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संघीय सरकार का विवादित निर्णय लोकतंत्र के लिये खतरा : चन्दन दुबे

चन्दन दुबे, जलेश्वर । एक साथ सात प्रदेश के प्रमुखको बर्खास्त कर संघीय सरकार ने ननिश्चितरूप से विभिन्न राजनीतिक दलों,राजनीतिक विश्लेषकों,पत्रकारों,बुद्धिजीवियों एवं सभी सचेत नेपाली नागरिकों के मन मे एक प्रकारका कौतूहल पैदा कर दिया है।
हालांकि तत्काल इस निर्णयका एक ही उधेश्य हो सकता है और वो सिर्फ ये की इससे पहले की शेर बहादुर देउवा सरकार द्वारा नियुक्त लोगों को हटाकर नेकपा के नेताओं या नेकपा निकट के लोगों को रोजगार देना और कुल सात ही प्रदेश पर इसी रास्ते संघीय सरकार के हस्तक्षेप को मजबूत भी करना।
फिर भी इस प्रकार एक ही साथ सभी प्रदेश के प्रमुखों की बर्खास्तगी ने निश्चितरूपसे लोगों के मन मे अनेक प्रश्नों को एक साथ जन्म दे दिया है।किसीको यह संघीयता विरोधी कदम दिखाई देरहा है तो कोई देश में नेकपाकरण को बढ़ता हुआ देखरहा है तो कोई इसे सरकार का अपरिपक्व तथा विवादित निर्णय बता रहा है।सिर्फ इतना ही नहीं कुछलोग तो इसे व्यवस्था परिवर्तन के संकेत के रूपमे भी देख रहे हैं।
लोगों की आशंकाएं ग़ैरमुनासिब भी नहीं हैं।इस प्रकार एक साथ सभी प्रदेश प्रमुखों को बर्खास्त कर संघीय सरकार ने लोगोंको सोंचने और आशंका करने पर निसंदेह मजबूर कर दिया है।
क्रमशः भी इनको परिवर्तित किया जा सकता था।दुनियां के अन्य गणतांत्रिक देशों में भी संघीय पार्टियां प्रदेशों की सरकारों पर नियन्त्रण या हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए इस प्रकार प्रदेश प्रमुखों को परिवर्तित करने का काम करती है, किन्तु यहां एक साथ सभी को बर्खास्त किया जाना निश्चितरूपसे अपने आपमे एक राजनीतिक आशंका और प्रश्न को जन्म देता है।
यद्दपि संघीय सरकार के इस निर्णय से भी देश के ६ प्रदेशों की सरकार और व्यस्था में बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन प्रदेश नं.२ की सरकार के लिए यह फैसला निराशाजनक हो सकता है जहां की सपा और राजपा की गठबंधन की सरकार है और निवर्तमान प्रदेश प्रमुख रत्नेश्वर लाल कायस्थ सपा की सिफारिश से नियुक्त किए गए थे।
राजनीतिक बुद्धिजीवियों को यह निर्णय बिल्कुल ही अटपटा और अपरिपक्व लगता है तो नेपाली कांग्रेस, राजपा और सपा के नेताओं की मानें तो के पी ओली सरकार के द्वारा अचानक लिया गया यह एक नितान्त ही विवादास्पद और महत्वाकांक्षी फैसला है।
एक तरफ जहाँ देश की आवाम इस दो तिहाई बहुमत के के पी ओली सरकार के निकम्मेपन और चुटकुलों से तंग आ गई है, वहीं इस सरकार और नेकपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के विभिन्न प्रकार के आपराधिक,असामाजिक और अराजक क्रियाकलापों के कारण इनके विरुद्ध देश के हरेक हिस्से में लोगों में घृणा और आक्रोश की भावना भी बढ़नी सुरु हो गई है।
देश मे सुशासन,विकास और सहिष्णुता का वातावरण स्थापित करने में सय प्रतिशत विफल रही यह सरकार अब स्वेच्छाचारी निर्णयों के माध्यम से देश में आशंकाओं और आतंक का माहौल बनाना चाहती है।
एक तरफ दो तिहाई बहुमतवाली स्वेच्छाचारी सरकार जो खुद भी लगातार विभिन्न अस्पतालों में पड़ी रहती है और देश को भी बीमार करने पे आमादा हैं और देश के सारे तन्त्र को नितान्त अलोकतांत्रिक तरीके से कब्जा करने में जुटी है वहीं दूसरी तरफ लाचार प्रतिपक्षी नेपाली कांग्रेस अपनी उसी यथास्थितिवादी और पारम्परिक प्रवृति के साथ खरगोश की निंद्रा में सोई हुई है।उपेन्द्र यादव और बाबूराम जी कभी हंसते हुए तो गाल फुलाते हुए सरकार के मज़े ले रहे हैं तो आन्तरिक कलह की शिकार राजपा जो प्रदेश न.२की सरकार में भी बैक बेंचर है वो सरकार का समर्थन करें कि विरोध शायद इसी असमंजस की स्थिति में है।
जो हालात नेपाल के अंदर पैदा हो गए हैं और जिस प्रकारके विवादित फैसले संघीय सरकार ले रही है जिसके कारण निश्चितरूपसे यह कहना गलत नहीं होगा कि लोकतन्त्र के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है।

चन्दन दुबे
केंद्रीय,सदस्य
राजपा,नेपाल

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