Wed. Sep 9th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

बदलते दक्षिण एशिया में नेपाल: असीम संभावनाएं या नवीन-उपनिवेशवाद की ओर ?- मधुर शर्मा

 

मधुर शर्मा, दिल्ली | दक्षिण एशिया में एक राष्ट्र ऐसा है जो कभी किसी उपनिवेशवादी शक्ति का गुलाम नहीं रहा। वह राष्ट्र है नेपाल। राष्ट्रवादी यह कहते हैं कि नेपाल इतना शक्तिशाली था कि अंग्रेज़ उसको गुलाम नहीं बना पाए। दूसरा पक्ष यह कह सकता है कि नेपाल में ऐसा कुछ था ही नहीं जिसके लिए उसे गुलाम बनाया जाता। दोनों ही पक्ष सत्यता से दूर हैं। किसी देश को उपनिवेश बनाना कोई सस्ता काम नहीं है। वहाँ जान और माल दोनों लगता है — एक सेना और पूरी नौकरशाही रखनी पड़ती है और प्रशासन की ज़िम्मेदारी होती है। पर अगर आप एक ऐसा रास्ता तलाश लें जिससे आपको न उस क्षेत्रफ़ल पर कब्ज़ा करना पड़े और न ही आपको वहां की प्रशासनिक ज़िम्मेदारी उठानी पड़े, और आपको बराबर धन भी प्राप्त होता रहे, तो आप बिलकुल ऐसे ही रास्ते को चुनेंगे। ऐसा नेपाली  राणाशाही में भी कुछ हद तक देखा जा सकता है जब राणा वंश कहने को तो राजा के लिए राष्ट्र देख रहा था, परन्तु वास्तविकता में सत्ता, राष्ट्र और राष्ट्रीय संसाधन सब उसके ही पास था। आज 21वीं सदी में भी ऐसा ही हो रहा है जब बड़े राष्ट्र सीधे दूसरे राष्ट्रों पर कब्ज़ा न कर के अन्य माध्यमों से उनको अपने अधीन कर रहे हैं।

आज एक तरफ़ नेपाली नागरिक पूरे विश्व में काम कर रहे हैं जिससे उनका विश्व में नाम बढ़ रहा है। नेपाल क्षेत्रीय समूहों में भी अग्रणीय भूमिका निभा रहा है जैसे कि SAARC। कुछ समय पहले BIMSTEC सम्मलेन भी नेपाल आयोजित में हुआ था। अभी नेपाली प्रधानमंत्री ओली विश्व आर्थिक मंच के दावोस में सालाना आयोजित कार्यक्रम में भी गए थे जहाँ उन्होंने नेपाल का पक्ष समूचे विश्व के सामने रखा। यह वे कुछ उदाहरण हैं जिनके माध्यम से यह समझा जा सकता है कि नेपाल न केवल उभर रहा है बल्कि वह क्षेत्रीय व भविष्य में वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षाएं भी रखता है। इस सब से उलट एक दूसरा पक्ष यह भी है कि नेपाल लम्बे समय से एक राष्ट्रीय असुरक्षा की भावना से जूझ रहा है जो मुख्यतः भारत की ओर इंगित है। एक तरफ क्षेत्रीय व वैश्विक शक्तियों के साथ से नेपाल वर्षों से धीमे पड़े विकास को रफ़्तार दिलाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अपने एक पड़ोसी राष्ट्र से इतना असुरक्षित है। इसका एक बड़ा कारण है भारत पर आर्थिक निर्भरता जिसके दुष्परिणाम नेपाल ने 2015 नाकाबंदी में देखे।

