जिससे साधक भयमुक्त हो जाता है। देवी कालरात्रि तीन नेत्रों वाली दुर्गा के रूप में मशहूर है। उनके श्री अंगों की प्रभा बिजली के समान है। वे सिंह के कंधे पर बैठी हुई भयंकर प्रतीत होती हैं। हाथों में तलवार और ढाल लिए हुए अनेक कन्यायें उनकी सेवा में खडी हुई हैं। वे अपने हाथ में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा धारण किए हुए उनका स्वरूप अग्निमय है तथा वे माथे पर चन्द्रमा का मुकुट धारण करती हैं।

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