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संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट, तिब्बत में धर्म, संस्कृति और भाषा का जबरन हो रहा चीनीकरण

 

तिब्बत में चीन सरकार और वहां की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा तिब्बत के बच्चों के लिए चलाए जा रहे विशेष आवासीय स्कूलों के बारे में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग की ताजा रिपोर्ट ने आधुनिक इतिहास के सबसे भयानक, लेकिन भुलाए जा चुके एक अमानवीय अध्याय को फिर से खोल दिया है। आयोग ने चीन सरकार की इसके लिए निंदा की है कि वह तिब्बत की धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को मिटाने के लिए पूरे तिब्बत में ऐसे विशेष आवासीय स्कूलों का जाल बिछा कर लाखों तिब्बती बच्चों को जबरन उनमें भर्ती कर रही है, जहां बच्चों को उनके परिवार और समाज से अलग करके उनका पूरी तरह चीनीकरण किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अल्पसंख्यक मामलों, शिक्षा के अधिकार और सांस्कृतिक अधिकारों से संबंधित विशेष प्रतिनिधियों की साझा रिपोर्ट जारी करते हुए मानवाधिकार आयोग ने रहस्योद्घाटन किया है कि तिब्बत आटोनमस रीजन (टार) के अलावा तिब्बती पहचान वाले दूसरे इलाकों में भी ऐसे सैकड़ों विशेष स्कूल खोले जा चुके हैं, जहां दस लाख से ज्यादा तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों से जबरन छीनकर बंद रखा जा रहा है और उनका ब्रेनवाश किया जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की इस घोषणा ने कुछ शताब्दी पहले यूरोप के उपनिवेशवादियों द्वारा आज के अमेरिका, आस्ट्रेलिया, लैटिन अमेरिका और कनाडा जैसे देशों पर अपना शासन पक्का करने के लिए स्थापित किए गए आवासीय स्कूलों की याद ताजा कर दी है। यूरोप के गोरे उपनिवेशवादी शासकों ने अपने साथ लाए गए क्रिश्चियन चर्च के माध्यम से इन देशों में ऐसे हजारों स्कूल स्थापित किए थे, जहां स्थानीय निवासियों के बच्चों को पकड़कर जबरन रखा जाता था। इन बच्चों को उनके परिवारों और समाज से काटकर इस तरह की यूरोपीय और ईसाइयत की शिक्षा दी गई कि वहां की मूल संस्कृतियां नष्ट हो गईं और यूरोप से आए उपनिवेशवादी शासकों के लिए वहां की जमीनों और प्राकृतिक संसाधनों पर हमेशा के लिए कब्जा करना आसान हो गया। उन स्कूलों में जिस अमानवीय तरीके से वहां के स्थानीय बच्चों की ब्रेनवाशिंग, प्रताड़ना, यौन शोषण और हत्याएं की जाती थीं, इसका इतिहास अब सारी दुनिया जान चुकी है। इन आवासीय स्कूलों की बदौलत उन देशों में वहां के मूल निवासी रेड इंडियन और दूसरे समाज आज अपने इतिहास के अजायबघरों के नमूना भर रह गए हैं जबकि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और हालैंड से गए लोगों की पीढ़ियों का वहां पर स्थायी कब्जा हो चुका है।

