झरे फूल की डाली पे नए फूल फिर उग आते है : प्रविण कुमार कर्ण
प्रविण कुमार कर्ण
ऐ माली धागे में
पिरो दे फूल
जिन्हें मैं सींचता रहता हूं
मिट्टी खाद पानी से
जो उग आते है
डालो पे
ऐ माली
रँगी बिरंगी
भीनी खुशबू लिए
अनुपम अद्भुत आंखों मे
बस जाती है
ऐ माली
कभी कांट छांट करता हुं
कभी उखाड़ फेंक लगाता हुं नए फूल।
ऐ माली शाख से टूट के
जो मुरझा जाते है,
बन के कांटे
कुछ डालियाँ चुभ जाती है।
ऐ माली
झरे फूल की डाली पे
नए फूल फिर उग आते है
उजड़ी बगिया भी
फिर लहलहाते है।
ऐ माली
धागे में पिरो दे फूल
कर दूँ तुझे अर्पण
माला जीवन का। : प्रविण कुमार कर्ण


