Sun. May 24th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

प्रधानमंत्री के तेवर और नजरअंदाज करने की शैली से प्रश्नों का उठना लाजमी

 

काठमान्डू


जनता ने बड़ी ही उम्मीद के साथ अपने लिए प्रधानमंत्री को चुना था । किन्तु उसी प्रधानमंत्री बालेन शाह की असामान्य कार्यशैली को लेकर चौतरफा आलोचना हो रही है । हम सभी जानते हैं कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को संसद के प्रति जवाबदेह होना चाहिए, लेकिन उनकी गतिविधियों के कारण संसद की गरिमा कमजोर होने की चिंता भी व्यक्त की जाने लगी है ।
सरकार गठन के डेढ़ महीने में प्रतिनिधि सभा के दो अधिवेशन हुए, लेकिन प्रधानमंत्री शाह ने एक बार भी सदन को संबोधित नहीं किया । प्रतिनिधि सभा चुनाव के बाद १९ चैत को हुई पहली संसद बैठक में नव–नियुक्त प्रधानमंत्री शाह द्वारा संबोधन न दिए जाने पर राजनीतिक हलकों, संसदीय परंपरा के जानकारों और आम जनता ने भी आश्चर्य व्यक्त किया था । राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल सोमवार को संघीय संसद की संयुक्त बैठक में आगामी आर्थिक वर्ष की नीति तथा कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे थे, तभी प्रधानमंत्री शाह ने और भी असामान्य व्यवहार दिखाया ।
राष्ट्रपति द्वारा नीति तथा कार्यक्रम पढ़ना शुरू किए जाने के लगभग ५० मिनट बाद प्रधानमंत्री बैठक छोड़कर बाहर चले गए । कार्यक्रम वाचन के बाद राष्ट्रपति को विदाई देने के समय भी वे उपस्थित नहीं थे । प्रतिनिधि सभा में राष्ट्रपति के प्रति धन्यवाद प्रस्ताव पेश करते समय भी प्रधानमंत्री शाह ने कोई वक्तव्य नहीं दिया । राष्ट्रपति के भाषण के दौरान वे बैठक से क्यों बाहर गए, इस बारे में सरकार या उनके सचिवालय की ओर से कोई कारण सार्वजनिक नहीं किया गया ।
संसदीय परंपरा और प्रतिनिधि सभा नियमावली के अनुसार नीति तथा कार्यक्रम पर चर्चा के दौरान उठे प्रश्नों का उत्तर प्रधानमंत्री द्वारा दिए जाने की व्यवस्था है । इसी कारण सांसदों ने अनुमान लगाया था कि बुधवार को प्रधानमंत्री शाह संसद में संबोधन देंगे । प्रधानमंत्री शाह के निकट माने जाने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘रुटिन अफ नेपाल बन्द’ ने भी बुधवार सुबह सूचना दी थी कि प्रधानमंत्री नीति तथा कार्यक्रम पर उठे प्रश्नों का उत्तर देंगे ।
प्रधानमंत्री सुबह ९ बजे से पहले ही सिंहदरबार स्थित कार्यालय पहुँच गए थे । उन्होंने ११ बजे मंत्रिपरिषद् बैठक भी बुलाई थी । बैठक समाप्त होने के बाद भी वे प्रधानमंत्री कार्यालय में विभिन्न बैठकों में शामिल रहे । उनका सरकारी वाहन दिनभर प्रधानमंत्री कार्यालय में ही था, लेकिन वे संसद भवन नहीं गए । उन्होंने संसद में प्रस्ताव पेश करने और जवाब देने की जिम्मेदारी वित्तमंत्री स्वर्णिम वागले को सौंपी थी । इसकी लिखित जानकारी सभामुख के माध्यम से संसद को भेजी गई थी ।
बुधवार की बैठक में जैसे ही नीति तथा कार्यक्रम पर बहस शुरू करने का कार्यसूची आया, विपक्ष के सांसदों ने खड़े होकर विरोध जताया । उनका कहना था कि सरकार की नीति तथा कार्यक्रम पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री की उपस्थिति अनिवार्य होनी चाहिए और सांसदों के प्रश्नों का उत्तर भी वही दें ।
विपक्षी दलों ने सभामुख डीपी अर्याल से प्रधानमंत्री को सदन में उपस्थित होने का निर्देश देने की मांग की । रास्वपा के अन्य सांसदों ने भी प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति का बचाव किया । सांसद रन्जु दर्शना ने कहा कि प्रधानमंत्री ने नियमावली के भीतर रहकर ही कार्य किया है । वहीं सांसद राजीव खत्री ने कहा कि पुराने राजनीतिक दल संसद अवरोध की पुरानी संस्कृति को जारी रखे हुए हैं । लगातार विरोध के बाद सभामुख ने प्रतिनिधि सभा की बैठक गुरुवार सुबह ११ बजे तक के लिए स्थगित कर दी । बैठक स्थगित होते समय शाम के साढ़े पाँच बज चुके थे । प्रधानमंत्री शाह शाम लगभग साढ़े चार बजे सिंहदरबार स्थित कार्यालय से बालुवाटार लौट गए थे ।
