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बहस में भाषा, नामकरण और राजधानी : चन्दा चौधरी

हिमालिनी  अंक अगस्त , सितंबर  2019 | प्रदेश नं २ में प्रदेश की राजधानी, नामकरण और भाषा की चर्चा शिखर पर है । विभिन्न कोण से अनेक विचार प्रवाहित किया जा रहा है । वैसे ही प्रदेश सभा मे सत्तापक्ष और विपक्ष के खेमे से आधिकारिक प्रस्ताव भी आ चुका है । प्रदेश नामकरण के सवाल में मधेश, जानकी, मिथिला, मधेश मिथिला, मिथिला भोजपुरा जैसा नाम आगे लाया गया है । नामकरण और भाषिक विवाद के दीर्घकालीन समाधान करने का जिम्मा प्रदेश सरकार का है । और प्रदेश सरका रद्वारा लिया गया निर्णय दीर्घकाल तक स्वीकार्य हो यह आशा की जानी चाहिए ।

नेपाल को संघीय संरचना मे ले जाने का सपना मधेशवादी दलों ने देखा था । आज नेपाल संघीयता अभ्यास में लगी है । वर्तमान संघीय संरचनामा केन्द्रिकृत मानसिकतावदियों का प्रभाव अभी भी तीब्र है । ऐसी परिस्थिति में नामकरण और भाषिक विवादों का शिकार नहीं बनना चाहिए प्रदेश २ । अगर ऐसा होता है तो फायदा संघीयता विरोधी मानसिकता वाले को ही पहुँचना तय है ।

सवाल नामकरण का
संघीयता के लिए आन्दोलन और बलिदानी देने वाली राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल और समाजवादी पार्टी ने प्रदेश २ के नाम मधेश प्रदेश रखने का प्रस्ताव करने के बाद विपक्षी और मधेश आन्दोलन को कभी न स्वीकारने वाली ताकतों का तर्क आता है कि क्या मधेश को सिर्फ आठ जिले में सीमित किया जाना उचित होगा ? ऐसा कहने से यह तो स्पष्ट होता है कि उनकी नजर में मधेश का अस्तित्व अवश्य है । तो मधेश पक्षधर यह कह सकते हंै कि क्या मधेश का इतिहास सिर्फ ८ जिलों में है ? सम्पुर्ण मिथिला की गरिमा को सिर्फ ८ जिलों में समेटना उचित होगा ? इतना ही नहीं जब यह दलील दिया जाता है कि मधेश आन्दोलन मे हुए शहादत का प्रतिफल है संघीयता तो मधेश विरोधी ताकतों का तर्क यह होता है कि मिथिला आन्दोलन ने भी शहादत दिया है । परंतु यही किसी से छुपा नही है की मिथिला राज्य के लिए चल रहे आन्दोलन के दौरान जो बम बिस्फोट किया गया था वह आन्दोलनकारियो को लक्षित कर नही बल्कि किसी व्यक्ति विशेष को नुकसान पहुँचाने के लिए बम बिस्फोट करने की योजना थी । यह घटना किसी से छुपी नहीं है ।

मिथिलावादियों से सवाल करने का अर्थ यह कदापि नहीं माना जाना चाहिए कि लेखक को मिथिला सभ्यता से स्नेह नहीं । मिथिला के प्रति उच्च सम्मान है लेखक का । मिथिला सभ्याता की संरक्षण एवं प्रबर्धन के लिए प्रदेश सरकार की तरफ से विभिन्न परियोजना संचालन होना आवश्यक है । मिथिला की सभ्यता पर शोध एवं अध्ययन होना आवश्यक है । मिथिला म्यूजियम की स्थापना भी प्रदेश सरकार के तत्वाधान मे पड़ना जरूरी है ।

प्रदेश २ का नाम अगर मिथिला रखा जाता है तो गौरवपूर्ण इतिहास के धरोहर वाले भोजपुरा को दुख लगना लाजमी है । और मधेश ऐसा भुभाग है जिसके भीतर मिथिला, भोजपुरा, कोचिला जैसी सभ्यता को स्थान मिला है । और मधेश का गौरवपूर्ण इतिहास भी यही है । इस हिसाब से देखा जाय तो प्रदेश २ का नाम मधेश प्रदेश होने पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।

मुद्दा राजधानी का
नेपाल में संघीयता की चर्चा चलने के वक्त से ही प्रदेश के राजधानी निर्धारण के समय आन्तरिक द्वन्द्व होने की अटकलबाजी की जा रही थी । सुविधा प्राप्ति के हिसाब से सारी सुविधायें मुझे ही प्राप्त हो ऐसा मनोविज्ञान होता है इन्सान का । राजधानी किसी भी देश वा प्रदेश का प्रशासनिक स्थल होता है । सबकी पहुँच आसान और भौतिकपुर्वाधार के हिसाब से सम्पन्न जगह को राजधानी बनाने की वैज्ञानिक मान्यता है । और यह न्यायसंगत तर्क भी है । प्रदेश स्थापना काल ही जनकपुरधाम को प्रदेश २ के अस्थायी राजधानी के रूप में घोषणा की गई थी । उक्त घोषणा पश्चात जनकपुर स्थित चुरोटकारखाना मे अवस्थित भवन को प्रदेश २ सरकार कुशलता से प्रयोग में ला रही है ।

 

आवश्यक मन्त्रालय और आवास की व्यवस्थापना की जा चुकी है । साथ ही प्रदेश २ सरकार करोडों राशी खर्च कर चुकी है चुरोटकारखाना में अवस्थित भौतिक पुर्वाधान स्तरोन्नति करने में । स्थायी राजधानी का आकार ले रही जनकपुरधाम से अगर राजधानी हटाने की बात की जाय तो संघीयता विरोधी ताकताें को ही बल पहुँचने वाली है । केन्द्रिकृत मानसिकता अर्थात संघीयता विरोधी ताकताें का बयान आना शुरू हो चुका है कि राजधानी स्थापना के नाम पर अगर करोड़ों राशी खर्च की जाएगी तो विकाश कार्यों में बजेट का निवेश कब होगा ? वैसे भी आर्थिक रूप से विपन्न प्रदेश २ का संघीयता कार्यान्वयण कर आम लोगों में संघीयता का मर्म अनुभूति करबाने के लिए यथेष्ट बजेट की कमी है ।

ऐसी परिस्थति को मध्यनजर रखते हुवे जनकपुर को प्रदेश २ का प्रशासनिक राजधानी का मान्यता देते हुए महोत्तरी के कुछ भाग जो की जनकपुर से जुड़ा है राजधानी की परिधि में लाना चाहिए । पुर्व के सिरहा, सप्तरी को प्रदेश के कृषि राजधानी के रूप मे घोषणा कर कृषि के लिए अधिकतम कार्यक्रम संचालन करना चाहिए । वैसे ही बारा, पर्सा और रौतहट को औद्योगिक राजधानी के तौर पे घोषणा करनी चाहिए । और जिलों में कैसे नयाँ उद्योग स्थापना की जा सकती है उसपे अधिक ध्यान देना चाहिए । ऐसा करने से प्रदेश २ के आठो जिल्लो मे अवस्थित लोगाें की भावनाआें को कदर की जा सकती है ।

भाषाः एक संवेदनशील आयाम
नेपाल भाषिक हिसाब से बहुलभाषियाें का वासस्थल है । पिछले जनगणना के अनुसार नेपाल मे १२३ भाषाआें को मातृभाषा का दर्जा दिया गया है । जिन में से अधिकतर मैथिली, थारु, भोजपुरी जैसी भाषाओं का प्रयोग मधेश में किया जाता है । नेपाल सरकार के तथ्याङ्कनुसार ११.५७ प्रतिशत मैथिली भाषी हैं नेपाल में । जो की नेपाली भाषा के बाद बोले जाने वाली दूसरी भाषा है । वैसे ही ५.९८ भोजपुरी, ५.७७ थारु, २.९९ बज्जिका और १.८९ प्रतिशत अवधी भाषा बोलने वाले हैं मधेश मे । और प्रदेश २ में इन सभी भाषाओ का अपना वजूद और अस्तित्व है । ऐसी भाषिक विविधता (लिंगुइस्टिक डाइभरसिटी) रहे भुभाग मे भाषा से जुड़े मुद्दों को अगर गम्भीरता से नहीं लिया गया तो भाषिक द्वन्द्व की सम्भावना बढ़ने लगती है । विदित है कि भाषा आमजन की भावना से जुड़ी एक अहम आयाम है । अभी पहचान की लड़ाई काठमाण्डौ में चल रही है ऐसे समय में आन्तरिक भाषिक कलह में फसने का सीधा असर संघीयता पर पड़ सकता है ।

