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गो़या की हम तनहा रह गये आज सफ़र में : रुपम कुमारी यादव

 

“भँवर”

इस ज़िन्दगी के समन्दर में,
घिर चुके थे हम गहरे भँवर में,
छलाँग तो उँची थी उस लहर में,
पर चल रही थी इक कश्मकश सी इस ज़िगर मे………..
ख़्वाब तो कई थे मेरी नज़र में,
पर लफ़्ज़ जैसे ठहर से गये थे अधर में,
गूँजती हैं चीख़ें आज भी उस दिल के घर में,
कि लहू का रंग अब भी ताज़ा है ख़ंजर में,

भटकते हैं यूँ ही शहनाइयों के शहर में,
अब तो हमने भी घर बसा लिया यादों के खंडहर में,
शायद कमी थी मेरे जज़्बात के ही असर में,
गो़या की हम तनहा रह गये आज सफ़र में……

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रुपम कुमारी यादव, काठमांडू

 

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