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ये उम्र तो बस तजुर्बों की कहानी हैं : प्रियंका पेड़ीवाल अग्रवाल

 

बचपन की सब ख्वाहिशें छोटे मन में मचलती है,
ये उम्र है रोज हाथ से रेत सी फिसलती है।
मौत ना जाने कब किसको निगलती है?
ये उम्र है रोज हाथ से रेत सी फिसलती है।
चैन की नींद सोये एक जमाना हुआ
बेचैनी भरी अक्सर रातें कटती हैं।
कभी खुद के लिए तो कभी परिवार के लिए
जुगाड़ करने में जिंदगी घटती हुई दिखती हैं।
रोज लाशें उठती देख
श्मसान वैराग्य सा उत्पन्न होता है ।
पर पल भर में मोह में जकड़ जिन्दगी
फिर खुद में सम्मोहित कर लेता है।
पहले सी फु्र्ती ना पाकर अब दिल घबराता हैं।
एक दिन उम्र में इससे भी आगे जाना हैं,
अभी संभलों बाद में पछताना हैं,
ये उम्र है पैसों की तरह हाथ से जाना हैं।
आईने के संग कुछ यूँ लड़ी मैं कल,
गुजरती उम्र ही दिख रही हर घडी हर पल।
वक्त से पहले चोटों से लड़ी मैं,
अपनें उम्र से कई साल बड़ी मैं।
ये उम्र तो बस तजुर्बों की कहानी हैं,
हर होठों पर अनकहीं बातों की और
आँखों में पानी हैं।

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प्रियंका पेड़ीवाल अग्रवाल विराटनगर

प्रियंका पेड़ीवाल अग्रवाल

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