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हिमालिनी, अंक फरवरी,२०२१ | जीवन के खालीपन को झेलता हमारा थका मन अक्सर अपने बच्चों, अपने नाती–नातिन, पोते–पोतियों के बीच सुकून तलाशता है । सूनी आँखें, चेहरे की झुर्रियों में अंकित जीवन के खट्टे–मीठे अनुभव, अपनों के लिए अपनी ख्वाहिशों को भूल जाने का संतोष और जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्हीं अपनों से कुछ वक्त पा लेने की चाहत स्वतः दिल में जगह पा लेती है । जो अस्वाभाविक बिल्कुल नहीं है जीवन की यही परिपाटी सदियों से चलती आई है । वृद्ध होता मन बच्चों की चंचलता और मासूमियत में खो जाना चाहता है, जीवन का यह अंतिम पड़ाव उनके साथ गुजारना चाहता है ।

उनकी जमापूँजी उनके नाती–नातिनी, पोता–पोती होते हैं । उनके साथ रमना, उनके साथ खेलना, हर नाना–नानी, दादा–दादी की आन्तरिक इच्छा होती है । बूढ़ी होती आँखों की रोशनी और काँपते हाथों को जब उन नन्हें हाथों का सहारा मिलता है तो लगता है, सब कुछ मिल गया । बच्चों की मासूमियत में भगवान बसते हैं और हम उनमें ईश्वर के उसी रूप का दर्शन कर अलौकिक आनंद प्राप्त करते हैं । बचपना होता ही है मासूमियत से भरा और यही तो बचपन को निखारता है, उसमें जादू भरता है, जिनपर हम न्योछावर होते हैं । किन्तु आज यही बचपन हमारे हाथों से छूटता जा रहा है क्योंकि, उनका बचपन वक्त से पहले बड़ा हो रहा है । कभी–कभी ये फूल जैसे बच्चे एक ऐसे त्रिकोण के बीच अटक जाते हैं कि, उनसे उनकी मासूमियत एकाएक दूर चली जाती है । वो अचानक से बड़े हो जाते हैं ।

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उनका यह बड़ा होना उससे असमय उसका बचपना छीन लेता है और फिर वो ऐसा होता है, जैसे फूलों से खुशबू का चले जाना । उनका मानसिक स्तर का एकाएक बड़ा होना उनके असली स्वरूप को बदल देता है । वे दिन दुनिया की बातें अपनी उमर से ज्यादा समझने लगते हैं और अपने ढंग से उसकी विवेचना करने लग जाते हैं । यहीं से शुरू होता है उनके बालपन में बदलाव । अपने में उनका सिमटना और बड़ों की तरह बर्ताव करना बहुत तकलीफ दायक होता है । ऐसे में सब से बड़ी तकलीफÞ उन बूढ़े नाना–नानी को दादा–दादी को होती है जो उनके साथ खेलने और बतियाने की आकांक्षा के साथ वृद्ध होते हैं । और एक दिन जिस तरह त्रिकोण में कोई चौथा कोण नहीं होता वैसे ही घर के वृद्धों की स्थिति हो जाती है, एक अनचाहा कोण जिसका कोई वजूद नहीं होता । जो हर क्षण अपने आपको अपने ही सामने टूटता हुआ देखता है और साथ ही टूटता है चिरसंचित सपना,जो मृत्यु से भी अधिक पीड़क होता है । काश इस पीड़ा को कोई समझ पाता ।

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बसन्त चौधरी

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