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नेपाल की ऐतिहासिक असफलताओं और कार्यकारी नेतृत्व का संबंध: एक विश्लेषण

 

काठमांडू: नेपाल के ऐतिहासिक असफलताओं के कारणों पर किए गए एक विश्लेषण में कार्यकारी नेतृत्व की भूमिका को प्रमुख माना गया है। कार्यकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों का जातीयता (ethnicity), लिंग (gender), भूगोल और आयु के आधार पर किया गया अध्ययन दर्शाता है कि देश की असफलताओं और पहाड़ी मूल के खस-आर्य पुरुषों के कार्यकारी नेतृत्व में रहने के बीच एक मजबूत संबंध (strong correlation) है।

इतना ही नहीं, जब इन नेताओं के पद ग्रहण करने की उम्र को देखा जाता है, तो युवा नेतृत्व का भी नेपाल की असफलताओं से गहरा संबंध पाया जाता है। नीचे कुछ प्रमुख कार्यकारी नेताओं के नाम और उनकी उम्र दी गई है जब उन्होंने पहली बार सत्ता संभाली थी:

  1. पृथ्वीनारायण शाह – 20 वर्ष
  2. भीमसेन थापा – 31 वर्ष
  3. जंग बहादुर राणा – 29 वर्ष
  4. राजा महेंद्र – 35 वर्ष
  5. बी. पी. कोइराला – 45 वर्ष
  6. डॉ. तुलसी गिरि – 37 वर्ष
  7. राजा वीरेन्द्र – 29 वर्ष
  8. सूर्य बहादुर थापा – 36 वर्ष
  9. कीर्ति निधि विष्ट – 44 वर्ष
  10. नागेंद्र प्रसाद रिजाल – 46 वर्ष
  11. मरिचमान श्रेष्ठ – 44 वर्ष
  12. कृष्ण प्रसाद भट्टराई – लगभग 60 वर्ष
  13. गिरिजा प्रसाद कोइराला – लगभग 60 वर्ष
  14. मनमोहन अधिकारी – लगभग 60 वर्ष
  15. के. पी. ओली – लगभग 60 वर्ष
  16. शेर बहादुर देउबा – 49 वर्ष
  17. प्रचंड, बाबुराम भट्टराई, माधव नेपाल और झलनाथ खनाल – 50 के मध्य से 60 के शुरुआती वर्ष
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इस सूची में मरीचमान श्रेष्ठ को छोड़कर सभी कार्यकारी प्रमुख पहाड़ी मूल के खस-आर्य पुरुष थे।

विश्लेषण के अनुसार, यह स्पष्ट होता है कि नेपाल की ऐतिहासिक असफलताओं और इस सामाजिक-राजनीतिक समूह के कार्यकारी नेतृत्व के बीच एक मजबूत संबंध है। साथ ही, युवा आयु में सत्ता ग्रहण करने वाले नेताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। अब सवाल यह उठता है कि क्या भविष्य में नेतृत्व के इस पैटर्न में बदलाव लाकर नेपाल को एक नई दिशा में ले जाया जा सकता है?

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(संकलन राकेश मिश्रा के स्टेटस से)

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