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कौन हैं बलोच? जिसने पाकिस्तान के जफ्फार एक्सप्रेस को किया अगवा ? : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)

 

मुरली मनोहर तिवारी (सीपू), बीरगंज । पाकिस्तान से बलूचिस्तान की आजादी की मांग करने वाली, “बलूच लिबरेशन आर्मी” (बीएलए) ने एक ट्रेन पर कब्जा कर उसमे सवार 400 यात्रियों को बंधक बना लिया।

बीएलए ने अपने प्रवक्ता जीयंद बलूच द्वारा साइन एक बयान में कहा कि यदि पाकिस्तानी सेना कोई अभियान चलाती है तो बंधकों को मार दिया जाएगा। बीएलए के लड़ाकों ने रेलवे की पटरियाँ उड़ा दीं और ट्रेन को रोकने पर मजबूर कर दिया, जिसके बाद वे उसमें सवार हो गए। ऐसे में अब सवाल उठता है कि आखिर ये बलूच कौन हैं, जो पाकिस्तान सरकार और वहां की सेना के लिए नासूर बन चुके हैं।

बलोच कौन हैं?

दरअसल, मौजूदा अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान के तिमुहाने पर बलूचिस्तान बसा है। बलोच एक जातीय समूह हैं जो बलुचिस्तान क्षेत्र के मूल निवासी हैं। बलोच अपने आप में एक अलग पहचान रखने वाला कौम है। वैसे तो ये इस्लाम धर्म को ही मानते हैं लेकिन, उनकी संस्कृति, भाषा, खान-पान, रहन-सहन हर एक चीज पाकिस्तान में ही पंजाब और सिंध प्रांत के मुस्लिमों से अलग है। उनका क्षेत्रफल सबसे ज्यादा है लेकिन यह सबसे कम आबादी वाला और सबसे गरीब प्रांतों में से एक है।

उनके इलाके में मिनरल्स का अकूत भंडार है, बावजूद इसके उनका पूरा इलाका पाकिस्तान में सबसे पिछले इलाकों में आता है। पाकिस्तान की सियासत और सेना पर पंजाब और सिंध के मुस्लिमों का दबदबा है। ऐसे में बलूचिस्तान और पाकिस्तान के अन्य इलाकों के बीच सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषमता की खाई बहुत चौड़ी है।

प्राकृतिक संसाधनों (गैस, खनिज आदि) से समृद्ध होने के बावजूद, बलुचिस्तान अविकसित है और स्थानीय लोग केंद्र सरकार द्वारा शोषित महसूस करते हैं। कई बलोच लोग राजनीतिक हाशिए पर होने, स्वायत्तता की कमी और अनुचित व्यवहार का आरोप लगाते हैं। जबरन गायब करने, सैन्य अभियानों और मानवाधिकारों के उल्लंघन की रिपोर्टों ने असंतोष को बढ़ावा दिया है। बलूचिस्तान में अभी जो अलगाववादी आंदोलन भड़क रहा है उसकी जड़ें भारत विभाजन के समय से ही पनप रही हैं। बलूचिस्तान तब चार इलाकों “कलात”, “खारान”, “लॉस बुला”, “मकरान” से मिलकर बना था। ये ऐसा इलाका था जिस पर ब्रिटिश साम्राज्य का सीधा शासन नहीं था।

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भारत की आजादी के बाद बलोच कबीलों के सरदार अपने लिए एक अलग राष्ट्र चाहते थे। पाकिस्तान के निर्माण के एक दिन बाद “कलात” इलाका ने स्वयं को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया। “कलात” के नवाब मीर अहमद यार खान ने “कलात” के संसद के उच्च और निम्न सदन भी बना दिए। “कलात” ने कहा कि वह एक स्वतंत्र राष्ट्र होगा और पाकिस्तान के साथ उसका संबंध दोस्ताना रहेगा।

ये जिन्ना की महात्वाकांक्षा पर आघात था। उन्होंने  1 अप्रैल 1948 को कलात में अपनी सेनाएं भेजने का आदेश दिया। पाकिस्तान की सेना के सामने “कलात” ने आत्मसमर्पण कर दिया और पाकिस्तान के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया। इसके साथ ही साढ़े आठ महीने की आजाद “कलात” सरकार इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई, लेकिन बलूचिस्तानियों के सीने में पाकिस्तान से आजादी की आग सुलगती रही।

जिस तरह पाकिस्तान ने बांग्लाभाषियों की भाषायी और सांस्कृतिक पहचान की उपेक्षा की, ऐसी ही स्थिति बलूचिस्तान की भी है। बलूच भाषा और संस्कृति को पाकिस्तानी सरकार द्वारा प्राथमिकता नहीं दी जाती। बलूच समुदाय को लगता है कि उनकी पहचान को खत्म करने की कोशिश की जा रही है।

