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पर्यटन :पोखरा यात्रा

 

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प्रकाशप्रसाद उपाध्याय
भारत प्रवास काल में पर्यटकीय महत्व के विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के स्थलों की यात्रा के कारण पर्यटन के प्रति जो रुचि उत्पन्न हुई थी, वह स्वदेश लौटने पर भी मिट नही पाई । इसके प्रमुख कारण थे –हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाएँ, हरी–भरी पहाड़ियाँ, उनके ऊपर उमड़ते–घुमड़ते काले और सफेद बादलों के द्वारा उत्पन्न मनमोहक दृश्य, पहाड़ों से गिरते जलप्रपात, तीव्र गति से बहती नदियाँ और कलापूर्ण देवालयों से भरे सुंदर नेपाल को निकट से अनुभव करने की चाह ।

मनमोहती प्रातःकालीन शीतल हवा मे सैर करते हुए जब दृष्टि सूर्य के किरणों से चमकती हिमश्रृंखलाओं पर या सूर्य की किरणों की छाया से गहरा हरा नीला रंग पाता हुआ पहाड़ पर पड़ती तो लगता कि घर लौटे बिना ही वहाँ पहुँचा जाय और निहारा जाय उस अलौकिक सुंदरता को सन्निकट होकर । इसी सोच ने एक बार मुझे एक बार पड़ोस के नुवाकोट जिले के उस रमणीय स्थल की यात्रा कराई जो त्रिशूली बजार के नाम से जानी जाती है तो दूसरी बार गोरखा जिले के उस ऐतिहासिक भूमि की यात्रा कराई जहाँ नेपाल के राष्ट्रनिर्माता पृथ्वीनारायण शाह का साततल्ले दरबार विद्यमान है । लेकिन हिमाच्छादित पर्वतों की सुंदरता को निहारने की मेरी चाह जब इन दो यात्राओं से भी पूरी नही हुई तो पर्यटक के रुप में राजधानी के निकट और दूर के उन स्थलों की यात्रा में निकलने की धुन बनी रही जिसका संबंध इतिहास और धर्म से रहा हो पर जहाँ पहुँचकर पर्वतमालाओं को भी निकट से देखने का अवसर मिले ।
इस क्रम में मेरी यात्रा का केंद्र कभी पोखरा बना तो कभी दोलखा तो कभी मुक्तिनाथ । राजधानी काठमांडू से लगभग 200 किलोमिटर दूर अवस्थित पोखरा के लिए मैने एक माइक्रो बस पकड़ी और मार्ग में चाय एवं भोजन के लिए रुकते और बाहर से ही प्रसिद्घ मनकामना मन्दिर मे स्थापित देवी भगवती के प्रति नतमस्तक होते हुए लगभग 4 घंटे की यात्रा पूरी करने के बाद पोखरा पहुँचा । सड़क मार्ग के अलावा पोखरा के लिए विमान यात्रा की भी सुविधा है, पर मैंने राह की प्राकृतिक सुंदरता एवं भौगोलिक स्वरूप को देखने की नीयत से माइक्रोबस ही पकड़ना उपयुक्त समझा, यद्यपि विमान के द्वारा हम काठमांडू से लगभग आधे घंटे में ही पोखरा विमान स्थल पर अवतरण कर सकते हैं । पोखरा के लेखनाथ महानगर पालिका क्षेत्र में प्रवेश करने से पूर्व ही अन्नपूर्ण हिमाल की पर्वतश्रृंखलाओं का चित्ताकर्षक रूप देखने को मिला । समुद्री सतह से 827मीटर की उँचाई पर अवस्थित पोखरा में रुकने के लिए कई छोटे–बड़े होटल हैं । अतः एक होटल में पहुँचा, जो झील के पास ही था । सुंदर और साफ होने पर भी वह अधिक मंहगा नही था । झील के पास कई छोटे–बड़े होटलें हैं, जो लेकसाइड होटल के नाम से जाने जाते हैं । यह मेरी दूसरी पोखरा यात्रा थी ।

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पहली यात्रा मैने सन् 1977 की थी, अपनी ड्यूटी के सिलसिले में । दो दिन की वह संक्षिप्त यात्रा सरकारी ड्यूटी पूरी करने में ही बीत गई । चूँकि कार्यसंपादन के लिए उतना ही समय निर्धारित की गई थी, अतः सरकारी कार्यतालिका के अनुसार वहाँ अधिक रुकना संभव नही था । फलस्वरुप वहाँ के पर्यटकीय महत्व के स्थलों को विस्तृत रूप से नही देख सका । उस वक्त मैं पेंशन कैंप के पास एक होटल में रुका था । उस कमरे में एक दूसरे यात्री भी ठहरे थे, जो पूर्व गोरखा सैनिक अधिकारी थे । उन्होंने जब खिड़की से प्रातःकालीन सूर्य की किरणों से माछापुच्छ्रे पहाड़ को चमकते देखा तो अपने एक मुलाकाती मित्र से चिल्लाकर कहने लगे– ‘अरे भाई, पहले इस खिड़की को बंद करो, नही तो इस चमक से आँखें खराब हो जाएँगी । ’ उनकी बातें कान में पड़ते ही मेरी नजर खिड़की पर पहुँची । एक स्वर्ण पिण्ड को चमकता पाकर मैं विस्मित हो उठा । उस मनमोहक स्वर्णपिण्ड के बारे में पूछने पर पता चला कि वह तो माछापुच्छ्रे का शिखर है, जो सूर्य की किरणों के कारण जगमगा उठा था । आज भी माछापुच्छे्र का वह अलौकिक दृश्य मेरी आँखों के सामने आता रहता है पर इस दूसरी यात्रा काल में उस दृश्य का साक्षात्कार नही हो पाया । क्योंकि इस यात्रा काल में मैं लेकसाइड के एक होटल में रुका था । उस होटल में रुकने का मेरा एक मुख्य उद्येश्य यह था कि इसके निकट ही कई दर्शनीय स्थल हैं, जहाँ पैदल भी जाया जा सकता है । इस पर्वत का नाम माछापुच्छे्र (मछली की पूँछ) इसलिए पड़ा कि इसका शिखर मछली की पूँछ के समान दिखता है ।maxresdefault flights-on-ultralights
पोखरा का दूसरा दर्शनीय स्थल है डेवीज फॉल्स Devi’s fall । हालाँकि इसके पीछे एक दुःखभरी कहानी है । यह प्रकृतिनिर्मित एक ऐसा गहरा चट्टानी गड्ढा है जहाँ पानी की धारा बहती रहती है । एक बार एक विदेशी पर्यटक महिला स्नान करते हुए पैर फिसलने के कारण इसके पानी की तेज धार में बह गई थी । अतः इस स्थल का नाम डेवि फाल्स रखा गया, पर इस दुर्घटना के कारण आम भाषा में इसे डेविल्स फॉल के नाम से पुकारा जाता है । लगभग 100मिटर   गहरी इस स्थल को देखकर, जहाँ बड़े–बड़े चट्टानों के बीच पानी की कलकल करती धारा बहती दिखाई देती है, पर्यटकों का दिल दहल जाता है । पर्यटकों को संभावित दुर्घटना से बचाने के लिए इस स्थल को लोहे के बाड़ों से घेर दिया गया है और नीचे जाना वर्जित है ।
पोखरा का एक प्रसिद्घ चौराहा पृथ्वीचोक से शहर घूमने के लिए बसें मिलती हैं । इससे लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर एक ऐसी ही भयावह खाई है जोे सेती जोर्ज के नाम से जानी जाती है । भूतल पर पड़ी यह दरार (Gorge) लगभग 200 मिटर   गहरी है । ऊपर से नीचे गहरी खाई को झाँकने पर यहाँ बहती जलधारा तो दिखाई नही देती पर कान लगाकर सुनने पर पानी बहने की आवाज पर्यटकों को अचंभित कर देती है । जब मैं पहली बार इस स्थल पर पहुँचा तब वहाँ शुल्क देना नही पड़ा पर अब मामूली शुल्क देकर इस स्थल पर जाया जा सकता है ।
पोखरा तालों की नगरी के रूप मे भी प्रसिद्घ है । यहाँ लगभग ९झीलें हैं, पर यह मुख्यतः सात तालों की नगरी के रूप में जानी जाती है । इन सात तालों में भी प्रसिद्घ हैं– फेवाताल और बेगनास ताल, जहाँ नौकाटन की व्यवस्था है । फेवाताल वेगनास ताल से बड़ा है । पोखरा को नैसर्गिक सुंदरता प्रदान करने में फेवा की प्रमुख भूमिका है । इसके शांत जल में जब माछापुच्छ्रे पहाड़ की प्रतिच्छाया पड़ती है तब यह एक अद्भूत दृश्य प्रस्तुत करता है, जिसे अपने कैमरे में बंद करने के लिए विदेशी पर्यटक लालायित हो उठते हैं । इसी ताल के अंदर अवस्थित है वाराही मंदिर, जो ताल वाराही मंदिर के नाम से प्रसिद्घ है और जहाँ जाने के लिए फेवाताल से नौका की यात्रा करनी पड़ती है । वेगनास ताल काठमांडू से पोखरा में प्रवेश करने वाले यात्रियों के लिए मार्ग में ही पड़ता है । अतः यदि आप प्राइवेट गाड़ी से यात्रा कर रहे हैं तो गाड़ी को वहीं रुकवाकर ताल की सुंदरता को निहार सकते हंै ।

