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भीतर की आग : राजकुमार जैन राजन

Rajkumar Jain
 

हिमालिनी, अंक- दिसंबर 2019 ।
फिर कहीं
किसी मासूम के साथ
कुकर्म के समाचारों से
लगने लगा जैसे
ईश्वर मर गया हो
ब्रह्मांड फ्यूज हो गया हो
सम्वेदनाओं के कोरों से लटका
मन हो गया उदास
एक भयानक दुःस्वप्न की तरह
लगने लगा है
जैसे मृत उजालों के सिवा
कुछ भी नहीं है आस–पास
इतना उदास तो
तब भी नहीं हुआ था
जब कर्ज के बोझ से दबे
पडौस के धनवंती काका ने
आत्महत्या कर ली थी
और जीवन के सफर में
खुद से खुद की लड़ाई लड़ते हुए
कमला बुआ दुनिया को
विदा कह गई
मौन के जंगलों में भटकते
शब्द–पाखी
लौट आते हैं लहूलुहान
मन के अंदर की गहरी झील
निगल जाती है हर बार उन्हें
और हवा का हर झोंका
खामोशी की लकीर बन
खींच जाता है किसी
अजन्मी पीड़ा में

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छा जाता है
मरुस्थली सन्नाटा
और प्रज्वलित हो जाती है
भीतर की आग
चेतना को जगाने के लिए

नपुसंक हो चुकी मानवता
पंगु है कानून
चेतना को नया आकाश दो
इन व्यभिचारियों को
केवल मृत्यु दंड दो
ताकि फिर कोई न करे
किसी बेटी पर वार
बहुत सह लिया है
आक्रोश विस्फोटक बने
इससे पहले सम्हल जाओ

राजकुमार जैन राजन

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