Mon. Nov 18th, 2019

वह कुछ बिखरी बिखरी सी थी : इरा ठाकुर

कौन
 फिर ग़मगीन थी
आज रात ,कलम मेरी
रात वो  फिर से
कुछ छलकते दर्द को
सफेद पन्नों पर ,
लिखने को बेताब थी
 मोती के से शब्दों में जो
सफेद पन्नों पर उतरी थी
वह कुछ बिखरी बिखरी सी थी
पता नहीं वह क्या थी
वो काली स्याही थी या थे
आंखों से बहते अनवरत आँसू
या थी काली स्याही सी
 स्याह काली रात
ना जाने आज रात
 फिर कौन रोया था
मेरी कलम रोई थी
मेरी आँखें रोई थीं
या फिर वो रोया था
जिसकी आँतें फुटपाथ पर
पड़े पड़े भूख से ऐंठ रही थीं
प्रश्न तो कई थे पर ,
सबके सब अनुत्तरित
                                  इरा ठाकुर

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