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प्राध्यापक धरना का ६६वां दिन त्रि वि में पेंशन सुविधा का प्रश्न : संस्थागत न्याय, सम्मान और उत्तरदायित्व की आवश्यकता

 

नेपाल का त्रिभुवन विश्वविद्यालय केवल एक शैक्षिक संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र के बौद्धिक, सामाजिक और मानव संसाधन विकास का एक महत्वपूर्ण आधार स्तम्भ है। स्थापना काल से ही इस विश्वविद्यालय ने देश को योग्य शिक्षक, प्रशासक, वैज्ञानिक, शोधकर्ता तथा विभिन्न क्षेत्रों के कुशल जनशक्ति प्रदान की है। विश्वविद्यालय के प्राध्यापक और कर्मचारी दशकों तक समर्पण, निष्ठा और परिश्रम के साथ शिक्षा तथा ज्ञान-विस्तार के कार्य में संलग्न रहे हैं। ऐसे में सेवा निवृत्ति के पश्चात् उन्हें सम्मानजनक जीवनयापन के लिए पेंशन सुविधा उपलब्ध कराना केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि राज्य और संस्थान का नैतिक दायित्व भी है।

दुर्भाग्यवश, त्रिभुवन विश्वविद्यालय के अनेक प्राध्यापक एवं कर्मचारी 30 से 35 वर्षों अथवा उससे अधिक समय तक सेवा देने के बावजूद पेंशन सुविधा से वंचित हैं। यह स्थिति केवल आर्थिक असुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि श्रम के सम्मान, संस्थागत न्याय और समानता के सिद्धांत से जुड़ा गंभीर विषय है। एक ओर पूर्ववर्ती सेवाकाल में नियुक्त कर्मचारियों को पेंशन सुविधा प्राप्त है, वहीं दूसरी ओर समान प्रकार का कार्य और समान अवधि तक सेवा प्रदान करने वाले वर्तमान प्राध्यापक एवं कर्मचारी इस सुविधा से वंचित हैं। ऐसी व्यवस्था स्वाभाविक रूप से असमानता की भावना को जन्म देती है।

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उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत प्राध्यापक और कर्मचारी केवल वेतनभोगी कर्मचारी नहीं होते, बल्कि वे राष्ट्र के भावी नागरिकों के निर्माणकर्ता भी होते हैं। उनका जीवन शिक्षण, शोध और शैक्षिक वातावरण के विकास के लिए समर्पित रहता है। यदि ऐसे कर्मयोगियों को सेवा निवृत्ति के बाद आर्थिक सुरक्षा का भरोसा न मिले, तो इससे न केवल उनके मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए भी शिक्षा क्षेत्र का आकर्षण कम हो सकता है।

इस विषय में त्रिभुवन विश्वविद्यालय द्वारा गठित प्रो. डॉ. विनोद पराजुली आयोग की सिफारिशें विशेष महत्व रखती हैं। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दीर्घकालीन सेवा प्रदान करने वाले प्राध्यापकों एवं कर्मचारियों को पेंशन सुविधा उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया है। यह सिफारिश केवल आर्थिक पक्ष को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि संस्थागत न्याय और कर्मचारी कल्याण की व्यापक दृष्टि से प्रस्तुत की गई है।

उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी इस दिशा में पहल करते हुए विभिन्न निकायों से संकलित अंशदान को बढ़ाने तथा संचित निधियों के एक हिस्से को पेंशन कोष में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव रखा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विश्वविद्यालय स्वयं भी पेंशन व्यवस्था को व्यवहारिक रूप से लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही, केंद्रीय पेंशन कोष के लिए आवश्यक धनराशि एकत्रित करने की प्रक्रिया भी प्रारम्भ हो चुकी है। ऐसे में अब सबसे बड़ी आवश्यकता सरकार की स्पष्ट नीति, स्वीकृति और समयबद्ध निर्णय की है।

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पेंशन सुविधा के कार्यान्वयन में लगातार हो रही देरी अनेक प्रश्न खड़े करती है। यदि आवश्यक वित्तीय और प्रशासनिक आधार तैयार हो चुके हैं, तो फिर निर्णय प्रक्रिया में विलम्ब क्यों हो रहा है? यह देरी शिक्षण समुदाय में असंतोष और असुरक्षा की भावना को बढ़ावा देती है। विश्वविद्यालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में कार्यरत जनशक्ति के मनोबल को बनाए रखने के लिए इस विषय का शीघ्र समाधान अत्यंत आवश्यक है।

वास्तव में यह मुद्दा केवल पेंशन प्राप्ति का नहीं, बल्कि उन हजारों शिक्षकों और कर्मचारियों के सम्मान का है जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र की उच्च शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में समर्पित कर दिया। किसी भी सभ्य और उत्तरदायी राज्य की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सेवाकाल पूर्ण कर चुके नागरिकों को कितनी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। इसलिए त्रिभुवन विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों एवं कर्मचारियों को पेंशन सुविधा उपलब्ध कराना न्याय, समानता और उत्तरदायित्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

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आवश्यक है कि नेपाल सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन और संबंधित नीति-निर्माता इस विषय को प्राथमिकता दें। वर्ष 2068 के निर्णय की पुनर्समीक्षा, विश्वविद्यालय सभा से आवश्यक अनुमोदन तथा पेंशन कोष के लिए स्पष्ट वित्तीय नीति बनाकर इस लंबे समय से लंबित मांग का समाधान किया जाना चाहिए। इससे न केवल हजारों प्राध्यापकों और कर्मचारियों को सम्मानजनक भविष्य का भरोसा मिलेगा, बल्कि उच्च शिक्षा प्रणाली में विश्वास और प्रतिबद्धता भी सुदृढ़ होगी।

अंततः कहा जा सकता है कि पेंशन सुविधा किसी प्रकार का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि दीर्घकालीन सेवा और समर्पण का न्यायोचित प्रतिफल है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों और कर्मचारियों को यह अधिकार प्रदान करना राष्ट्र की शैक्षिक परंपरा, संस्थागत न्याय और मानवीय संवेदनशीलता के अनुरूप एक आवश्यक निर्णय होगा।

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