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जयप्रकाश आनन्द द्वारा नेपाल की राजनीति और न्याय व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न

 

काठमांडू, 23 जून।

कहा जाता है—”न मरी स्वर्ग दिखता है।”
अर्थात जब तक स्वयं उस स्थिति से नहीं गुजरते, तब तक उसकी पीड़ा और वास्तविकता का एहसास नहीं होता।

वरिष्ठ राजनीतिज्ञ एवं विश्लेषक जयप्रकाश आनन्द अपने विचारों में नेपाल की राजनीति और न्याय व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं। उनका कहना है कि नेपाल में भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों और अख्तियार जैसी संस्थाओं का उपयोग कई बार निष्पक्ष न्याय के बजाय चयनात्मक कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिशोध के औजार के रूप में होता आया है।

वे याद दिलाते हैं कि अलग-अलग समय में सत्ता में रहे दलों ने अपने राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध कठोर कानून बनाए और उनका समर्थन किया। गिरफ्तारी पहले, जाँच बाद में—और महीनों तक हिरासत में रखने की व्यवस्था भी उसी राजनीतिक सोच की उपज रही है।

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वे एक पुराने प्रसंग का उल्लेख करते हैं, जब शाही शासन के दौरान विशेष अदालत में यहाँ तक कहा गया कि भ्रष्टाचार के मुकदमे “राजा की इच्छा” के अनुसार चल रहे हैं। उनका संकेत यह है कि यदि न्याय व्यवस्था पर सत्ता का प्रभाव हो जाए, तो कानून का उद्देश्य न्याय नहीं, बल्कि प्रतिशोध बन जाता है।

जयप्रकाश आनन्द यह भी प्रश्न उठाते हैं कि नेपाल में भ्रष्टाचार के मामलों में आजीवन राजनीति से प्रतिबंध जैसी कठोर व्यवस्थाएँ किन राजनीतिक परिस्थितियों में बनाई गईं। उनका तर्क है कि इन कानूनों को बनाने में नेपाली कांग्रेस, एमाले और माओवादी—सभी दल किसी न किसी समय सहभागी रहे।

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वे वर्तमान राजनीति की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि जब सत्ता बदलती है, तो वही दल अपने हित के अनुसार कानूनों में संशोधन भी कर देते हैं। अर्थात सत्ता में रहते हुए जो कानून उचित लगते हैं, विपक्ष में पहुँचते ही वही अन्यायपूर्ण प्रतीत होने लगते हैं।

उनका निष्कर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है—कानून किसी व्यक्ति, दल या सत्ता के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए बनना चाहिए। कानून प्रतिशोध का नहीं, न्याय का माध्यम होना चाहिए।

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अंत में वे एक मार्मिक और व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हैं—यदि इस प्रश्न का उत्तर चाहिए कि सत्ता और न्याय का यह संबंध कब बदलेगा, तो उनके शब्दों में, (जवाफ चाहिए, टंगाल—रामशाह पथ तिर गाडिएर रहेको मेरो चिहान छेउ आउनु होला। शायद वहीं इसका उत्तर मिलेगा।”

यह केवल एक व्यक्ति की टिप्पणी नहीं, बल्कि लोकतंत्र, कानून के शासन और राजनीतिक नैतिकता पर गंभीर विमर्श का विषय है। चाहे कोई भी दल सत्ता में हो, न्याय तभी सार्थक होगा जब कानून सबके लिए समान रूप से लागू हो और उसका उपयोग प्रतिशोध के लिए नहीं, बल्कि निष्पक्ष न्याय के लिए किया जाए।

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