यह भी पढें   बड़े होते मकान, छोटे होते रिश्ते ...!! : बिमल सरार्फ

इस आर्थिक निर्भरता को ख़त्म करने की लिए चीन से नेपाल ने संधियां करी हैं जिनके तहत नेपाल और चीन के बीच रेल व सड़क यातायात का निर्माण व विस्तार करा जाएगा। चीनी बंदरगाहों से भी नेपाल को जोड़ा जाएगा। यह चीन केवन बेल्ट–वन रोड कार्यक्रम के अंतर्ग्रत भी है जिसमें समूचे विश्व को चीन यातायात व संपर्क मार्गों से अपने से जोड़ रहा है जिससे उसके अनुसार यातायात व व्यापार को विश्व स्तर पर बढ़ावा मिलेगा। इस चीनी परियोजना के आलोचनात्मक विश्लेषण से पहले यह समझना होगा की नेपाल इसका भाग किन परिस्तिथियों में बना। 2015 नाकाबंदी ने नेपाली राष्ट्रवाद को एक नई दिशा दी और भारत सेस्वतंत्रताकी मांग और चीन के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के बीच नेपाल और चीन के बीच यह तय हुआ की वे अब संपर्क बढ़ाएंगे। यहाँ यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह कदम नेपाल में यातायात, संपर्क व व्यापार सुधारने के लिए नहीं बल्कि भारत से स्वतंत्रताऔर उससे दूर हटने के लिए था। अंग्रेजी अखबार काठमांडू पोस्ट की एक खबर कहती है कि नेपाल का वन बेल्ट–वन रोडसे जुड़ना नेपाल  को चीन और भारत के बीच व्यापार का एक माध्यम बनाएगा। भूराजनैतिक दृष्टिकोण से देखें तो इस कथन में सत्यता है।

यह भी पढें   बाढ़ ने छीन लिया बचपन: रसुवा में भाई-बहनों और अपनों की तलाश में भटक रहे बच्चे

भारतवन बेल्ट–वन रोडका कितना ही विरोध करे परन्तु अगर उसे इसके कुछ पहलुओं से लाभ मिलेगा तो वह ज़रूर रूचि दिखायेगा, जैसे की भारत ने अपने उत्तर-पूर्वी राज्यों में दिखाई है जहाँ वह चीन, बांग्लादेश और म्यांमार के साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर काम कर रहा है। जब चीन तिब्बत से काठमांडू तक रेल बनाएगा और भारत रक्सौल से काठमांडू तक, तो भारत और चीन एक-दूसरे से सीधा व्यापार कर पाएंगे। नेपाल एक माध्यम मात्र बनेगा क्यूंकि नेपाल का औद्योगिक तंत्र इतना शक्तिशाली नहीं है कि वह भारत और चीन को अधिक मात्रा में निर्यात करे। अतः नेपाल भारत से मुक्त होने के लिए चीन से हाथ तो मिला रहा है परन्तु यह भी एक भूराजनैतिक शतरंज का एक दांव है जिसमें चाल तो नेपाल चल रहा है परन्तु उसे चला अभी भी कोई और शक्तियां रही हैं।

यह भी पढें   11 दिन बाद 64 वर्षीय महिला का चमत्कारिक रेस्क्यू

यही आज के समय का उपनिवेशवाद है जो हर क्षेत्रीय वैश्विक शक्ति अपनाती है जिसमें वह किसी भूभाग पर कब्ज़ा तो नहीं करती परन्तु आर्थिक व राजनैतिक तरीकों से उसे अपने साथ ऐसा जोड़ती है जिससे राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता में भी विशवास करता रहे और साथ ही उसका पूरा प्रयोग ये क्षेत्रीय व वैश्विक शक्तियां अपने हितों की पूर्ती के लिए करती रहें।

अतः नेपाल आज एक दोराहे पर है। एक तरफ़ वह क्षेत्रीय व वैश्विक मंचों पर अपनी आकांक्षाएं अंकित कर रहा है और क्षेत्रीय वैश्विक शक्तियों के साथ आ रहा है, वहीं दूसरी ओर वह आर्थिक स्वतंत्रता के  राष्ट्रवाद के लिए ऐसे कदम उठा रहा है जो उसेनवीन उपनिवेशवाद में धकेल सकते हैं। नेपाल के एक तरफ़ कुआ (भारत) है तो दूसरी तरफ़ खाई (चीन)। वह जिधर भी जाए, उसकी राह आसान नहीं होगी क्योंकि प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद से तो स्वतंत्रता आसान है परन्तु अप्रत्यक्ष नवीन उपनिवेशवाद से नहीं। नेपाल कभी गुलाम नहीं रहा। यह इतिहास है। परन्तु भविष्य क्या होगा?

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com