इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा : हरिवंशराय बच्चन

हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के पुरोधा कवियों में से एक हैं, उन्होंने हिंदी कविता को ‘मधुशाला’ जैसी कालजयी रचना दी है।
मुसलमान औ हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला।
मधुबाला
मेरे सुमनों की गंध कहीं यह वायु उड़ा ले जाती है
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये, ये साधन भी छिन जाएँगे,
तब मानव की चेतनता का आधार न जाने क्या होगा
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा
निशा निमंत्रण
हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं-
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
प्रणय पत्रिका
मौन रात इस भाँति कि जैसे
कोई गत वीणा पर बजकर
अभी-अभी सोई खोई-सी
सपनों में तारों पर सिर धर,
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ
जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारी तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता।
मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय, तुम आते, तब क्या होता।
हलाहल
आसरा मत ऊपर का देख
सहारा मत नीचे का माँग
यही क्या कम तुझको वरदान
कि तेरे अंतस्तल में राग
राग से बाँधे चल आकाश
राग से बाँधे चल पाताल
धँसा चल अंधकार को भेद
राग से साधे अपनी चाल
साभार- कविताकोश


