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घूघंट बुरा नहीं है इसे देखने की नजरिया बुरा है : बिम्मी शर्मा

 

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बिम्मी शर्मा, बीरगंज ,२२ नवम्बर |“घूघंट का पट खोल रे तुझे श्याम मिलेगें । ” इस मशहूर भजन की तरह हम सभी ने चेहरे का घूघंट तो हटा लिया पर मन में लगा हुआ अंधविश्वास का शताब्दियों पुराना घूघंट नहीं हटा सके । देश की प्रधान न्यायाधीश के दिमाग में भी घूघंट है इसी लिए वह मधेश की महिलाओं का घूघंट करना भी पिछड़ापन मानती है । वह शायद यह भूल गई हैं कि घूघंट करना एक संस्कार और तहजीव भी है ।

जब भी तराई या मधेश की चर्चा होती है तब यहां की सारी अच्छी बातें भूल कर बस घूघंट, दहेज और गंदगी को ही ध्यान में रखा जाता है । अनाज और सब्जी के लिए प्रसिद्ध मधेश की उपजाऊ भूमि जो पहाड़ियों के पेट में जा कर डकार मारती है उसे सब भूल जाते हैं । बस याद रह जाता है तो घूघंट । घूघंट की ओट में एक नयीं नवेली दूल्हन या औरत का चेहरा जितना सुंदर और सुसंस्कृत लगता है उतना बिना घूघंट की पहाड़ी औरत नहीं लगती है ? घूघंट मधेश की शर्म और हया है

प्रधान न्यायाधीश एक औरत है पर वह औरत होने का महत्व ही भूल गई है । मधेश में घूघंट नहीं यहाँ की अशिक्षा और अन्धबिश्वास ज्यादा दोषी है जो एक औरत को आगे बढ़ने नहीं देता । जादू, टोना और एक अकेली और बूढ़ी औरत को घर और गाँव से निकाल दिया जाता है । इस के विरुद्ध में कड़ा कानून बनाने की दिशा में प्रधान न्यायाधीश कोई पहल नहीं करती । पर उन्हे सारा दोष घूघंट में ही नजर आता है । कम उम्र की लड़किया और औरत बलात्कार की शिकार होती है । इस के खिलाफ बोलने या कड़े कानून बनाने की कोई चिंता नहीं है इन्हें बस घूघंट की पीड़ा है ।

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जब भारत मे मुगलों का शासन था तब काफिरों से बचने के लिए उस समय के लिहाज से औरतों के लिए घूघंट ओढ़ना जरुरी समझा गया था । ताकि किसी भी औरत को कोई बुरी नजर से न देखें । औरतों के शरीर से छेड़खानी या उन्हे अपराध से बचाने के लिए बूर्का या घूंघट का प्रचलन लाया गया । बाद में जब भारत में अग्रेंजो ने शासन किया उस समय भी औरतों को अग्रेंजो के उत्पीड़न से बचाने के लिए घूघंट या बूर्के को जरुरी समझा गया । आज भी शादीशुदा औरत मन्दिर में भगवान के सामने माथा टेकते समय या अपने से बड़ों के सामने जाते समय शीष नवाते हुए उनके सामने घूघंट या आंचल का परदा करती है । यह मधेश की तहजीब है जिसे नकारना या बुरा कहना वहां कि संस्कृति को नकारना है । हरेक धर्म या संस्कृति की अच्छी बातों का अनुशरण करना चाहिए ।

पर हमारे देश की प्रधान न्यायाधीश यह बात समझें तब न ? उन्हे तो बस घूघंट में विकृति ही दिखाई देती है । पुरुष भी तो टोपी पहनते हैं या गर्मी में धूप से बचने के लिए सिर में गमछा या अंगोछा रखते हैं । तो क्या इसमें भी बुराई है ? किसी जाति विशेष की पहचान को गलत मोड़ देना या उसको गलत तरीके से व्याख्या करना बिल्कूल गलत है । प्रधान न्यायाधीश ने देखा तो बस उस घूघंट को । पर उस घूघंट के अंदर से झांक कर कोई अपनी आपबीती बताना चाह रही होगी ? इसे तो बिल्कूल नजरअंदाज कर दिया । क्या घूघंट करने से मधेश की औरते पिछडी हुई है तो घूंघट न करने वाली सभी औरतें माडर्न है और उनके साथ कोई अपराध नहीं होता ? क्या घूघंट औरत के आधुनिक होने या न होने का कोई तराजु है ? जिसमें रख कर हर औरत को तौला जाना चाहिए ?

