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भैयादूज / यम द्वितीया/चित्रगुप्त पूजा : आचार्य राधाकान्त शास्त्री

 

भैयादूज / यम द्वितीया/चित्रगुप्त पूजा :-
भ्रातृ द्वितीया (भाई दूज) कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला महालक्ष्मी व्रत में बहन से आशीष लेकर सुख समृद्धि प्राप्ति का पर्व है ।
इसे भैया दूज या यम द्वितीया भी कहते हैं।
कल का भैया दूज प्रातः 7:50 से प्रतिपदा उपरांत द्वितीया विशाखा नक्षत्र एवं आयुष्मान योग में प्रातः 8 बजे से व्रत पूजन एवं गोधन कूटने का मुहूर्त है । कल दिन भर का प्रसस्त सर्व कार्यसिद्धक मुहूर्त होने से सभी मांगलिक कार्य सम्पादित होंगे ।
विधि प्रचलन के अनुसार सुबह से रात 9 बजे तक के मुहूर्त में बिना रोक टोक के सभी मांगलिक कार्य किये जायेंगे,
जबकि सुबह 8 बजे से ही गोधन कूटने के मुहूर्त होने से इस वर्ष बहनों को इंतजार नही करना पड़ेगा
यम द्वितीया में बहन रूप लक्ष्मी भाई के आयु आरोग्यता -वृद्धि तथा उसके सर्वकामना पूर्ति हेतु कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मनाई जाती है , भाई दूज दीपावली के दो दिन बाद आने वाला ऐसा पर्व है, जो भाई के प्रति बहन के स्नेह को अभिव्यक्त करता है एवं बहनें अपने भाई की खुशहाली के लिए कामना करती हैं।
आज के दिन ही भगवान चित्रगुप्त की जयंती होने से, उनकी पूजा एवं भगवान चित्रगुप्त के आशीर्वाद से सबके जीवन में उत्तम विद्या , बुद्धि, तेजस्विता , उत्तम कर्म धर्म ,लेखनी , अभियंत्रण एवं मंत्रित्व क्षमता प्राप्त होती है

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पौराणिक मान्यता :-

कार्तिक शुक्ल द्वितीया को पूर्व काल में यमुना ने यमराज को अपने घर पर सत्कारपूर्वक भोजन कराया था। उस दिन नारकी जीवों को यातना से छुटकारा मिला और उन्हें तृप्त किया गया। वे पाप-मुक्त होकर सब बंधनों से छुटकारा पा गये और सब के सब यहां अपनी इच्छा के अनुसार संतोष पूर्वक रहे। उन सब ने मिलकर एक महान् उत्सव मनाया जो यमलोक के राज्य को सुख पहुंचाने वाला था। इसीलिए यह तिथि तीनों लोकों में यम द्वितीया के नाम से विख्यात हुई।जिस तिथि को यमुना ने यम को अपने घर भोजन कराया था, उस तिथि के दिन जो मनुष्य अपनी बहन के हाथ का उत्तम भोजन करता है उसे उत्तम भोजन समेत धन की प्राप्ति भी होती रहती है ।
पद्म पुराण में कहा गया है कि कार्तिक शुक्लपक्ष की द्वितीया को पूर्वाह्न में यम की पूजा करके यमुना में स्नान करने वाला मनुष्य यमलोक को नहीं देखता (अर्थात उसको मुक्ति प्राप्त हो जाती है)।

विधि :-

समझदार लोगों को इस तिथि को अपने घर मुख्य भोजन नहीं करना चाहिए। उन्हें अपनी बहन के घर जाकर उन्हीं के हाथ से बने हुए पुष्टिवर्धक भोजन को स्नेह पूर्वक ग्रहण करना चाहिए तथा जितनी बहनें हों उन सबको पूजा और सत्कार के साथ विधिपूर्वक वस्त्र, आभूषण आदि देना चाहिए। सगी बहन के हाथ का भोजन उत्तम माना गया है। उसके अभाव में किसी भी बहन के हाथ का भोजन करना चाहिए। यदि अपनी बहन न हो तो अपने चाचा या मामा की पुत्री को या माता पिता की बहन को या मौसी की पुत्री या मित्र की बहन को भी बहन मानकर ऐसा करना चाहिए।बहन को चाहिए कि वह भाई को शुभासन पर बिठाकर उसके हाथ-पैर धुलाये। गंधादि से उसका सम्मान करे और दाल-भात, फुलके, कढ़ी, सीरा, पूरी, चूरमा अथवा लड्डू, जलेबी, घेवर आदि (जो भी उपलब्ध हो) यथा सामर्थ्य उत्तम पदार्थों का भोजन कराये। भाई बहन को अन्न, वस्त्र आदि देकर उससे शुभाशीष प्राप्त करे।

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लोक प्रचलन :-
एक उच्चासन (मोढ़ा, पीढ़ी) पर चावल के घोल से पांच शंक्वाकार आकृति बनाई जाती है। उसके बीच में सिंदूर लगा दिया जाता है। आगे में स्वच्छ जल, 6 कुम्हरे का फूल, सिंदूर, 6 पान के पत्ते, 6 सुपारी, बड़ी इलायची, छोटी इलाइची, हर्रे, जायफल इत्यादि रहते हैं। कुम्हरे का फूल नहीं होने पर गेंदा का फूल भी रह सकता है। बहन भाई के पैर धुलाती है। इसके बाद उच्चासन (मोढ़े, पीढ़ी) पर बैठाती है और अंजलि-बद्ध होकर भाई के दोनों हाथों में चावल का घोल एवं सिंदूर लगा देती है। हाथ में मधु, गाय का घी, चंदन लगा देती है। इसके बाद भाई की अंजलि में पान का पत्ता, सुपारी, कुम्हरे का फूल, जायफल इत्यादि देकर कहती है – “यमुना ने निमंत्रण दिया यम को, मैं निमंत्रण दे रही हूं अपने भाई को; जितनी बड़ी यमुना जी की धारा, उतनी बड़ी मेरे भाई की आयु।” यह कहकर अंजलि में जल डाल देती है। इस तरह तीन बार करती है, तब जल से हाथ-पैर धो देती है और कपड़े से पोंछ देती है। टीका लगा देती है। इसके बाद भुना हुआ मखान खिलाती है। भाई बहन को अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार देता है।इसके बाद उत्तम पदार्थों का भोजन किया और कराया जाता है।
माता महालक्ष्मी , सबके घर बहन , बेटी के रूप में पधार कर सबके जीवन मे सुख समृद्धि, शांति , ऐश्वर्य, स्थिर संपदा , सन्तति एवं संतान सुख प्रदान करें, भैया दूज एवं चित्रगुप्त पूजा की हार्दिक शुभकामना , आचार्य राधाकान्त शास्त्री ,

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