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सिमरौंनगढ़ मरम्मत, मधेश का इतिहास ही समाप्त करने का षड़यंत्र

 

 

समरौनगढ़ । सिमरौंनगढ़ नगरपालिका के पुरातात्विक सलाहकार श्री तारानंद मिश्र द्वारा सिमरौं नगढ़ के पुरातात्विक अध्ययन और सर्वेक्षण के क्रम में सिमरौं गढ़ के रानिवास हरिहरपुर, पालकियां माई से कंकलिनी मंदिर के सड़क तथा कोतवाली तक हुई नए सड़क निर्माण हुए सम्पूर्ण स्थल के अध्ययन के क्रम में खुदाई में 1097 से 1326 तक कि स्थापित प्राचीन मिथिला की राजधानी सिमरौनगढ़ की अनेक चीजें प्राप्त हुई हैं ।

इसी खुदाई के क्रम में ठेकेदार द्वारा अत्यंत लापरवाही करने की बात भी सामने आ रही है ।कहा जा रहा है कि ठेकेदार द्वारा संपदा सुरक्षा नियम का उल्लंघन किया गया है ।जिनमे कुछ मुख्य तत्व निम्न है

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1-पुरातात्विक मरम्मत के समय संबंधित निकाय की ओर से किसी भी जिम्मेदार अधिकारियों का न होना ।सभी कार्य ठेकेदार की निगरानी में ही होना ।
2-पुरातात्विक कार्य मे हेवी इक्यूपमेंट के प्रयोग से मिट्टी के भीतर रहे कर्नाटकालीन दीवारों में क्षति पहुंचना ।
3-खुदाई में मिले ईंट का दुरुपयोग करना
4-बिना प्रशिक्षित मजदूरों से काम करवाने के कारण प्राचीन अवशेषों की क्षति होना
5- खुदाई में प्राप्त अवशेषों का संरक्षण नही होना ।
ज्ञात होना चाहिए कि नानयदेव द्वारा सिमरौं नगढ़ के दरवार की रचना के समय वहां के वास्तु निर्माण के उल्लेख के समय 1097 में निर्मित प्रस्तर अभिलेख मिला था ।जिसके खो जाने के बाद भी प्राचीन मिथिला पर शोध करने वाले कई विद्वानों ने उक्त अभिलेख को प्रकाशित किया है ।वही अभिलेख और वास्तु के निर्माण के कई तथ्य केशर वंशावली में भी मिलते हैं ।इतना ही नही कर्नाट के राजा शक्तिसिंह के अभिलेख में भी मिलता है जो मोहनप्रसाद खनाल द्वारा रचित सिमरौंनगढ़ के इतिहास में प्रकाशित है ।
इन प्रमाणों का रानिवास क्षेत्र प्राचीन कर्नाट राजाओं के राजदरवार परिसर में होने की संभावना मिश्र जी बताते हैं ।उनके अनुसार इन पुरातात्विक स्थलों की खनन और संरक्षण की आवश्यकता है ।

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