विश्लेषकों के अनुसार संसदीय व्यवस्था में सरकार संसद के माध्यम से जनता के प्रति जवाबदेह मानी जाती है, इसलिए महत्वपूर्ण अवसरों पर प्रधानमंत्री की उपस्थिति को विशेष महत्व दिया जाता है । लेकिन शाह ने संसद में उपस्थित न होकर संसदीय परंपरा और संसद की गरिमा की अनदेखी की है । विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री शाह की कार्यशैली धीरे–धीरे राष्ट्रपति प्रणाली जैसी दिखाई देने लगी है । रास्वपा ने प्रतिनिधि सभा में लगभग दो–तिहाई सीटें जीतने के बाद संसद संचालन सहज होने की उम्मीद जगाई थी, क्योंकि वह पहले संसद अवरोध की राजनीति का विरोध करती रही थी । लेकिन बुधवार को पूरे दिन संसद बाधित और स्थगित होने का मुख्य कारण स्वयं रास्वपा से निर्वाचित प्रधानमंत्री शाह बने ।
प्रधानमंत्री का संसद के प्रति जवाबदेह न होना दुखद है । संसदीय शासन प्रणाली की मूल भावना ही जवाबदेही है । प्रधानमंत्री संसद से जन्म लेते हैं, इसलिए उन्हें संसद के प्रति जवाबदेह होना ही चाहिए । नीति तथा कार्यक्रम सरकार का होता है और उसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करते हैं । कार्यक्रम वाचन के दौरान बीच में उठकर चले जाना और जवाब देने न आना असामान्य है । यह संसद का अपमान भी है । नीति तथा कार्यक्रम प्रस्तुत होने के दौरान प्रधानमंत्री का संसद से बाहर जाना और बहस में शामिल न होना लोकतंत्र को कमजोर करने वाला कदम प्रतीत होता है । ऐसा लगता है मानो प्रधानमंत्री यह जताना चाहते हों कि ‘मैं ही राज्य हूँ । यदि इस परिदृश्य में नीति तथा कार्यक्रम असफल होता है तो सरकार असफल मानी जाएगी । यह कोई साधारण विषय नहीं है, लेकिन इसे जिस हल्के ढंग से लिया गया है, वैसा संसदीय इतिहास में पहले नहीं देखा गया है ।
हालाँकि सत्तापक्ष के सांसदों का कहना है कि प्रतिनिधि सभा नियमावली में प्रधानमंत्री की अनिवार्य उपस्थिति का कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए इस मुद्दे पर विरोध करना उचित नहीं है । फिलहाल प्रतिनिधि सभा नियमावली २०७९ लागू है । नई नियमावली पारित न होने के कारण संसद का संचालन इसी नियमावली के आधार पर हो रहा है । इस नियमावली में प्रधानमंत्री को काफी व्यापक अधिकार दिए गए हैं । यहाँ तक कि किसी भी समय प्रधानमंत्री की अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित करने वाला स्पष्ट प्रावधान भी नहीं है । सत्तापक्ष का दावा और नियमावली का सामान्य अध्ययन यह दिखाता है कि प्रधानमंत्री को अपने स्थान पर किसी अन्य मंत्री को भेजने या अधिकार सौंपने की पर्याप्त छूट दी गई है । संसद में विवाद का कारण बने ‘नीति तथा कार्यक्रम’ से संबंधित नियम ३८ में भी स्पष्ट रूप से लिखा है कि “प्रधानमंत्री या उनकी अनुपस्थिति में उनके द्वारा नामित कोई मंत्री” कार्य कर सकता है । इसी नियम के आधार पर वित्तमंत्री ने बुधवार को प्रधानमंत्री की ओर से प्रस्ताव पेश किया था । प्रतिनिधि सभा में केवल कुछ सीमित प्रावधान ऐसे हैं जिनमें प्रधानमंत्री की स्वयं उपस्थिति अनिवार्य मानी गई है । अन्य अधिकांश मामलों में किसी दूसरे मंत्री को जिम्मेदारी देकर भेजने की अनुमति है । यहाँ तक कि विश्वासमत या अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान भी प्रधानमंत्री की उपस्थिति अनिवार्य नहीं बनाई गई है । नीचे नियमावली में उल्लेखित उन व्यवस्थाओं का उल्लेख है जहाँ प्रधानमंत्री की उपस्थिति आवश्यक मानी गई है—
१. प्रधानमंत्री से प्रत्यक्ष प्रश्नोत्तर के समय
हर महीने के पहले सप्ताह में किसी एक दिन की बैठक का पहला एक घंटा प्रधानमंत्री या उनके कार्यक्षेत्र से सीधे जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर प्रश्न पूछने के लिए निर्धारित किया जाता है ।
नियम ५६(४) के अनुसार इन प्रश्नों का उत्तर प्रधानमंत्री को स्वयं उपस्थित होकर तत्काल देना होता है । इस नियम में किसी अन्य मंत्री की उपस्थिति की कल्पना नहीं की गई है । हालांकि, ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जब किसी महीने प्रधानमंत्री प्रश्नोत्तर सत्र में शामिल ही नहीं हुए ।
२. विश्वासमत संबंधी प्रस्ताव में
प्रधानमंत्री को विश्वासमत लेने के लिए बैठक में अपना वक्तव्य देकर प्रस्ताव प्रस्तुत करना होता है । इस प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान उठे प्रश्नों का उत्तर भी प्रधानमंत्री को ही देना होता है ।
लेकिन यदि प्रधानमंत्री अस्वस्थ हों या किसी नियंत्रण से बाहर परिस्थिति के कारण उपस्थित न हो सकें, तभी उनके द्वारा अधिकृत कोई मंत्री उत्तर दे सकता है ।
३. अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में

