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जन जन के राम- राम के मंदिर का निर्माण होगा सुगम: योगेसमोहनजी गुप्ता

योगेश मोहनजी गुप्ता,कुलाधिपति मेरठ। ‘राम’ एक ऐसा शब्द है जिसके स्मरण मात्र से मनुष्य सभी पापों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। श्री राम को ईश्वर सदृश मानना अथवा ना मानना यह श्रृद्धा का विषय है, परन्तु यह सत्य है कि उनके सदृश मर्यादा का पालन करने वाला इतिहास में आज तक कोई नहीं हुआ है और सम्भवतया भविष्य में भी कोई होना असम्भव है, इसलिए ही उन्हें सभी मनुष्यों में उत्तम अर्थात् मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है। श्री राम ने अपने जीवन में सभी का पूर्ण सम्मान किया, चाहे इसमें उनके माता-पिता हो अथवा उनकी प्रजा। जिस मनुष्य का राज्याभिषेक होने वाला हा,े वह व्यक्ति एक सौतेली माँ के कहने से सम्पूर्ण सुख-सुविधाओं को त्याग कर पत्नी को साथ लेकर 14 वर्ष वनवास के लिए चला जाए, ऐसा केवल श्री राम के लिए ही सुना जा सकता है, परन्तु आज की संतान के हृदय में माता-पिता के प्रति ऐसी मर्यादा का होना कल्पना से भी इतर है। श्री राम वह व्यक्ति हैं जो प्रातः उठ कर सर्वप्रथम अपनी तीनों माँ तथा पिता को ढंूढकर उनके चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते थे। जिस व्यक्ति को अपने माता-पिता का हृदय से प्रतिदिन आशीर्वाद प्राप्त हों, वह व्यक्ति तो स्वयं ईश्वर बन जाएगा।
श्री राम का चरित्र आज के युवाओं के लिए एक आदर्श है। यदि आज का युवा श्री राम के आदर्शो में से मात्र 10 प्रतिशत को भी धारण कर ले, तो किसी के भी माता-पिता को अपनी वृद्धावस्था में दुखी नहीं होना पड़ेगा। आज विश्व के अधिकांश युवा अपने वृद्ध माता-पिता को एक भार सदृश समझते हैं। जब वे उनसे सब कुछ प्राप्त कर लेते हैं तो वे उनके बारे में यही सोचते हैं कि वे अशक्त माँ-बाप शीघ्रातिशीघ्र दूसरे लोक को गमन कर जाएं।
श्री राम अत्यंत कल्याणकारी व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्हें जहाँ-जहाँ और जब भी कोई अवसर प्राप्त हुआ, उन्होने सभी का कल्याण किया, फिर वह चाहे शर्वरी, केवट, सुग्रीव, विभीषण अथवा अहिल्या हो। उन्होंने अपने माता-पिता से आशीर्वाद स्वरूप प्रदत्त शक्तियों का अपने सम्पूर्ण जीवन में सदैव परहित में सदुपयोग किया।
श्री राम के स्वभाव में सौम्यता की गहनता इतनी अधिक थी कि समुद्र से लंका जाने के लिए मार्ग अनुरोध करने के लिए तीन दिन की तपस्या करना बलप्रयोग की अपेक्षा श्रेयस्कर समझा। उनके स्वभाव में अपने शत्रु रावण के वध के पश्चात भी सौम्यता विद्यमान रही। उन्होने अपने शत्रु का भी आदर किया। उन्होने रावण की मृत्यु के अन्तिम क्षणों में अपने अनुज भ्राता लक्ष्मण जी को उनके पास ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजा और निर्देश दिया कि वह उनके चरणों की ओर खड़े होकर उनको सर्वप्रथम प्रणाम करें।
श्री राम का व्यक्तित्व असाधारण था। वे अयोध्या के राजा होते हुए भी प्रत्येक रात्रि को जनता के दुख जानने के लिए स्वयं राज्य में साधारण वेष में भ्रमण किया करते थे। वर्तमान में क्या किसी राजनेता से ऐसी आशा की जा सकती है, निश्चितः नहीं। श्री राम जी की कर्तव्यनिष्ठता और प्रजा के प्रति उनके आगाध प्रेम की पराकाष्ठा के उदाहरणस्वरूप यह है कि जब एक धोबी के तानों से ही जनता की भावना की कद्र कर उन्होेने अपनी धर्मपत्नी सीता जी का त्याग कर दिया। ऐसा उदाहरण एक राजा का इस संसार में कभी नही मिल सकता।
आज यह सोच कर दुख होता है कि एक ऐसे महान व्यक्ति की जन्मस्थली पर लगभग 50 वर्षो या उससे अधिक होने के पश्चात भी उस भूमि पर उनका पावन मन्दिर बनने के विरोध में एक वर्ग खड़ा है। वह वर्ग यह भूल जाता है कि कभी उनके पूर्वज भी राम के भक्त थे। उनके पूर्वजों ने भी श्री राम के लिये युद्ध किये होंगे। अयोध्या में जिस किसी भी मुगल बादशाह ने मस्जिद बनायी होगी, उसको बनाने के लिए उसने लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम किया होगा और उस कत्लेआम में आज के मुसलमानों के पूर्वज (जो कभी त्यागी, गुर्जर राजपूत, जाट आदि) भी शामिल होंगे। इस ऐतिहासिक अन्याय के विरुद्ध यह होना चाहिए कि जो मुसलमान उपरोक्त जातिंया अभी भी लिखते हैं, वह आगे आये और इस ऐतिहासिक अन्याय को न्याय में परिवर्तित करके वहाँ पर भव्य मंदिर बनाये और अपनी आने वाली पीढ़ी को श्री राम के आदर्शो पर चलने की सीख दें। यदि मुस्लिम माता-पिता अपने पुत्रों से अपने चरण स्पर्श करायें तो वे पुत्रों के द्वारा चरण स्पर्श मात्र से कितने सुख की अनुभूति करेंगे इसका कल्पना नहीं की जा सकती और पुत्रों के चरण स्पर्श के पश्चात उनके मुख से निःसृत आशीर्वाद से निश्चिततः आगामी युवा पीढ़ी का कल्याण होगा। वे सही गलत की पहचान कर पायेगें और सही का साथ देकर एक आदर्श समाज की स्थापना करेंगे, फलस्वरूप अयोध्या में श्री राम के मंदिर का निर्माण करना भी सुगम होगा।

योगेश मोहनजी गुप्ता
चेयरमैन
आई आई एम टी यूनिवर्सिटी
मेरठ
भारत

*योगेश मोहनजी गुप्ता*
कुलाधिपति
आई आई एम टी यूनिवर्सिटी
मेरठ, भारत

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