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नौकाटन की चाह रखने वाले अपनी इच्छा भी पूरी कर समय का सदुपयोग कर सकते हैं । चूँकि मै माइक्रोबस से यात्रा कर रहा था, अतः मुझे यहाँ आने के लिए पृथ्वी चोक से टैक्सी लेनी पड़ी । क्योंकि यहाँ बस रुकती नही है । पृथ्वी चोक से 4 कि.मी. की इस यात्रा काल में भी मुझे आसमान स्वच्छ होने के कारण अन्नपूर्ण हिमाल की सुंदरता निहारने का अवसर मिला ।
पर्यटकों के लिए अपनी पोखरा यात्रा को स्मरणीय बनाने के कई साधन हैं । इनमें प्रमुख है–पैराग्लाइडिंग । खुले आकाश में पैराग्लाइडिंग करने वाले साहसिक पर्यटकों को उड़ान भरते देखकर जहाँ दर्शकगण मंत्रमुग्ध हो उठते हैं, वहीं इस साहसिक कार्य में संलग्न व्यक्ति आकाश लोक से नीचे की हरियाली, जलाशयों और दूरदराज की पर्वतश्रृंखलाओं को देखकर रोमांचित होता रहता है ।
विभिन्न धर्मों को मानने वालों के लिए भी यहाँ अपनी आस्था के स्थल हैं । पोखरा में मैं 3रात और 2दिन  रुका । इस यात्रा काल में एक दिन प्रातः मैंने विन्ध्यवासिनी मन्दिर की यात्रा की, जो पृथ्वी चोक से लगभग 14कि .मी. की दूरी पर होगी । इस प्रसिद्घ मन्दिर के संबंध में कहा जाता है कि इस देवी की मूर्ति को तत्कालीन राजा के आदेश के अनुसार कास्कीकोट नामक स्थान पर स्थापित करने के लिए विन्ध्याचल से लाया जा रहा था । लाते समय इसे पोखरा पर विश्राम के लिए रखा गया । पर जब मूर्ति को वहाँ से ले जाने का समय आया तो भक्तजनों को उसे वहाँ से उठाना संभव नही हुआ और अंततः मूर्ति को कास्की जिले अधीन के उसी स्थल पर स्थापित कर दिया गया, जहाँ उसे विश्राम के लिए रखा गया था ।
मन्दिर में प्रालःकाल भक्तजनों की भीड़ को देखकर देवी विन्ध्यवासिनी की महिमा का आभास होने लगा । यह भी कहा जाता है कि इस मन्दिर की यात्रा करने वाले भक्तजनों की अभिलाषा माँ विन्ध्यवासिनी पूरा कर देती हैं । नवरात्र के अवसर पर अड़ोस–पड़ोस से अनेक भक्तजन माता विन्ध्यवासिनी की पूजा आराधना करने और मन्नत मागने आते हैं । यहाँ का दूसरा प्रसिद्ध पावन स्थल है– भद्रकाली मन्दिर । यहाँ भी प्रत्येक दिन प्रातः भक्तजनों की अपार भीड़ होती है । इसके अलावा यहाँ उपनयन और शादी की रस्में भी पूरी की जाती है । इन मन्दिरों के अतिरिक्त यहाँ बौद्धधर्मावलम्बियों के लिए विश्व शान्ति स्तूप और माटेपानी मोनास्ट्री है तो इस्लाम धर्मावलंब्यिों के लिए जामे मस्जिद और इसाईयों के लिए रामघाट चर्च हैं । नेपाल में शनिवार के दिन साप्ताहिक अवकाश होता है, अतःउस दिन वहाँ सामूहिक प्रार्थना का कार्यक्रम होता है ।

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इनके अलावा पोखरा के आकर्षक और दर्शनीय स्थलों मे महेन्द्र और गुप्तेश्वर गुफाएँ हैं, जो पृथ्वी चोक से 4-7 कि .मी. की दूरी पर अवस्थित हैं । पर मैं अत्यधिक थकान के कारण इन स्थलों पर जा नही पाया, क्योंकि गुफा के अंदर भी चलना पड़ता । अतः इसे भविष्य की संभाव्य यात्रा के लिए स्थगित करते हुए मैं एक सामान्य बस से राजधानी लौट आया ।
काठमांडू आने वाले पर्यटकों के लिए पोखरा मुक्तिनाथ यात्रा का प्रवेश द्वार भी है । इस संबंध में अपना अनुभव आगामी अंक में प्रस्तुत करने की कोशिश करुँगा । –क्रमशः)
संदर्भ सामग्रीः–
मेरी अप्रकाशित कृति–‘अल इण्डिया रेडियोबाट अवकाशप्राप्ति पछिको पहिलो दशक’
अन्नपूर्ण पोष्ट राष्ट्रीय दैनिक
नेपाली वृहत् शब्दकोश

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