यह भी पढें   भारतीय विदेश मंत्रालय के निमंत्रण पर लामिछाने १ जून को भारत यात्रा पर जाएंगे

प्रतिनिधि सभा नियमावली के नियम १५६ में प्रधानमंत्री के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश होने और उस पर चर्चा होने के दौरान उठे प्रश्नों का उत्तर प्रधानमंत्री द्वारा ही दिए जाने की व्यवस्था है ।
इसमें भी केवल अस्वस्थता या नियंत्रण से बाहर की परिस्थिति में ही प्रधानमंत्री किसी अन्य मंत्री को जवाब देने के लिए अधिकृत कर सकते हैं ।
४. आपातकाल की घोषणा या आदेश अनुमोदन प्रस्ताव में
नियम २३५ के अनुसार आपातकाल की घोषणा या आदेश को अनुमोदित कराने के लिए प्रधानमंत्री को स्वयं वक्तव्य देकर बैठक में प्रस्ताव पेश करना होता है । उस प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान उठे प्रश्नों का उत्तर भी प्रधानमंत्री को ही देना होता है ।
इस स्थिति में भी केवल अस्वस्थता या नियंत्रण से बाहर परिस्थिति होने पर ही किसी अन्य मंत्री को अधिकार दिया जा सकता है ।
५. अपने मंत्रालय से संबंधित विषयों की चर्चा में
नियमावली के नियम ६ की उपधारा ५ के अनुसार किसी मंत्रालय से संबंधित विषय पर चर्चा के दौरान संबंधित मंत्री की उपस्थिति अनिवार्य होती है । प्रधानमंत्री द्वारा संभाले जाने वाले मंत्रालय — जैसे प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद कार्यालय — से जुड़े विषयों पर चर्चा होने पर विभागीय मंत्री के रूप में प्रधानमंत्री की उपस्थिति आवश्यक मानी जाती है ।
हालाँकि इस नियम में किसी अन्य मंत्री द्वारा जवाब देने की व्यवस्था नहीं है, लेकिन पूर्व में प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से अन्य मंत्रियों द्वारा जवाब दिए जाने के कई उदाहरण मौजूद हैं ।
इस स्थिति में विरोध की संभावना नहीं दिखती किन्तु प्रधानमंत्री के तेवर और नजरअंदाज करने की शैली से प्रश्नों का उठना तो लाजमी ही है ।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *