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कभी जिहन में, तो कभी ख्यालों में, जागती आँखों का वो ख्वाब लगे है : विनोद निराश

 

ग़ज़ल

दास्तां-ए-ज़िंदगी, किताब लगे है ,
फुरकत-ए-यार इक अजाब लगे है।फलक पे धुँधली सी तस्वीर उसकी,
दिल-ए-नाशाद, वो अहबाब लगे है।

माह-ए-कामिल , हुस्न-ए-जनाब,
चौदवी की रात का महताब लगे है।

कभी जिहन में, तो कभी ख्यालों में,
जागती आँखों का वो ख्वाब लगे है।

अब्र से निकलता वो महताब निराश,
हुस्न-ए-यार का जैसे हिजाब लगे है।

विनोद निराश, देहरादून

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