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संवेदना की लहरें

 
वीरेन्द्रप्रसाद मिश्र
सुबह सामने की छत से कबूतरों की गुटरगूं नहीं
उनका निरन्तर पंख फडÞफडना सुनाइ पड रहा आज
कुछ कबूतर पडसी के घर की छत के नीचे
अपने घोसलों में वापस नहीं जा पा रहे आज
आसन्न दीपावली के कारण घर के रंग रोगन के लिए
इटांे से चुनकर रंग दिए गए उनके निवासजहाँ निर्वाध आ-जा रहे थे ये अब तक
अब इन्हें प्राप्त नहीं हो पा रहे वह स्थान
हैरान हंै, बारबार उडÞकर जा रहे वहाँ
कभी अधखुली खिड्कियो पर जा बैठते
तो कभी दीवार पर कुछ क्षणों के लिए विश्राम करते
और चोंच मार कर अपनी जगह खोजते
निराश हो, फिर छत पर उडÞकर लौट जाते।मैं मर्ूखवत् इनके बारे में सोचने लगा हूँ
परेशान हूँ, कि अब ये रात कहाँ गुजारेंगे
यदि मेरी अवस्था भी इनकी जैसी हो जाए
तो भला, किस ठौर जाउFmगा अपना सर छिपाने
फिर मन को शान्त करते हुए सोचता हूँ
पडÞोसी ने घर इनके लिए नहीं, अपने लिए बनाया था
दीवारों को गन्दे नहीं करते तो आज ये बेघर क्यों होते
इस में भला है क्या, पडोसी का कोई दोष –
कबूतर अब जहाँ चाहे जाएं, अपना स्थान खोजें !

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अभी देख रहा हूँ उनका उडÞकर उन स्थानों पर जाना
लगता है, उन्हें नहीं मिला है दूसरा ठौर ठिकाना।
मेरे घर की अगली दीवारों में भी कुछ कबूतर रहते हैं
जो अहले सुवह पंख फडÞफडÞाकर मुझे गाढÞी नीद से जगाते है
पता नहीं, क्या मैं भी अपने पडÞोसी सा बन पाऊँगा –
और इन कबूतरों को क्या घोसला बिहीन कर पाउँगा –

अजन्मी बेटी की पीडा
-लक्ष्मी रूपल
माता तू तो जग जननी है
ब्रहृमाणी है क्षत्राणी है
त्याग और करुणा की देवी
ममता का साकार रुप है
फिर क्यों डरती है समाज से
अपने ही जीवन साथी से –
मैं तो तेरी ही रचना हूँ
मुझसे मेरे प्राण न छीनो
मुझ को भी जग में आने दो।

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मैं तेरी गुडिÞया प्यारी सी
अन्धकार में र्सर्ूय किरन सी
मत देना धन दौलत मुझको
खेल-खिलौने, कपडÞे सुन्दर
चमक-दमक हीरे मोती की
सदा बहारों की रंगीनी !

मैं तेरी ही अपनी हूँ
जीने का अधिकार न छीनो
मुझ को भी जग में आने दो।

मैर्ंर् इश्वर की अनुपम कृति हूँ
तेरे सुख कुल का उजियारा हूँ
तेरे सुख दुःख की साथी हूँ
आधी दुनियाँ कहलाती हूँ
तू किस भ्रम में भटकी है माँ !
तू हत्या का अपराध करेगी -!

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मैं तो जग की मातृ स्वरुपा हूँ
जीने का वरदान न छीनो
मुझ को भी जग में आने दो।

देवी कहकर पूजी जाती
सारा विश्व शरण में आता
वेद-विधान, अर्चना, बन्दन
सारे काम अधूरे मुझ बिन
तुम अपने को धोखा देकर्रर्
इश्वर का आदेश न टालो

मैं तो तेरा प्रणय बिम्ब हूँ
ममता की पुकार मत छीनों
मुझको भी जग में आने दो।

मैं तो संस्कृति की मशाल हूँ
सरस्वती हूँ, रणचण्डÞी हूँ
सतत प्रेरणा साहस सम्बल
सुन्दरता की अमर बेल हूँ
तुम मुझको अबला मत जानों
शक्तिरुप हूँ, तेजपंुज हूँ

मैं तो तेरी ही प्रतिमा हूँ
मुझसे आपनापन मत छीनो
मुझ को भी जग में आने दो।

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