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और पहाड़ की औरतें जो घूघंट नहीं करती पर सिर मे मझेत्रो (स्कार्फ) तो पहनती है न ? नेपाल पश्चिमी पहाड़ी भेग में अभी भी औरतों को माहवारी होने पर गाय के गोठ में तीन दिनों तक रखा जाता है । जिसे यहां के स्थानीय भाषा में छाउपडी प्रथा कहा जाता है । गाय के गोठ जैसी गंदी जगह मे सोने के कारण कितनी बार औरतें बीमार पड़ती हैं या कभी कभार मर भी जाती है । पर इस तरह की दकियानुसी सोच या अंधबिश्वास को हटाने के लिए पहल करने या कानून बनाने की ओर प्रधान न्यायाधीश का ध्यान क्यों नहीं जाता । हद है उनकी सोच अभी भी घूंघट में ही अट्की हुई है ।

क्या घूघंट करने वाली सभी औरते जाहिल है ? भारत की पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी हो या पाकिस्तान की बेनजीर भुट्टो और बांगलादेश की शेख हसीना । यह सभी घूघंट या सिर में आंचल करती थी । तो क्या यह सब किसी पुरुष नेता या दूसरी घूघंट न करने वाली महिलाओं से कमतर थी ? दोष घूघंट में नहीं आपकी सोच में है । नयां जुत्ता या चप्पल पहनने से पैर में काट्ता है और घाव होता है । तो क्या लोग जुत्ता चप्पल पहनना छोड़ देगें या अपना पैर ही काट लेगें ?

वैसे भी मधेश से घूघंट का प्रचलन पहले से काफी कम हो गया है । घर के मर्द या पति के वैदेशिक रोजगारी में जाने से सारी जिम्मेदारी औरतों के कंधे पर आ गयी है । जिसके कारण औरतें अब पहले की तुलना में कम घूघंट करती है । घूघंट ओढ्ना या आंचल करना पिछडेपन की निशानी नहीं । यह औरतों की सलज्जता का प्रतीक है । यही औरत अपने परिवार और मधेश का मान रख रही है । मधेश की संस्कृति या चित्र की जब भी कोई कल्पना करता है उसमें घूघंट की ओट में हंस रही औरत का ही बिम्ब उभरता है । घूघंट की ओट में मधेश अभी भी अपना बहुत कुछ बचा कर और समेट कर चल रहा है ।

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मधेश छठ या होली जैसे त्यौहारों मे खुद को जीवंत करता है और इसको जीवतंता देती हैं यहां की औरतें । जो शिक्षित या अशिक्षित कोई भी हो अपने पहनावे और ओढ़ावे से मधेश की पहचान को एक आकार देती है । यदि मधेश कि औरतें भी स्कर्ट पहनने लग जाए तो उनमें और अग्रेंजो में फर्क ही क्या रह जाएगा ? उनके इसी तहजीब को देखने के लिए ही तो देश, विदेश से लोग आते है । आखिर में कोई भी धर्म हो किसी भी जात की लडकियों का शादी हो रही हो । पर उनमें एक बात साझा होती है । शादी में सभी धर्म और जात की दूल्हन घूघंट करती ही है । चाहे वह पहाडी, हिमाली, मधेशी, मुस्लिम, सिख या ईसाई धर्म में की जा रही शादी ही क्यों न हो । घूघंट बुरा नहीं है इस को किस तरह से देखा और लिया जाता है वह नजरिया बुरा है । (व्यग्ंय )

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