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“अभंग भजन संध्या” का आयोजन, भगवान का नाम विठ्ठल कैसे पड़ा ?

 

काठमांडू,11 जुलाई, । आषाढ़ी एकादशी के अवसर भारतीय दूतावास, काठमांडू के स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र द्वारा दूतावास में ‘अभंग भजन संध्या’ का आयोजन किया गया । स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र की निदेशक डॉ असावरी बापट ने अपने स्वागत संबोधन में बताया कि कार्यक्रम का आयोजन, भारत के पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र के 800 वर्ष पुराने इतिहास, संस्कृति एवं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विट्ठल की आराधना के लिए किया गया। कार्यक्रम में लगभग 45 प्रतिभागियों ने भाग लिया और श्री सुशांत चौधरी द्वारा प्रस्तुत भजन संध्या का आनंद लिया।

एक बहुत ही चर्चित कथा पुंडलिक की कथा है। उसने प्रत्यक्ष भगवान विष्णु को ‘इट’ जिसे मराठी में ‘विट’ कहते है उस पर खडा कर दिया था। और तब से विट के उपर खडे होने वाले भगवान का नाम बन गया विठ्ठल। महाराष्ट्र के संतों ने विठ्ठल को कृष्ण का अवतार माना है। पंढरपूर के साथ विठ्ठल का नाम पांडुरंग भी हो गया लेकीन वारकरी संप्रदाय के लोग तो इसे माऊली- माता के नाम से जानते है।
पंढरपुर भारत के पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र के सोलापुर ज़िले में स्थित है। यह भीमा नदी के किनारे बसा हुआ है जिसे चन्द्र भागा के नाम से भी जाना जाता है। यह शहर, भक्ति संप्रदाय को समर्पित मराठी कवि संतों की पवित्र भूमि भी है। पंढरपुर वारकारी संप्रदाय या विट्ठल संप्रदाय का केंद्र है। विट्ठल संप्रदाय की सबसे अहम् बात यह है कि उन्होंने जन्म आधारित जाति व्यवस्था, ऊंच-नीच, अस्पृश्यता का विरोध किया और सन्यास के विचार का विरोध कर, सांसारिक जीवन में रहकर, दुखी और परित्यक्त लोगों की सेवा करना- मानव का परम कर्तव्य माना । इस मंदिर की महत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र के सबसे अधिक श्रद्धालु इसी मन्दिर में आते हैं।

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महाराष्ट्र की संत परंपरा महान है, विशेष है। उसमें जाति भेद, लिंग भेद को नष्ट करके सारी जाति, पंथ और संप्रदाय के संत जुडते चले गये। विठ्ठल भक्ती में रत इन संतों ने लोगों को इकठ्ठा करना शुरू किया। भक्ती के साथ-साथ सामाजिक और राजकीय दुरवस्था के विरुध्द महाराष्ट्र के लोगों का जागरण प्रारंभ किया। इसके लिये संतों ने ओवी, सवाई, फटका जैसे साहित्य का निर्माण किया। इन संतो के साहित्य का एक विशाल सागर बन गया और प्रायः उनका साहित्य अभंग नाम से जाना जाता है। इस अभंग शब्द की एक कहानी बतायी जाती है-
संत तुकाराम द्वारा तत्कालीन सामाजिक दुरवस्था पर लिखने के कारण लोगों का क्रोध फुट पडा और उन्होने संत तुकाराम का साहित्य जल में समर्पित कर दिया। संत तुकाराम महाराज उद्विग्न हो गये और उन्होने भगवान् विठ्ठल से शिकायत की। संत तुकाराम मंदिर के सामने बैठ गए और भगवान् से कहा “आपको दस दिन के अंदर मेरे सारे छंद मुझे वापस देने होंगे” । और, दस दिन के बाद सारे छंद पुनः उपलब्ध हो गये। उन्हे किसी तरह की कोई क्षति नही पहुंची थी। कोई भंग न होने के कारण उन छंदों को अभंग कहा गया। उसके उपरांत सारे संत साहित्य को ‘अभंग’ नाम प्राप्त हुआ। पूरा कार्यक्रम का विद्वत पूर्ण संचालन श्री सत्येन्द्र दहिया ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन श्री नीरज भंडारी ने किया

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