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बखूबी क़ैद कर रखा था आधी आबादी को, जन्म से मृत्यु-पर्यंत : डॉ• मुक्ता

 

लॉक-डाउन

डॉ• मुक्ता

भारतीय संस्कृति की धरोहर

जिसे सहेज रखा था पुरुष समाज ने

बड़े सलीके से और बखूबी क़ैद कर रखा था

आधी आबादी को जन्म से मृत्यु-पर्यंत

जिससे बेख़बर थी औरत

कन्या भ्रूण रूप में नहीं सुरक्षित

जन्म से ही बोझ समझी जाती

पिता के सुरक्षा-दायरे में पली-बढ़ी

अनगिनत बंधनों में बंधी समझी जाती

‘सदा परायी’ आहत मन से स्वयं को

अजनबी महसूसती

एक अंतराल के पश्चात्

सिर से पांव तक आभूषणों से सुसज्जित

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वस्तु की भांति दान कर दी जाती

पिता उसे डोली में विदा कर

सूक़ून की सांस लेता और प्रारंभ हो जाता

लॉक-डाउन

वह पति के घर को अपना समझ

उसकी चारदीवारी में खुशी से क़ैद रहती

उस लक्ष्मण-रेखा को नहीं लांघती

आजीवन अपने दायित्वों का

बखूबी निर्वहन करती

अहर्निश सबकी सेवा में रत रहती

उसका इतवार कभी आता नहीं

वह तो ‘लॉक-डाउन’ न होने पर भी

घर की चौखट को स्वेच्छा से नहीं लांघती

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और ओंठ सी कर सूक़ून से रहती

कदम-कदम पर समझौता करती

अपने सपनों की चिता जला कर

अरमानों को समिधा-सम होम करती

नारी को केवल ‘सहना है,कहना नहीं’

इस सिद्धांत की सहर्ष अनुपालना करती

ज़िंदगी में कभी नहीं किसी से ग़िला करती

काश! पुरुष को भी बचपन से

समानता का अर्थ समझाया जाता

घर की सीमाओं में रह कर

खुशियां सहेजने का मंत्र सुझाया जाता

हर घर में गूंजती किलकारियां

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और होता मान-मनुहार

उसके लिए घर में रहना न होता दुश्वार

लॉक-डाउन होने से न बढ़ता मनोमालिन्य

न घरेलू हिंसा के किस्से आम होते

न होता पति-पत्नी में अलगाव

न बच्चे एकांत की त्रासदी झेलते

न होते ख़ुदकुशी के हादसे

न घर में पसरा होता मातम

हर घर में सुनाई पड़ते

मंदिर की घण्टियों के मृदुल स्वर

और चहुं ओर बरसता अलौकिक आनंद ।

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