Sun. Jul 19th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

हर इक शब हर घडी गुज़रे क़यामत यूं तो होता है मगर हर सुबह हो रोज़े-जज़ा, ऐसे नहीं होता : फैज

 

Image result for फैज

अवाम के शायर फैज अहमद फैज का नाम उर्दू कविता और शायरी में बड़े ही अदब से लिया जाता है. उनका जन्म 13 फरवरी 1911 को क़स्बा काला क़ादिर सियालकोट (पंजाब) में हुआ था. उनकी शायरी उर्दू के मशहूर शायरों मीर, ग़ालिब, इकबाल, जोश और फिराक की तरह भारत ही नहीं पूरी दुनिया में लोकप्रिय है.

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़ुबां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक् तेरी है
देख के आहंगर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़न्जीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहने है कह ले

यह भी पढें   मुंबई विश्वविद्यालय के 170 वें स्थापना दिवस पर हिंदी विभाग ‘उत्कृष्ट विभाग’ पुरस्कार से सम्मानित

“आपकी याद आती रही रात-भर”
चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर

गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात-भर

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन[2]
कोई तस्वीर गाती रही रात-भर

फिर सबा[3] सायः-ए-शाख़े-गुल[4] के तले
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात-भर

जो न आया उसे कोई ज़ंजीरे-दर[5]
हर सदा पर बुलाती रही रात-भर

एक उमीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात-भर

मास्को, सितंबर, 1978

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें उर्दू के मशहूर कवि, जिन्होंने तेलंगाना आंदोलन में हिस्सा लिया था। उनकी ग़ज़ल से प्रेरित होकर ही ’फ़ैज़’ ने यह ग़ज़ल लिखी है
  2. ऊपर जायें वस्त्र
  3. ऊपर जायें ठंडी हवा
  4. ऊपर जायें गुलाब की टहनी की छाया
  5. ऊपर जायें दरवाज़े कि साँकल
यह भी पढें   धरान में अग्रकुलमाता महारानी माधवीजी की 5147वीं जयंती श्रद्धा, भक्ति एवं सांस्कृतिक उल्लास के साथ मनाई गई

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *