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अभिमान नहीं, विनम्रता ही मनुष्य की सच्ची पहचान है : बिमल सरार्फ

 

बिमल सरार्फ, रक्सौल, 27 अगस्त 2026 । मनुष्य के जीवन में अच्छाई सबसे बड़ी संपत्ति है, लेकिन जब अच्छाई के साथ अभिमान जुड़ जाता है, तो वही अच्छाई धीरे-धीरे बुराई का कारण बनने लगती है। इसलिए केवल अच्छा बनना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि अपनी अच्छाई के प्रति विनम्र बने रहना भी जरूरी है। जो व्यक्ति अच्छा बनना नहीं चाहता, लेकिन अच्छा कहलाना चाहता है, वह स्वयं को धोखा देता है। वहीं, जो थोड़ी-सी अच्छाई करके उसका अहंकार करने लगता है, वह भी अपने लिए अनेक परेशानियां खड़ी कर लेता है।

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मनुष्य को जीवन के हर क्षेत्र में बेहतर बनने का निरंतर प्रयास करना चाहिए, लेकिन अपनी अच्छाई का घमंड नहीं करना चाहिए। घमंड आते ही मनुष्य के व्यवहार में दूसरों को छोटा समझने, अपमान करने और तिरस्कार करने जैसी प्रवृत्तियां जन्म लेने लगती हैं। इससे रिश्तों में दूरी, समाज में तनाव और मन में द्वेष बढ़ता है।

मन एक विशाल सरोवर के समान है और हमारी इच्छाएं, भावनाएं तथा विचार उसकी लहरें हैं। यदि मन की इन वृत्तियों को सही दिशा और अच्छे उद्देश्य से जोड़ा जाए, तो मनुष्य अपने विचारों और व्यवहार पर नियंत्रण पा सकता है। इसके विपरीत, जब मन अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मक विचारों से भर जाता है, तो जीवन की शांति धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।

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मन की अशांति का बड़ा कारण स्वयं के भीतर की कमजोरी और अपनी वास्तविक शक्ति को न पहचान पाना है। इसलिए अभिमान करना व्यर्थ है। इसके स्थान पर स्वाभिमान, कर्मठता और विनम्रता को जीवन का आधार बनाना चाहिए। स्वाभिमान मनुष्य को आत्मविश्वास देता है, कर्मठता उसे आगे बढ़ाती है और विनम्रता उसे दूसरों के सम्मान का महत्व सिखाती है।

जिस दिन मनुष्य अपने मन की अंतरंग भावनाओं और प्रवृत्तियों को समझना सीख जाएगा, उस दिन उसके जीवन की दिशा भी स्पष्ट होने लगेगी। वह दूसरों से प्रतिस्पर्धा और तुलना करने के बजाय अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करेगा और बिना किसी अहंकार के निरंतर आगे बढ़ता रहेगा।

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सच्ची महानता दूसरों को छोटा दिखाने में नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर बनाने में है। मनुष्य जितना विनम्र होता है, उतना ही उसके व्यक्तित्व का वास्तविक कद ऊंचा होता है।

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