Mon. Apr 6th, 2020

पिता के रिक्शा से आईएएस तक का सफर : डॉ. श्रीगोपाल नारसन

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हिमालिनी  अंक  नवंबर  2019,  डॉ. श्रीगोपाल नारसन | सिर से पैर तक गरीबी में डूबे गोविंद जायसवाल के पिता बनारस की एक निम्नवर्गीय कालौनी में एक कमरे के मकान में रहते थे और एक राशन की सरकारी दुकान में काम करते थे । दुकान जब बंद हो जाती तो रात में बनारस की सड़कों पर रिक्शा चलाते थे ।उनके द्ध बच्चे थे, घ बेटियां और सबसे छोटा बेटा जिसका नाम गोविंद रखा गया था । उन्होंने कुछ पैसे जोड़ कर धीरे–धीरे एक से चार रिक्शे बना लिए । एक खुद चलाते और बाकी घ किराये पर दे देते । समय बीतता रहा । पिता ने तीनों बेटियों को सामर्थ्यानुसार पढ़ाया, बीए तक करा के तीनों की शादी कर दी ।उनका सबसे छोटा बेटा गोविंद बहुत मेधावी था ।वे जिस मोहल्ले में रहते थे, उसके बगल में ही एक पॉश कालोनी थी । ज्ञद्द वर्षीय गोविंद चूंकि मेधावी था, इसलिए उसकी पॉश कालोनी के एक बच्चे से दोस्ती हो गयी । एक दिन वह उसके घर गया, जहां दोस्त के पिताजी मिले ।

पिता के रिक्शा से आईएएस तक का सफर
Gopal Narsan

दोस्त के पिताजी ने अपने बेटे से पूछा ये बच्चा कौन है ?
दोस्त ने कहा, मेरा दोस्त है ।
उन्होंने मुझसे पूछा, किस क्लास में पढ़ते हो ?
गोविंद ने बताया, जी ठतज में…।
पापा क्या करते हैं ?
गोविंद ने बताया, जी रिक्शा चलाते हैं।

यह सुनते ही दोस्त के पिताजी आग बबूला हो गये । उन्होंने अपने बेटे को फटकारा….. । अब यही बचा है ? रिक्शे वालों से दोस्ती करोगे ? दोस्त चुप होकर रह गया और दोस्त के अमीर पिता ने गोविंद को वहां से बेइजÞ्जÞत करके निकाल दिया ।

मासूम गोविंद को यह समझ ही नही आया कि उसके साथ ऐसा क्यो हुआ ?
उन्होंने अपने एक रिश्तेदार को यह बात बताई । रिश्तेदार ने कहा कि इस स्थिति से बाहर निकलने का बस एक ही रास्ता है कि तुम आईएएस बन जाओ ! लेकिन ज्ञद्द साल के बच्चे को यह जानकारी न थी कि आईएएस क्या होता है ? परन्तु उसने ठान लिया कि उसे आईएएस बनना है । उसने बनारस से ही पहले इंटर किया फिर गणित से से द्यब् साथ साथ यूपीएससी की तैयारी करने लगा ।
उधर पिता रिक्शा चला कर परिवार पाल रहे थे और एक के बाद एक बेटियों की शादियां भी कर रहे थे, साथ ही बेटे को पढ़ा भी रहे थे । यह वह समय था जब बनारस में १४ घंटे के पावर कट लगते थे और उस दौरान सब लोग जनरेटर चलाया करते थे । जिस किराए के छोटे से कमरे में उनका परिवार रहता था, उसके इर्द गिर्द चारों तरफ जनरेटर चलते थे और उसका भयंकर शोर और धुआं होता था । ऐसे में गोविंद सभी खिड़कियां दरवाजÞे बंद कर अपने कानों में रुई ठूँसकर पढा करते थे ।

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ग्रेजुएशन के बाद गोविंद को यूपीएससी की तैयारी के लिए दिल्ली जाना था । लेकिन उनके पिता को एक दिन पैर में हल्की सी चोट लग गयी । उसका कायदे से इलाज नही हुआ और न ही उन्हें आराम मिला । जिसकारण घाव बढ़ने लगा, जो सेफ्टिक की स्थिति तक पहुंच गया ।उधर गोविंद दिल्ली के मुखर्जी नगर में यूपीएससी की तैयारी के लिए रहने लगे । जहां उनके इर्द गिर्द सब लड़के लड़कियां ऐश करते थे, लेकिन गोविंद दिन रात पढ़ते रहते । घर से पैसे मंगाते नही थे । दिल्ली में बच्चों को ट्यूशन रूप में गणित पढाते और फिर उसके बाद ज्ञट घंटे तक अपनी यूपीएससी की तैयारी करते ।

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गोविंद के पास कोचिंग के पैसे नही थे । पिता का पैर खराब होता जा रहा था । ट्यूशन भी साल में सिर्फ ड महीने ही मिलते थीं । आर्थिक संकट के चलते धीरे धीरे उनके सभी रिक्शे बिक गए । एकमात्र जमीन का टुकड़ा था, वह पिताजी ने मजबूरी में सिर्फ द्ध००ण् रु में बेच दिया । घर मे पÞmाकÞा होने लगा था । ऐसे में बहनों ने अपने पति व परिवार से छिपाकर के भाई की मदद की ।
गोविंद इतिहास और मनोविज्ञान पढ़ रहे थे । मनोविज्ञान की कोचिंग में उनकी दो तिहाई फीस माफ हो गई । इतिहास की कोचिंग के पैसे न थे, इसलिए उसकी तैयारी खुद की । वह अनगिनत रातें भूखे पेट सोया होगा । तब जाकर कठोर परिश्रम से पहले ही प्रयास में गोविंद को यूपीएससी की परीक्षा में द्धडवां रेंक मिला और वह हो गए आइएस । आजकल गोविंद जायवाल अरुणांचल प्रदेश में बतौर आईएएस अधिकारी तैनात हैं ।
आईएएस बनने के बाद सबसे पहले उन्होंने पिता के पैर का इलाज कराया । बनारस में घर बनवाया । माता पिता आज भी बनारस में रहते हैं । वह रिक्शा आज भी उनके घर मे खड़ा है । और उनके पिताजी जी आज भी उस रिक्शा को लेकर निकल पड़ते हैं.।
गोविंद, पिताजी से कहते हैं, अब रिक्शा रहने दीजिये । लेकिन पिताजी नही मानते।
गोविंद ने कहा, अच्छा ई रिक्शा ले लीजिये । पिताजी कहते हैं, ई रिक्शा तो चला ही न पाऊंगा, यही ठीक है.।
क्या इतना खराब काम है रिक्शा चलाना? जिस रिक्शे ने घ बेटियां ब्याह दीं और एक बेटा आईएएस बना दिया, वह इतना खराब है क्या ? शायद कदापि नही ।
एडवोकेट

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