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कोरोना का रोना, न रोना : स्वाति अग्रवाल

 

कोरोना का रोना, न रोना

तेरे छूने भर से यह
एह्सास मैने पाया है
फरिश्ता नहीं तु, एक
जिद्दी बुरा साया है

बेखौफ घूम रहा है तू
देश और दुनिया में
तेरी हंसी पे मैंने
अपना गम छुपाया है

इत्तफाक नहीं तेरा यहाँ आना
सजा है मिली हमें उस रब की
कोहराम जहां मे ऐसा छाया
जान पे बन आई है सब की

तू झोंका है एक हवा का बस
जो छू कर हमें गुजरता है
गरम सांसे, आंखों में पानी
तडपता बिखरता छोड जाता है

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गुमान है तुझे तेरे इरादों पर
तेरा जलवा बेशुमार है
तू छूता है किसी एक को
घायल होते हजार हैं

इस भरे संसार में, एह्सास
तनहाई का हुआ है अब
खिलाफ हो कर खुद के ही
बन गये हम तबाही का सबब

वे कहते रहे न जाना तुम
अपनी सीमा को लांघ कर
पल भर भी न जी सके हम
अपने मन को बांध कर?

राह में जो भी मिला
उन से हाथ मिलाते रहे
गले मिल कर दोस्तों को
हाल ए दिल सुनाते रहे

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पर अब समझ गये हैं हम
खुदा की लाठी का कहर
अलविदा उन सभी आदतों को
बनाया जिसने जिन्दगी को जहर

दौर खुशियों का अब है आया
रुख हवा का ऐसा बदला
जो भूल गये थे अब सीख गये
फिर से जीवन जीने की कला

स्वाती अग्रवाल (बंसल)
नारायणघाट

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