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बलूच राष्ट्रवादियों को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना ने कई सैन्य अभियान चलाए। बलूचिस्तान से सैकड़ों लोग गायब हो गए है, जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं है। इनके पीछे पाकिस्तान की सेना का हाथ है।

1971 में जब बांग्लादेश युद्ध अपने चरम पर था, बलूचिस्तान की आज़ादी के पक्ष में क्वेटा में जुलूस निकाले गए थे। हालांकि 1970 के दशक में पहली बार हुए विद्रोह को जनरल टिक्का खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तानी सेना ने बेरहमी से दबा दिया था, जिन्हें ‘बलूचिस्तान का कसाई’ का उपनाम मिला था।

बलूचिस्तान आंदोलन के इतिहास में नवाब अकबर खान बुगती बड़े चेहरे हैं। 6 फीट कद, मूंछों पर ताव, चेहरे पर रौब और खरी-खरी कहने वाले अकबर खान बुगती कबीले के मुखिया नवाब मेहराब खान बुगती के बेटे थे।  2005 में बुगती ने पाकिस्तान सरकार के सामने 15 सूत्री एजेंडा पेश किया था। उनकी मांग थी कि बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर वहां के लोगों का नियंत्रण हो साथ ही सैन्य ठिकानों के निर्माण पर रोक लगाई जाए, लेकिन तत्कालीन तानाशाह परवेज मुशर्रफ ने उनकी एक नहीं सुनी और  अकबर बुगती के खिलाफ पाक सेना को ऑपरेशन करने का आदेश दिया।

बुगती को पकड़ने के लिए पाकिस्तानी सेना ने उनके घर पर हवाई हमले किए। बुगती अंडरग्राउंड हो गए। भयानक लड़ाई हुई। बुगती एक गुफा में छिपे हुए थे, जहां पाकिस्तानी सेना ने हेलीकॉप्टरों और भारी हथियारों का इस्तेमाल किया। गुफा ढहने से 26 अगस्त 2005 को नवाब अकबर खान बुगती आखिरकार मारे गए। बलूचिस्तान से करीब डेढ़ लाख लोग विस्थापित हो गए। इस सैन्य कार्रवाई को बलूच समुदाय ने एक सुनियोजित हत्या के रूप में देखा।

अकबर बुगती की हत्या ने बलूच आंदोलन को एक नए चरण में पहुंचा दिया और इसे और अधिक उग्र बना दिया। बुगती की हत्या के बाद बीएलए ने मजीद ब्रिगेड नामक एक आत्मघाती दस्ता बनाया, जो हाई-प्रोफाइल हमलों के लिए जिम्मेदार है।

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बुगती के बेटे जमील बुगती ने कहा कि उनके पिता की मौत ने बलूच महिलाओं को आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। महिलाएं अब बलूच आंदोलन की नई आवाज और चेहरा बनकर उभरी हैं।

कई बलोच राष्ट्रवादी और अलगाववादी समूह, जैसे बलोच लिबरेशन आर्मी (बीएलए), 2000 के दशक की शुरुआत से अधिक स्वायत्तता या यहां तक कि पाकिस्तान से स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं। बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए), बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ), बलूच रिपब्लिकन आर्मी (बीआरए) मुख्य बलोच समूह है। इन समूहों को अक्सर पाकिस्तान द्वारा आतंकवादी संगठन करार दिया जाता है, लेकिन वे खुद को स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं।

बलूच समुदाय का संघर्ष सगातार जारी है, जिसमें बुनियादी ढांचे, सुरक्षा बलों और विदेशी परियोजनाओं (जैसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा – सीपीईसी) पर हमले शामिल हैं। शांतिपूर्ण बलोच कार्यकर्ता भी अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं, लेकिन उन्हें अक्सर दमन कर दिया जाता है।

बलूचिस्तान में विद्रोह की स्थिति को देखते हुए ही सांसद मौलाना फजलुर रहमान ने लगभग तीन हफ्ते पहले कहा था कि बलूचिस्तान के पांच से सात जिले टूटकर स्वतंत्रता की घोषणा कर सकते हैं। उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध का जिक्र करते हुए चेतावनी दी थी कि वैसे हालात फिर से बन सकते हैं। उन्होंने पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में खुलासा किया कि अगर बलूचिस्तान के जिले स्वतंत्रता की घोषणा करते हैं तो यूएन उनकी स्वतंत्रता को मान्यता दे सकता है।

मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)

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