कर न जाए कहीं- -कोरोना कुर् र्र् र्र् : लक्ष्मण नेवटिया
कर न जाए कहीं-
-कोरोना कुर् र्र् र्र्
बनाया घर आलिशान
कर होड़ा-होड़
मेहनत जोड-तोड
पैसे जोड़-जोड़ ।
जिन्दगी सारी खपादी
जिस घर को बनाने सजाने!
आज दौड़ता है क्यों?
वही घर काटने खाने?
बहुत गए थे उलझ
अब तो सुलझो!
मांगते थे मिन्नते जिन
पारिवारिक जनोंको पाने,
आज वे ही तलाश रहे हैं क्यों?
तुमसे दूर रहने के बहाने।
बडी अजब है स्थिति
पहले तुम थे,समय नहीं था
अब समय है तो, तुम नहीं।
हो तो निपट बुद्धू-
समझते थे स्वयं को सयाने।
कुछ दिन चुप रहो
किसी से न उलझो,
डर हर पल सताता है
कब उड़ जाएगी
सांस की चिड़िया फुर् र्र् र्र्
कोरोना कर न दे अचानक कान में कुर् र्र् र्र् !!
समझते थे खुदको क्या
ओर हो क्या तुम ?
एक अदृश्य भाइरस ने दिखादी औकात तुमको
भोले न बनो
सच्चाई जीवन की
अब तो समझो।

बिराटनगर

