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बस्ते के बोझ तले, घुटता बचपन .

 

गंगेश मिश्र

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यूँ ही अचानक से, मन में आया; आज हम ही बस्ता लेकर चलते हैं। बाप रे ! इतना भारी, कैसे लेकर चलता होगा; साहित्य। यह अकेले साहित्य की बात नहीं है; ऐसे लाखों बच्चे अपनी पीठ पर बोझा लादे सुबह घर से निकलते हैं। किताब, कापियों के साथ ही साथ; माँ-बाप के उम्मीदों को भी ढोते हैं। सरकारें कहतीं है, बचपन बचाओ; बस्ते का बोझ कम कराओ; किन्तु बोझ बढ़ता ही जा रहा है। बस्ते के बोझ तले, बचपन का दम घुट रहा है।
यह घोड़दौड़ है, बच्चे को हमने ” रेस का घोड़ा ” बना दिया है; हमें रैंक चाहिए, न हम चैन से जीते हैं, न ही बच्चे को चैन से जीने देते हैं।
” पढ़ोगे- लिखोगे, होगे नवाब;
खेलोगे-कूदोगे होगे ख़राब।”
नवाब, राजकुमार बनते नहीं हैं;  बनाए भी नहीं जा सकते, ये तो पैदायशी होते हैं। पढ़कर नवाब या राजकुमार कोई नहीं बनता, हाँ ! हम दबाव अवश्य बनाते रहते  हैं;  अपने बच्चों पर और बचपन को कुचल कर रख देते हैं। खेलना-कूदना भी बच्चे का नैसर्गिक अधिकार है, शिक्षा के समान ही; किन्तु बच्चा खेलता है, तो भी काफ़ी दबाव में; क्योंकि उस पर नवाब बनने का दबाव पड़ रहा होता है, जो हमने उस पर डाला हुआ होता है।बच्चे का शोषण होता है घर में, फ़िर स्कूल में। खेलने के लिए मँहगे खिलौने नहीं, खुला आकाश चाहिए; उड़ान भरने के लिए; जो हम नहीं दे पाते।
शिक्षा जरूरी है, जीवन के लिए और इससे समझौता नहीं होना चाहिए, अवसर तो सबको मिलना चाहिए; किन्तु अवसर ! बोझ नहीं।
क्या पढ़ाते हैं, स्कूल वाले ? पाँच किताबें काफ़ी थीं; दो या तीन भाषा की, एक गणित और एक विज्ञान की। परन्तु, भारी मूल्य-सूची वाली किताबें और दश- पन्द्रह कापियों का बोझ लाद दिया जाता है। अभिभावकों के ” सर ” पर और बच्चों के ” कंधे ” पर।
शिक्षा का, इस क़दर व्यवसायीकरण हो गया है कि जिसे देखो स्कूल खोलने पर तुला है। भारी भरकम वेतन उठाने वाले, जो अपने कर्तव्य का पालन सरकारी स्कूलों में नहीं करते। वही  सरकारी स्कूल के अध्यापकगण, अपने बच्चों को उन्नत शिक्षा दिलाने के भ्रम में; इन्हीं प्राइवेट स्कूलों में भेजते हैं; जो भारी बोझा वाला बस्ता बेचते हैं।
हार्दिक अनुरोध है, उन माँ-बाप से; कृपा करें अपने बच्चों पर।उनके बचपन को बस्ते के बोझ तले मत कुचलें।

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