उतरती हैं जिस पर सूरज की किरणें, माँ वो राैशनी, धूप और शिवालय है : रुचि शाह
माँ हैं तो सबकुछ संभाले हैं
माँ हैं तो घर में उजाले हैं।
उतरती है जिस पर सूरज की किरणें,
माँ वो रोशनी, धूप और शिवालय हैं।
सोचती हूँ गर माँ न होती!!!
क्या पा के हाथों सब आसां हो पाता ?
ढलती सांझ बन जाते वो खुद ही,
खुद को ही मुश्किल से संभाला होता,
पर माँ हैं तो रोशन है, कच्चा वो आंगन!
पर माँ हैं तो फूलें हैं आम और जामुन!
वो माँ हीं हैं जो बोती हैं प्याज और लहसुन!
हैं रखें बचाकर चिप्स, कचरी और पापड़।
हैं फूलें गेंदे, गुलाब, हरसिंगारऔर रातरानी
जिनमें बसी माँ खुशबू तुम्हारी ❤


