एक निरीह युवक की नेपाल प्रहरी के गोली से निर्मम हत्या पर : गंगेश मिश्र अनुरागी
है, ज़ख़्म वही;
फ़िर से उभरा;
जो रिसता रहा;
वर्षों पहले से;
फ़िर ख़ून बहा;
अपनी धरती पर;
अपनों की ख़ुदगर्ज़ी से;
कुछ बूँद गिरेंगे आँसू के;
जो धूल में मिल;
ग़ुम जाएँगे;
कुर्सी की ख़ातिर, याचक बन
फ़िर लौट के घर, वो आएँगे;
लज्जा, लालच की बेदी पर;
क़ुर्बान किया है, अपनों नें;
सत्ता- सुख को, लालायित;
जो खोए रहते, सपनों में;
अवसर की ताक में, रहते जो;
हित अपना ही, सर्वोपरि है;
जनता को, हर बार ठगे;
वो मित्र नहीं, व्यापारी है;
है वक़्त अभी, समझो इनको;
अपना सर, फ़िर ना दो इनको;
कुर्सी की लालच, में फँसकर;
घर अपना तो, ना बेचों इनको;
हर बार ठगे, जाते हो तुम;
अपनों को, ठुकराके तुम;
यूँ चन्द, खनकते सिक्कों के;
ख़ातिर, कुत्ते बन जाते तुम।
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** संदर्भ – कृष्णानगर, कपिलवस्तु में लक्ष्मी मूर्ति विसर्जन के क्रम में, समुदाय विशेष द्वारा अवरोध और कर्फ्यू के दौरा एक निरीह युवक की नेपाल प्रहरी के गोली से निर्मम हत्या।