भाषा की बात करें तो हमें पता होना चाहिए कि भाषिक विविधता रहे देश में सम्पर्क भाषा अर्थात ‘लिंग्वा फ्रांका’ की आवश्यकता पड़ती है । सर्लाही की बज्जिका भाषी को अगर मैिथली भाषा बोल्ने वाले लोगाें से बात करना हो तो कौन सी भाषा मे सहजता से बात कर सकते हैं ? वैसे तो लोग संबाद करते समय उसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जिसमें उनको सहज लगता हो । परंतु सम्पर्क भाषा के रुप में हिन्दी ही सामने आती है । नेपाल के पिछले जनगणना अनुसार ०.४७ प्रतिशत नागरिक ने अपनी मातृभाषा हिन्दी को दर्ज करवाया है । नेपाल के दक्षिण भुभाग अर्थात मधेश मे हिन्दी सम्पर्क भाषा के रूप में लागु होने का विकल्प नही देखा जा रहा है । वैसे नेपाली भी है परंतु हिन्दी जितनी सुलभता अन्य भाषा मे नही प्राप्त होती है, सम्पर्क भाषा के लिए ।

प्रदेश २ मे उत्पन्न भाषिक विवाद कोई आश्चर्य का विषय नही । परंतु इसको बिस्फोट होने से रोकने के लिए अभी के नवनिर्वाचित प्रतिनिधि को गहनता से लेना होगा इस बिषय को । भाषिक अभियन्ताओ को यह नही भूलना चाहिए कि अभी के पोस्टमोडर्ननिज्म वाले युग में कोई भी किसी के उपर कुछ भी लाद नही सकते, और भाषा तो और भी नही । भाषा प्रत्येक व्यक्ति के पहचान से जुड़ा तत्व है । पहचान की लड़ाई चल रही इस समय में प्रदेश सरकार को भाषा से जुड़ी समस्या का सुक्ष्म अध्यन अनुसन्धान कर भाषिक अवधारणा को आगे बढ़ाना होगा । नेपाल के संविधान ने देश भीतर रही सभी भाषाओं का अस्तित्व सुरक्षा तथा प्रबर्धन के लिए दरवाजा

खोल रखा है । अब जिम्मा प्रदेश सरकार का है कि कैसे सभी भाषाआें के अस्तित्व की रक्षा करती है और सम्मानजनक स्थान देती है ।
तुलनात्मक राजनीति के प्राध्यापक एड्रियन गुल्के ने आफ्नी पुस्तक ‘पोलिटिक्स इन डिप्ली डिभाइडेड सोसाइटी’ में कहा है कि युरोप मे सीमांतकृतो के भाषा के मुद्दा को गम्भीरता के साथ युरोपियन चार्टर में ना लेने के कारण युरोप के भीतर राष्ट्रीय एकजुटता पर ही खलल उठ चुका था जिसके कारण लम्बे समय तक भाषिक द्वन्द्व ने स्थान प्राप्त करता रहा । वैसी परिस्थिति नेपाल के प्रदेश २ में उत्पन्न न हो इसपे विशेष ध्यान देना जरूरी है । टुकड़े में विभाजित मधेश के भीतर के आठ जिलों का चारकिल्ला बढ़ाने के लिए राजनीतिक लड़ाई आगे बढ़ाने की आवश्यकता है । मधेश आन्दोलन की गम्भीरता जिसको पता होगा वे मधेश प्रदेश का विरोध कर ही नहीं सकते हैं । प्रदेश राजधानी के सन्दर्भ में प्रदेश २ सरकार को प्रदेश के अधिकतम नागरिक की इच्छा को समेट कर आगे बढ़ना उचित होगा ।
चंदाौधरी , संघीय सांसद, राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल

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