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सदन की राजनीति : उपसभामुख को हटाने की नई कोशिश

 

काठमांडू, २०८२ भदौ ४, बुधवार । नेपाल की सत्ता राजनीति एक बार फिर संवैधानिक परिषद् में बहुमत का गणित साधने और संसदीय भागबँडो को ध्यान में रखते हुए उपसभामुख इन्दिरा राना को पद से हटाने की ओर बढ़ रही है।

मंगलवार को कांग्रेस–एमाले गठबंधन ने अपने सांसदों से खाली कागज पर हस्ताक्षर करवाकर उपसभामुख राना के खिलाफ “पदअनुकूल आचरण न करने” का प्रस्ताव लाने की तैयारी की थी। लेकिन आवश्यक दो-तिहाई समर्थन न जुट पाने के कारण यह योजना असफल हो गई। खासकर कांग्रेस के डॉ. शेखर कोइराला गुट ने इस कदम का साथ नहीं दिया, जिससे प्रधानमंत्री केपी ओली और कांग्रेस अध्यक्ष शेरबहादुर देउवा को फिलहाल पीछे हटना पड़ा।

कांग्रेस–एमाले की रणनीति

  • सोमवार रात बालुवाटार में ओली–देउवा बैठक में सहमति बनी थी कि मंगलवार को ही हस्ताक्षर संकलित कर प्रस्ताव दर्ता किया जाएगा।
  • मंगलवार को दोनों दलों ने अपने संसदीय दल की बैठक बुलाकर सांसदों से हस्ताक्षर लिए।
  • लेकिन कोइराला गुट ने दूरी बनाई और उपसभामुख राना से सीधा संपर्क कर उन्हें आश्वासन दिया कि वे इस “दाउपेच” राजनीति का हिस्सा नहीं बनेंगे।
  • अब गठबंधन की योजना है कि अमेरिका यात्रा से लौटने के बाद ही राना के खिलाफ प्रस्ताव दर्ता किया जाए।
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संविधान के अनुच्छेद ९१(६)(ग) के अनुसार, यदि दो-तिहाई बहुमत से “पदअनुकूल आचरण न करने” का प्रस्ताव पारित होता है, तो सभामुख या उपसभामुख का पद रिक्त हो जाता है।

विपक्षी दलों का रुख

माओवादी समेत विपक्षी दलों ने इसे बहुमत के घमंड में किया गया कदम बताते हुए सरकार को अधिनायवादी प्रवृत्ति का आरोप लगाया।

  • विपक्षी बैठक ने कहा कि बिना ठोस कारण और प्रमाण के उपसभामुख को हटाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
  • विपक्ष ने इसे संवैधानिक संकट की ओर धकेलने वाली चाल बताया और सड़क से सदन तक विरोध का निर्णय लिया।

उपसभामुख इन्दिरा राना की प्रतिक्रिया

इन्दिरा राना ने सीधे सवाल उठाया –
“बहुमत के नाम पर किसी एक पद के लिए बार-बार चरित्र हत्या की जा सकती है?”

उन्होंने कहा कि 2023 में केवल अमेरिकी दूतावास से वीज़ा साक्षात्कार की तारीख आगे बढ़ाने का अनुरोध किया था, जिसे राजनीतिक षड्यंत्र के तहत बार-बार उछाला जा रहा है। राना का आरोप है कि यह सब संवैधानिक परिषद् में सत्ता पक्ष का वर्चस्व कायम करने की योजना का हिस्सा है।

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राजनीतिक विश्लेषण

विश्लेषक कृष्ण पोखरेल के अनुसार –

  • “संसद के सदस्यों से खाली कागज पर हस्ताक्षर करवाना लोकतंत्र का अपमान है।”
  • उन्होंने इसे संवैधानिक पदों पर कब्जा जमाने की मानसिकता और सत्ता-उन्माद की पराकाष्ठा बताया।
  • उनका कहना है कि संवैधानिक परिषद् में बहुमत न होने के कारण सत्ता पक्ष उपसभामुख को हटाकर अपने अनुकूल व्यक्ति लाना चाहता है।

मानव तस्करी प्रकरण और राजनीतिक दोहरापन

यहाँ यह तथ्य भी उभरकर आया कि:

  • कोशी प्रदेश के तत्कालीन कानून मंत्री एवं एमाले नेता लीलाबल्लभ अधिकारी जापान में मानव तस्करी मामले में गिरफ्तार हुए थे।
  • पुलिस रिपोर्ट में उनकी संलिप्तता स्पष्ट थी, लेकिन सत्ता के दबाव में उन पर मामला ही दर्ज नहीं किया गया।
  • वहीं, उनके साथ जापान जाने वाले तीन युवाओं को अब तक मुकदमा झेलना पड़ रहा है।
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यह दोहरा रवैया सत्ता पक्ष की “चयनात्मक न्याय” नीति को उजागर करता है।

उपसभामुख राना के खिलाफ कांग्रेस–एमाले का यह नया कदम केवल पद हटाने का मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक परिषद् के बहुमत का खेल है। विपक्ष इसे अधिनायकवाद की ओर बढ़ता कदम बता रहा है, जबकि राना खुद इसे बार-बार की गई राजनीतिक चरित्र हत्या मानती हैं।

नेपाल की संसद में यह tug of war लोकतंत्र को गहरी चुनौती की ओर धकेल रहा है।


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