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संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की ताजा रिपोर्ट से स्पष्ट हो गया है कि तिब्बत पर 1951 में जबरन कब्जा जमाने के बाद सात दशकों के अत्याचारी शासन के बाद भी चीन के कम्युनिस्ट शासक वहां की सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय अस्मिता को समाप्त करने का जो लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए, उन लक्ष्यों को पूरा करने का काम अब राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने आवासीय स्कूलों के नए अभियान के माध्यम से शुरू कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार द्वारा जारी किए गए वक्तव्य में विशेषज्ञों को उद्धृत करते हुए कहा गया है कि ‘‘हम यह देखकर दुखी हैं कि इन आवासीय स्कूलों में शिक्षा का पाठ्यक्रम और वहां का पूरा वातावरण ऐसा रखा गया है, जो पूरी तरह से हान चीनी चरित्र वाला है। वहां न केवल पाठ्यपुस्तकें पूरी तरह चीनी जीवनशैली की शिक्षा देने वाली हैं और पढ़ाई के माध्यम के लिए चीनी मंदारिन भाषा अनिवार्य है, बल्कि वहां के पाठ्यक्रम और रहन-सहन में तिब्बती भाषा, इतिहास और संस्कृति का कोई स्थान नहीं है। इस व्यवस्था का परिणाम यह हो रहा है कि तिब्बती बच्चे अपनी भाषा भूलने लगे हैं और उनके लिए अपने ही माता-पिता और बड़े-बूढ़ों के साथ अंतरंग बातचीत कर पाना मुश्किल हो गया है। ऐसे में वे अपनी मूल पहचान खोने लगे हैं और चीनी समाज का हिस्सा बनने लगे हैं।’’

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जाहिर है इस रिपोर्ट ने तिब्बती समाज तथा तिब्बत समर्थक संगठनों की ओर से काफी समय से लगाए जा रहे उन आरोपों और चिंताओं की पुष्टि कर दी है कि तिब्बत में पहले से चली आ रही तिब्बती भाषा की शिक्षा को समाप्त किया जा रहा है। पिछले दिनों एक अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट की निदेशक ल्हाडोन टीथोंग ने कहा कि ‘‘शी चिनफिंग के शासनकाल में शुरू किए गए इस नए अभियान के तहत तिब्बत में ऐसे सभी स्कूलों को बंद किया जा चुका है, जो स्थानीय तिब्बती समाजों ने शुरू किए थे। ये ऐसे स्कूल थे जहां चीनी स्कूल में पढ़ाई के बाद बच्चों को तिब्बती भाषा सिखाई जाती थी। ऐसे कई समाचार आ चुके हैं जिनसे पता चला कि इस तरह के स्वयंसेवी स्कूल चलाने वाले तिब्बती अध्यापकों और लामाओं को गिरफ्तारी किया जा रहा है।’’

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तिब्बत में चीनी शासन के विरुद्ध तिब्बती प्रतिरोध को समाप्त करने के लिए माओ के समय से ही वहां दमनचक्र लगातार चलता आया है, लेकिन तिब्बत की जनता की आवाज को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए राष्ट्रपति शी ने अब जो अभियान शुरू किया है, वह बहुत भयावह है। जुलाई 2021 में अचानक की गई अपनी पहली तिब्बत यात्रा में शी ने वहां के कम्युनिस्ट प्रशासकों और पार्टी कैडर को तिब्बत में एक नया अभियान चलाने का निर्देश दिया था, जिसका लक्ष्य तिब्बत के बौद्ध धर्म को एक ऐसे धर्म में बदलना है, जो पूरी तरह से समाजवादी और चीन रंग में रंगा हुआ हो।

शी की तिब्बत यात्रा के कुछ दिन बाद ही चीन सरकार ने यह निर्देश जारी किया कि सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपने व्यवहार में चीन के हितों को सबसे ऊपर रखना होगा। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के अनुसार ‘‘इसी निर्देश का पालन करते हुए तिब्बत की साम्यवादी और पूरी तरह चीनी पहचान स्थापित करने के लिए तिब्बती भाषा और संस्कृति के समर्थकों का दमन किया जा रहा है और तिब्बती भाषा तथा शिक्षा का समर्थन करने वाले लोगों को कुचला जा रहा है।’’ अपने आप को ‘सभ्य’ और ‘लोकतांत्रिक’ बताने वाले विश्व समाज के लिए चीन सरकार का यह नया अभियान एक गंभीर चुनौती है।

विजय क्रांति
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सेंटर फार हिमालयन एशिया स्टडीज एंड एंगेजमेंट के चेयरमैन हैं)

साभार दैनिक जागरण से

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